जैसलमेर जिले का पहला ग्रामदानी गाँव, कभी खादी उत्पादन का राष्ट्रीय केन्द्र, आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्षरत
- डॉ. दीपक आचार्य
संत कबीरदास ने अपने जीवन से श्रम, समता, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समरसता का जो संदेश दिया, उसका एक जीवंत प्रतीक राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित कबीर बस्ती है। यह वही गाँव है जिसे कबीर की विचारधारा से प्रेरित होकर बसाया गया, जहाँ खादी के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का स्वप्न देखा गया, और जिसे समय-समय पर आदर्श ग्राम तथा गाँधी ग्राम जैसी पहचान भी मिली। विडम्बना यह है कि इतने सम्मानजनक विशेषण मिलने के बावजूद यह गाँव आज भी अपेक्षित विकास की प्रतीक्षा कर रहा है।
स्वाधीनता सेनानियों का सपना
कबीर बस्ती की स्थापना केवल एक नए गाँव के निर्माण की योजना नहीं थी, बल्कि सामाजिक उत्थान का एक प्रयोग था। स्वतंत्रता सेनानी माणिक्यलाल वर्मा, गोकुल भाई भट्ट, सिद्धराज ढड्डा, गंगासिंह मोहता तथा स्थानीय समाजसेवियों भगवानदास माहेश्वरी, गोवर्धन कल्ला, लालचन्द जोशी, ताराचन्द जगाणी और सत्यदेव व्यास के सहयोग से दलित समाज के कार्यकर्ताओं अमोलकराम, चान्दाराम और खुशालाराम ने खादी को आधार बनाकर आत्मनिर्भर आदर्श ग्राम की परिकल्पना की।
इसी उद्देश्य से पारेवर गाँव के 27 मेघवाल परिवारों को बसाकर 3 मार्च 1961 को कबीर बस्ती की नींव रखी गई। उस समय लक्ष्य स्पष्ट था—हर परिवार को आवास, पानी, खेती और रोजगार उपलब्ध कराना।
खादी ने दिलाई राष्ट्रीय पहचान
कबीर बस्ती शीघ्र ही खादी उत्पादन का महत्वपूर्ण केन्द्र बन गई। यहाँ स्थापित कबीरबस्ती खादी उत्पादक सहकारी समिति लिमिटेड ने 11 गाँवों के लगभग 250 बुनकरों और 5000 कतिनों को रोजगार उपलब्ध कराया। प्रतिवर्ष लगभग 30 लाख रुपये का ऊनी खादी उत्पादन और 35 से 37 लाख रुपये का विक्रय इस गाँव की पहचान बन गया।
यहाँ निर्मित पटू, हिरावल, बरड़ी, चूनरी और लेडीज़ शॉल देश के अनेक हिस्सों तक पहुँचते थे। आज यह गौरवशाली परम्परा लगभग लुप्तप्राय है और खादी उद्योग पुनर्जीवन की प्रतीक्षा कर रहा है।
जब राजीव गांधी पहुँचे कबीर बस्ती
कबीर बस्ती की उपलब्धियों ने राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया। 10 अगस्त 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस गाँव का दौरा किया और इसे "गाँधी का थाना" कहकर इसकी विशिष्ट पहचान को रेखांकित किया। इससे पूर्व अनेक सांसद एवं राष्ट्रीय स्तर के प्रतिनिधि भी यहाँ आ चुके थे।
राजस्थान का पहला ग्रामदानी गाँव
कबीर बस्ती को जैसलमेर जिले का ही नहीं, बल्कि राजस्थान का पहला ग्रामदानी गाँव होने का गौरव प्राप्त है। यह गाँव आज भी शत-प्रतिशत साक्षरता और महिला शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि रखता है। लगभग 200 परिवारों की इस बस्ती से अनेक लोग विभिन्न सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं।
विकास की अधूरी कहानी
वर्ष 2020 में कबीर बस्ती प्रवास के दौरान ग्रामीणों से विस्तृत चर्चा का अवसर मिला। उन्होंने गाँव के विकास के लिए वर्षों से लंबित अनेक मांगों की जानकारी दी।
ग्रामीणों की प्रमुख अपेक्षाएँ हैं—
ग्रामीणों का कहना है कि इन मांगों का अधिकांश हिस्सा आज भी अधूरा है।
पानी और सड़क आज भी चुनौती
गाँव की सबसे बड़ी समस्या पानी और आधारभूत सुविधाओं की है। लिफ्ट सिंचाई तथा खड़ीन आधारित कृषि के प्रयास अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सके। गर्मियों में पेयजल संकट बना रहता है।
ग्रामीण यह भी बताते हैं कि क्षेत्र से होकर औद्योगिक उपयोग के लिए पाइपलाइन तो गुज़री, किन्तु गाँव को उसका अपेक्षित लाभ नहीं मिला। भारी वाहनों के कारण सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं और स्थानीय लोगों को पर्याप्त प्रतिपूर्ति भी नहीं मिल सकी। इन विषयों पर ग्रामीण लंबे समय से समाधान की अपेक्षा कर रहे हैं।
कबीर का नाम तभी सार्थक होगा...
कबीर बस्ती केवल एक गाँव नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, श्रम और आत्मनिर्भरता के उस स्वप्न की प्रतीक है जिसे संत कबीर के विचारों से प्रेरणा मिली थी।
कबीर जयंती केवल संत के दोहों का स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को धरातल पर उतारने का भी दिन है। यदि कबीर के नाम पर बसे इस ऐतिहासिक गाँव को योजनाबद्ध विकास, आधारभूत सुविधाएँ और खादी उद्योग का पुनर्जीवन मिल सके, तो यह संत कबीर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, प्रशासन, जनप्रतिनिधि और समाज मिलकर कबीर बस्ती को उसके गौरव के अनुरूप विकसित करें। तभी कबीर के नाम पर बसी इस बस्ती का नाम वास्तव में सार्थक सिद्ध होगा।