वैज्ञानिक वृक्षारोपण से सुधरेगी झीलों की सेहत तीन स्तरीय हरित बफर सिस्टम विकसित किया जाए

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Published on : 29 Jun, 26 07:06

वैज्ञानिक वृक्षारोपण से सुधरेगी झीलों की सेहत  तीन स्तरीय हरित बफर सिस्टम विकसित किया जाए

उदयपुर। मानसून पूर्व तथा वर्षा समाप्त होने के तुरंत बाद का समय झीलों, नदियों और तालाबों के पारिस्थितिक संरक्षण के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। यदि इस अवधि में जलग्रहण क्षेत्र, बरसाती नालों तथा झीलों के किनारों पर वैज्ञानिक ढंग से देशी प्रजातियों का वृक्षारोपण एवं वनस्पतिकरण किया जाए तो प्रदूषण, मिट्टी का कटाव और सिल्ट समस्या  का प्राकृतिक  समाधान हो सकेगा । इससे झीलों और नदियों का इकोलॉजिकल रेस्टोरेशन भी संभव होगा। यह विचार रविवार को आयोजित झील संवाद में व्यक्त किए गए।

झील संरक्षण समिति के सहसचिव डॉ. अनिल मेहता ने कहा कि आज पूरी दुनिया झीलों और नदियों के संरक्षण के लिए "नेचर बेस्ड सॉल्यूशंस " एनबीएस को अपना रही है। उन्होंने कहा कि उदयपुर ने लगभग 16 वर्ष पूर्व आयड़ नदी के  ग्रीन ब्रिज इको-रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट  के माध्यम से इस दिशा में देश- दुनियां  को एक  एनबीएस अभिनव मॉडल दिया था, लेकिन दुर्भाग्य से उसी मॉडल को आगे नहीं बढ़ाया गया।

डॉ  मेहता ने कहा कि विश्व स्तर पर रिपेरियन बफर, जैव-फिल्टर वनस्पति तथा कैचमेंट वनीकरण  को जलाशयों के संरक्षण का सबसे प्रभावी एवं टिकाऊ उपाय माना गया है। ऐसी हरित पट्टियां मिट्टी का कटाव कम करती हैं, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं अन्य प्रदूषकों को झीलों तक पहुंचने से पहले ही रोक लेती हैं, भूजल पुनर्भरण बढ़ाती हैं तथा जल गुणवत्ता में स्थायी  सुधार लाती हैं। 

डॉ. मेहता ने सुझाव दिया कि झीलों पर   "तीन स्तरीय हरित बफर सिस्टम "   विकसित की जाए। जलग्रहण क्षेत्र में देशी वृक्ष लगाए जाएं, बरसाती नालों के किनारे  वेटलैंड वनस्पतियां विकसित की जाएं तथा झीलों के किनारों पर देशी झाड़ियों और वृक्षों की रिपेरियन हरित पट्टी बनाई जाए। इससे प्रदूषण और सिल्ट प्राकृतिक रूप से रुकेंगे , किनारों का  कटाव कम होगा तथा झीलों का पारिस्थितिक स्वास्थ्य सुधरेगा।

झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि झीलों और नालों के किनारे विकसित हरित पट्टियां स्थानीय एवं प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित आवास, भोजन और प्रजनन स्थल उपलब्ध कराती हैं। इससे   जैव विविधता  में भी  वृद्धि होती है तथा संपूर्ण जलीय पारिस्थितिकी तंत्र अधिक संतुलित बनता है।

सामाजिक चिंतक नंद किशोर शर्मा  ने कहा कि झीलों के भीतर जमा कचरे की नियमित सफाई आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी प्रदूषण को उसके स्रोत पर ही प्रकृति आधारित उपायों से रोकना है। इससे झीलों की सफाई पर होने वाला व्यय भी घटेगा और जल गुणवत्ता में स्थायी सुधार आएगा।

शिक्षाविद  कुशल रावल ने  कहा कि नगर निगम, यूडीए, वन विभाग, जल संसाधन विभाग तथा शैक्षणिक संस्थान मिलकर   "झील-नदी हरित बफर मिशन"  का एक संयुक्त मिशन चलाए तथा झील संरक्षण में प्रभावी  भूमिका निभाए।

वरिष्ठ नागरिक  द्रुपद सिंह  तथा युवा पर्यावरण कार्यकर्ता विनोद कुमावत ने कहा कि झीलों, नदियों और बरसाती नालों का वैज्ञानिक वनीकरण और वनस्पतीकरण केवल सौंदर्यीकरण का कार्य नहीं, बल्कि समग्र झील, नदी  संरक्षण का सर्वश्रेष्ठ तरीका है।


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