सुनो हर कविता कुछ बोलती है

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Published on : 23 Jun, 26 07:06

 सुनो हर कविता कुछ बोलती है

कोटा की लेखिका संजू शृंगी के प्रथम काव्य संग्रह " उम्मीद अभी जिंदा है" को पढ़ कर यह खूबसूरत शेर याद आता है " आगाज़ अच्छा हैं अंजाम खुदा जाने"। संग्रह की 111 कविताएं एक से बढ़ कर एक हैं और कहने में अतिशयोक्ति नहीं सुनो हर कविता कुछ बोलती है। लेखिका की प्रथम कविता को संपूर्ण कविताओं का सार कह सकते हैं या यूं कहें कि प्रथम कविता शेष सभी का प्रतिनिधत्व करती है............

हम जीवन की बात करें

मन से मन की बात करें,

हम जन-जन की बात करें।

छोड़ें भी ये तेरा-मेरा,

अपनेपन की बात करें।

परिवर्तन की बात करें,

नव-सजृन की बात करें।

बसते हैं इसान जहाँ पर,

उस उपवन की बात करें।

प्रभु दर्शन की बात करें,

चरण-वंदन की बात करें।

यगपुरुष जो कहलाएँ,

रघनुंदन की बात करें।

इस तन-मन की बात करें,

धरा-गगन की बात करें।

मतृ्यु की आहट से  पहले

हम जीवन की बात करें।

घर-आँगन की बात करें,

बरखा-सावन की बात करें।

मिलकर बैठें दोस्त पराने, ु

फिर बचपन की बात करें।

अकेली इस कविता में सभी कविताओं का सार दृष्टिगोचर होता है। आगाज़ कविता से ही अंजाम की आखिरी कविता तक की खूबसूरती का अंदाज़ा होता है और संपूर्ण काव्य संग्रह से लेखिका के भावी सृजन का अंदाज़ा।

आज इन्होंने मुझे मेरे मोबाइल पर कृति की पीडीएफ भेजी। फुर्सत में इसे खोला और पढ़ा तो पड़ता ही गया। समाज, प्रकृति और मनुष्य जीवन का कोई भी पहलू ऐसा नहीं जिसे इन्होंने कविताओं का विषय नहीं बनाया हो। भावों का स्पंदन सहज और सरल भाषा में प्रवाहमान है। लेशमात्र भी कहीं कोई बोझिलता नहीं है। दृष्टिकोण सकारात्मक एवं आशावादी है। रचनाएं सामाजिक समस्याओं, मजदूर, किसान, बचपन, अवसाद और निराशा से बाहर आने, मुश्किल कुछ भी नहीं, मुस्कुराओ , रिश्तों को जीवंत बनाओं आदि कई अन्य अनेक विषयों  को छूती हैं। सभी वर्गों की प्रतिनिधि रचनाएं लेखिका की

संवेदनशीलता को शिद्दत से उभरती हैं।

  कविताओं के शीर्षक स्वयं में इतने अर्थपूर्ण हैं कि कविता का मजबून समझा देते हैं। बानगी देखिए ...... इंसान बनकर देख,  तक़दीर बदलकर देखो तमु , आओ जीवन सरल बनाएँ , प्यार के बीज फिर बोने लगे,ये ज़िंदगी है , यादों का गुल्लक फोड़ा जाए, उठती हैं उँगलियाँ प्यार पर , ज़ुबापर सबके ताले हुए  हर समस्या हल तक पहुँचे, मुस्कुराना तो चाहिए, मुश्किल नहीं कुछ भी ,सरल बन जाओ , कैसे वहम हैं ज़माने में , धीमे अपने क़दम न करना ,ज़िंदगी से जो हारे हुए हैं , दग़ा नहीं करना , जिन्दगी बंद किताब यहां, तेरे आने से , मशु्किलें दबंग हो चलीं, इतंज़ार आपका ,रूदन से हर्ष तक, पत्थर यूँ उछालो,  डर आदमी को  सभी से मिला कीजिए,  प्रकृति है अनपुम उपहार , हम राही एक मज़िंल के, साथ मेरे हरदम रहते हैं, लगता सबसे प्यारा है वो, बचपन दो दिन का मेहमान , अनमोल मोती हैं आँखें, ज़िंदादिली का नाम ज़िंदगी और याद बहुत आता बचपन आदि कविताएं पाठक के मन को गहराई तक छू जाती हैं।

एक और कविता की पंक्तियाँ गौर तलब हैं...

मुश्किलों से निकलना

है ज़िन्दगी,

गिर-गिर कर सँभलना

है ज़िन्दगी।

रोशनी के लिए अँधेरे से

लड़कर,

दिया बनकर जलना है ज़िन्दगी।

 

कविता जिंदगी बंद किताब यहां के भाव समाज की सच्चाई बयां कर चिंतन का धरातल प्रदान करते हैं............

