रोज़गार की प्रतीक्षा में एक पीढ़ी, जब सपनों की उम्र इंतज़ार में बीतने लगे

( 1040 बार पढ़ी गयी)
Published on : 21 Jun, 26 18:06

 — सत्य भूषण शर्मा, उदयपुर (राजस्थान) 

रोज़गार की प्रतीक्षा में एक पीढ़ी, जब सपनों की उम्र इंतज़ार में बीतने लगे

किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके युवा होते हैं। वे केवल वर्तमान के नागरिक नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माता होते हैं। उनके सपनों में राष्ट्र की प्रगति छिपी होती है और उनके उत्साह में विकास की ऊर्जा। किंतु जब यही युवा अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय रोजगार, अवसर और पहचान की प्रतीक्षा में गुज़ारने लगें, तो यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं रह जाती, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाती है।

आज भारत का युवा एक विचित्र दौर से गुजर रहा है। उसके पास शिक्षा है, कौशल है, तकनीकी ज्ञान है, आत्मविश्वास है और कुछ कर गुजरने की तीव्र इच्छा भी है। लेकिन इसके बावजूद वह अक्सर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है, जहाँ रास्ते तो बहुत हैं, पर मंज़िल तक पहुँचने का भरोसा कम होता जा रहा है।

सपनों की शुरुआत और संघर्ष का सिलसिला-

एक सामान्य भारतीय परिवार में बच्चे के जन्म के साथ ही उसके भविष्य के सपने बुने जाने लगते हैं। माता-पिता अपनी इच्छाओं को बच्चों की सफलता में तलाशते हैं। वे चाहते हैं कि उनका बेटा या बेटी पढ़-लिखकर अच्छा जीवन जीए, परिवार का नाम रोशन करे और समाज में सम्मान प्राप्त करे।

बच्चा विद्यालय जाता है, परीक्षाएँ देता है, प्रतियोगिताओं में भाग लेता है और धीरे-धीरे युवावस्था में प्रवेश करता है। वह डिग्रियाँ प्राप्त करता है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है और जीवन के लक्ष्य तय करता है।

लेकिन यहीं से शुरू होती है एक लंबी प्रतीक्षा।

कई युवाओं के लिए यह प्रतीक्षा कुछ वर्षों की नहीं, बल्कि एक पूरे दशक की कहानी बन जाती है। पढ़ाई पूरी होने के बाद भी रोजगार की तलाश समाप्त नहीं होती। तैयारी चलती रहती है, परीक्षाएँ होती रहती हैं और उम्मीदें बार-बार बनती और टूटती रहती हैं।

प्रतीक्षा का बढ़ता हुआ दायरा-

आज का युवा केवल नौकरी की प्रतीक्षा नहीं कर रहा। वह परिणामों की प्रतीक्षा कर रहा है। वह भर्तियों की प्रतीक्षा कर रहा है। वह रिक्तियों की घोषणा की प्रतीक्षा कर रहा है। वह व्यवस्था की पारदर्शिता की प्रतीक्षा कर रहा है।

कई बार परीक्षा सम्पन्न हो जाती है, लेकिन परिणाम महीनों तक नहीं आते। कभी चयन प्रक्रिया न्यायालयों में उलझ जाती है तो कभी प्रशासनिक कारणों से अटक जाती है। कहीं प्रश्नपत्र लीक होने की खबरें आती हैं तो कहीं भर्ती रद्द हो जाती है।

ऐसी परिस्थितियों में सबसे अधिक नुकसान उस युवा का होता है जिसने वर्षों तक मेहनत की होती है। उसका समय लौटकर नहीं आता। उसकी उम्र रुकती नहीं। उसके सपने इंतजार करते-करते थकने लगते हैं।

उम्र की दौड़ और अवसरों की कमी-

युवावस्था जीवन का सबसे ऊर्जावान काल माना जाता है। यही वह समय होता है जब व्यक्ति नए प्रयोग करता है, जोखिम उठाता है और अपने भविष्य की मजबूत नींव रखता है।

लेकिन जब यही समय अनिश्चितताओं में बीतने लगे तो निराशा का जन्म होना स्वाभाविक है।

एक ओर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों निकल जाते हैं, दूसरी ओर आयु सीमाएँ धीरे-धीरे निकट आती जाती हैं। अनेक युवाओं को यह भय सताने लगता है कि कहीं अवसर मिलने से पहले ही उनकी पात्रता समाप्त न हो जाए।

