हाड़ोती में एक से बढ़ कर एक कृति  समीक्षाकार

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Published on : 29 Jun, 26 05:06

हाड़ोती में एक से बढ़ कर एक कृति  समीक्षाकार

लेखक

वरिष्ठ साहित्यकार जितेंद्र निर्मोही,कोटा

वर्ष 2018 में मधु आचार्य जी बीकानेर ने कहा था " आपके अंचल में समीक्षा क्षेत्र की कमी है"। मैं कभी जवाब नहीं देता मनन करता हूं।१९९९ में राजस्थानी भाषा साहित्य क्षेत्र में हाड़ौती अंचल में विद्वानों द्वारा राजस्थानी गद्य की चिंता जताई गई धीरेन्द्र राहुल जी ने भी चिंता जताई परिणाम हाड़ौती अंचल में राजस्थानी गद्य आया।बाल साहित्य बाबत डॉ विमला भंडारी जी ने चिंता जताई उस समय पांच सात ही सक्रिय बाल साहित्यकार थे आज़ स्थिति सुखद है। जिस तरह बीकानेर में डा नीरज दहिया खड़े हुए फिर एक लम्बी श्रृंखला चल पड़ी आज़ बीकानेर में खूब समीक्षक हो गये हैं।मेरा अपना समय है तदानुसार समीक्षाएं भी है अधिकतम समीक्षाएं भाई विजय जोशी की इस अंचल में दिखाई देती थी। गौरी शंकर कमलेश स्मृति राजस्थानी भाषा पुरस्कार समारोह के बाद मेरी निगाह डॉ प्रभात  कुमार सिंघल जी पर पड़ी मैंने डॉ दीपक श्रीवास्तव जी से कहा मुझे हाड़ौती अंचल में एक समीक्षक मिल गया और फिर डॉ. प्रभात सिंघल  की समीक्षाएं आई।जो सबके सामने है।

               एक दिन डॉ प्रभात सिंघल जी की कृति " नारी चेतना की साहित्यिक उड़ान" की समीक्षा जो अक्षय लता शर्मा जी ने की थी उस पर पड़ी मैंने कहा आप कमाल की समीक्षक है। फिर उन्होंने मेरी कृतियां " राजस्थानी बाल साहित्य री दीठ" और " राजस्थानी कहानियां एक विवेचना" की समीक्षा करवाई लाजवाब समीक्षा थी।आज समीक्षा ने मानदंड बदल गये हैं अक्षय लता शर्मा जी अपने ढंग की अलग ही मौलिक समीक्षा करती है।उनकी शैली, भाषा और शिल्प बिल्कुल अलग है। उन्होंने फिर डॉ प्रभात सिंघल जी की कृति " राजस्थान के साहित्य साधक" समीक्षा की समीक्षा कर दी। उसके बाद शिखा अग्रवाल की कृतियां ली और श्वेता शर्मा की " मां का गांव और बचपन" इन सभी कृतियों की समीक्षा का संकलन बोधि प्रकाशन जयपुर से संग्रहित हो कर आया है। नाम है " आखर समीक्षा के स्वर"  अनूठी कृति है।

        प्रकाशक स्वयं विद्वान हैं उनकी टिप्पणी का सार यूं है " यह कृति मात्र समीक्षा नहीं बल्कि बल्कि साहित्य के विविध संसार में एक संवेदनशील और विचोरोत्तेजक यात्रा है।समीक्षक यहां उनके कथ्य, भाषा, शिल्प के वैचारिक पक्ष का परिचय होता है ."

       अब क्या  कहा जाए बहुत कुछ कह दिया है। यहां उनके स मीक्षकीय तेवर की सराहना तो करनी होगी। भाग्यशाली हैं नवलेखिकाएं शिखा अग्रवाल और श्वेता शर्मा जिनकी पहली कृतियों पर ही समीक्षा कृति आ गई है। डॉ प्रभात सिंघल जी की खासकर दो कृतियों " राजस्थान के साहित्य साधक" और " नारी चेतना की साहित्यिक उड़ान" की बात दूर जाना मेरी समीक्षकीय कृतियों पर उनका समीक्षकीय दृष्टिकोण अभिनंदन योग्य है।

   हाड़ौती अंचल इस महनीय लेखिका पर गर्व करता है। इसलिए भी कि कौन दूसरों की कृतियों पर श्रमसाध्य कार्य कर राशि खर्च करता है। 


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