ज़िंदगी बंद किताब यहाँ

सच्चाई पर नकाब मिले हैं,

चेहरे बंद किताब मिले हैं।

ख़शिुयाँ मिली न ढूँढ़े से,

ग़म मगर बेहिसाब मिले हैं।

क़िस्से अधरे, यादें कड़वी,

तोहफे हमें नायाब मिले हैं।

मुकम्मल-से सवालों के भी,

हमको अधूरे जवाब मिले हैं।

यक़ीन कभी करके देखो,

सच्चे सारे ख़्वाब मिले हैं।

    संवेदनशील, सकारात्मक और आशावादी प्रभाव लिए काव्य संग्रह के आमुख में कथाकार और समीक्षक विजय जोशी लिखते हैं, " रचनाकार स्वयं एक दृष्टा बनकर जीवनानुभूतियों को साझा करता है, इस आस के प्रवास के साथ कि उम्मीद अभी ज़िंदा है। जीवन के प्रति यही सकारात्मकता इन रचनाओ का ंप्रतिपाद्य है और रचनाकार की अभिव्यक्ति का मर्म भी। कविताएँ मूल्यों की स्थापना के साथ समसामयिक परिवेश की मूल सवेदनाओं को अभिव्यक्त कर सहजता से आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हुई जीवन के प्रति आशान्वित होने के भावों को साझा करती हैं।

   भूमिका में साहित्यकार स्नेहलता शर्मा लिखती हैं , " नवोदित कवयित्री संजू श्रृंगी का प्रथम काव्य संग्रह  यथा नाम तथा गुण को जीता एक अनपुम उदाहरण है। जीवन के प्रत्येक दृष्टिकोण के प्रति रचनाओ में पूर्ण संजीदगी दिखाती हुई कवयित्री प्रारम्भ से अंत तक जीवन-संघर्षों से जझते सुखद - दुखद अनुभवों के झंझावातों का दृढ़ता से सामना करते हुए सकारात्मक जीवन-दर्शन खोलकर सबके सामने प्रस्तुत करती है।"

    अनकही में लेखिका संजू श्रृंगी लिखती हैं,

"  उम्मीद अभी जिंदा है, मात्र एक काव्य-संकलन ही नहीं, बल्कि मेरे अंतर्मन में उठती सूक्ष्म तरंगों का वह स्वर है, जो जीवन के विविध अनुभवों, संघर्षों और संवेदनाओं से झंकृत हो सदैव अभिव्यक्ति की राह तलाशता रहा। यह उन अनकही अनुभूतियों का सजीव प्रतिबिम्ब है, जो एक दीपशिखा की भाँति ज्योतिर्मय हो अंधकार में भी अपना प्रकाश फैलाती रही हैं। यह मेरी जीवन-यात्रा का वह दस्तावेज़ है, जिसमें मैंने आत्मिक संवाद का आश्रय ले जीवन के विविध रूपों को पुस्तक-रूप में समेटने का विनम्र प्रयास किया है। इसमें कहीं सामाजिक यथार्थ की कठोरता है तो कहीं मानवीय संबंधों की कोमलता भी; पीड़ा की लहरें हैं तो सुख का सागर भी; निराशा का अंधकार है तो अटूट आशा भी; प्रकृति के प्रति असीम प्रेम है तो मानवीय मूल्यों के प्रति श्रद्धा भी।" 

     पुस्तक के लिए भेजे शुभकामना संदेश में राजस्थान के आई.ए.एस प्रमुख शासन सचिव नवीन जैन ने लिखा, " मुझे कोटा की कवयित्री श्रीमती संजू श्रृंगी की कविता संग्रह उम्मीद अभी जिन्दा है को पढने का अवसर मिला। उन्होंनें अत्यन्त सरल शब्दों में मानवीय उद्‌गारों जैसे सामाजिक रिश्ते, प्रकृति की खूबसूरती, किसान, मजदूर तथा यहाँ तक की पुस्तकों के संबंध में अपनी भावनाएँ व्यक्त की है। मुझे विशेष रूप से  कविताएँ अच्छी लगी।"

      पुस्तक का प्रकाशन राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर के आर्थिक सहयोग योजना में किया गया है। पुस्तक की प्रिंटिंग और पेपर की गुणवत्ता अच्छी हैं। आमुख आवरण पृष्ठ पुस्तक शीर्षक के अनुरूप भाव लिए हुए हैं। चित्र में अपने घर के  छत पर बैठी महिला लिखते लिखते रुक कर उगते सूर्य को देखते हुए सोचने की मुद्रा में दिखाई देती हैं।


साभार :


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