यह केवल प्रशासनिक प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता का विषय भी है। क्योंकि हर आयु सीमा के पीछे एक परिवार की उम्मीदें जुड़ी होती हैं।

बदलती अर्थव्यवस्था और नई चुनौतियाँ-

वर्तमान समय में रोजगार का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और डिजिटल अर्थव्यवस्था ने कार्यक्षेत्रों की प्रकृति को परिवर्तित कर दिया है।

नई संभावनाएँ भी पैदा हुई हैं, लेकिन साथ ही नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। अब केवल डिग्री पर्याप्त नहीं रह गई। कौशल, नवाचार और निरंतर सीखने की क्षमता भी आवश्यक हो गई है।

फिर भी यह प्रश्न बना हुआ है कि क्या हमारे शैक्षणिक संस्थान युवाओं को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार कर पा रहे हैं? क्या शिक्षा और उद्योग जगत के बीच की दूरी कम हुई है? क्या ग्रामीण और छोटे शहरों के युवाओं को भी समान अवसर उपलब्ध हैं?

इन प्रश्नों पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।

बेरोज़गारी से अधिक खतरनाक है निराशा-

रोज़गार का अभाव निश्चित रूप से एक समस्या है, लेकिन उससे भी बड़ी समस्या है निराशा का फैलना।

जब कोई युवा बार-बार असफलताओं और अनिश्चितताओं का सामना करता है, तो उसका आत्मविश्वास प्रभावित होने लगता है। वह स्वयं की क्षमता पर संदेह करने लगता है। धीरे-धीरे उसके भीतर यह भावना जन्म ले सकती है कि उसकी मेहनत का कोई मूल्य नहीं है।

यह स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए शुभ संकेत नहीं हो सकती। क्योंकि आत्मविश्वास से भरा युवा राष्ट्र निर्माण करता है, जबकि निराश युवा अपनी संभावनाओं से दूर होता चला जाता है।

उम्मीद अब भी बाकी है-

इन सभी चुनौतियों के बावजूद भारत का युवा हार नहीं मान रहा। यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है।

वह नए अवसर तलाश रहा है। वह स्टार्टअप शुरू कर रहा है। वह स्वरोज़गार की राह चुन रहा है। वह डिजिटल मंचों के माध्यम से नई पहचान बना रहा है। वह विज्ञान, खेल, साहित्य, कला और नवाचार के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहा है।

यही कारण है कि आज भी भारत को दुनिया की सबसे बड़ी युवा शक्ति कहा जाता है।

समय की पुकार-

अब आवश्यकता केवल रोजगार उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि युवाओं के विश्वास को मजबूत करने की है। भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, शिक्षा और कौशल के बेहतर समन्वय, उद्यमिता को प्रोत्साहन तथा मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता जैसे कदम समय की मांग हैं।

साथ ही समाज को भी युवाओं को केवल परिणामों के आधार पर नहीं आंकना चाहिए। हर सफल व्यक्ति के पीछे वर्षों का संघर्ष छिपा होता है। युवाओं को प्रोत्साहन, मार्गदर्शन और विश्वास की आवश्यकता है।

निष्कर्ष-

रोज़गार की प्रतीक्षा में खड़ी यह पीढ़ी केवल नौकरी नहीं तलाश रही, बल्कि अपने अस्तित्व, सम्मान और भविष्य की तलाश कर रही है। उसके हाथों में डिग्रियाँ हैं, आँखों में सपने हैं और हृदय में कुछ कर दिखाने की प्रबल इच्छा है।

यदि राष्ट्र उनकी ऊर्जा को सही दिशा देने में सफल होता है, तो यही पीढ़ी भारत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाएगी। लेकिन यदि उनकी आकांक्षाओं की उपेक्षा की गई, तो यह केवल युवाओं की नहीं, पूरे राष्ट्र की क्षति होगी।

इसलिए समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम युवाओं को प्रतीक्षा नहीं, अवसर दें; आश्वासन नहीं, विश्वास दें; और केवल सपने नहीं, उन्हें पूरा करने का मंच भी दें।
 


साभार :


© CopyRight Pressnote.in | A Avid Web Solutions Venture.