एमपीयूएटी की उन्नत मक्का किस्म ‘पी.एच.एम.-6’ से बढ़ेगी किसानों की आय: डॉ. शंकर लाल जाट

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Published on : 30 Jun, 26 18:06

चौथपुरा गांव में अखिल भारतीय मक्का अनुसंधान परियोजना के तहत कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित

एमपीयूएटी की उन्नत मक्का किस्म ‘पी.एच.एम.-6’ से बढ़ेगी किसानों की आय: डॉ. शंकर लाल जाट

उदयपुर । महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी), उदयपुर में संचालित अखिल भारतीय समन्वित मक्का अनुसंधान परियोजना (AICRP on Maize) के अंतर्गत ग्राम चौथपुरा में मक्का की उन्नत खेती पर एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम 29.06.2026 को आयोजित किया गया। कार्यक्रम में किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों, उन्नत किस्मों, पोषक तत्व प्रबंधन तथा फसल संरक्षण के वैज्ञानिक उपायों की विस्तृत जानकारी प्रदान की गई।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. शंकर लाल जाट, अखिल भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, लुधियाना ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि एमपीयूएटी द्वारा विकसित मक्का की उन्नत किस्म पीएचएम-6 (PHM-6) अपनी उच्च उत्पादन क्षमता, उत्कृष्ट गुणवत्ता तथा विभिन्न कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल होने के कारण किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रही है। उन्होंने विश्वविद्यालय द्वारा संचालित अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन (Front Line Demonstrations–FLDs) की सराहना करते हुए कहा कि इन प्रदर्शनों के माध्यम से नवीन कृषि तकनीकों का तेजी से प्रसार हो रहा है और किसान वैज्ञानिक खेती अपनाकर अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर रहे हैं।

अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन प्रभारी डॉ. हरीश कुमार सुमेरिया ने मक्का की वैज्ञानिक बुवाई, उन्नत बीजों के चयन, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण तथा समेकित फसल प्रबंधन पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने किसानों से वैज्ञानिक अनुशंसाओं के अनुरूप खेती अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि इससे उत्पादन लागत कम होगी तथा अधिक एवं गुणवत्तापूर्ण उपज प्राप्त होगी।

कार्यक्रम में पादप सूत्रकृमि एवं पादप रोग विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक राम नारायण कुम्हार ने मक्का फसल में लगने वाले सूत्रकृमि (नेमाटोड), प्रमुख रोगों, उनके प्रारंभिक लक्षणों तथा प्रभावी रोकथाम एवं समेकित प्रबंधन के उपायों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने किसानों को नियमित फसल निरीक्षण एवं समय पर नियंत्रण उपाय अपनाने की सलाह दी, जिससे फसल को रोगों एवं कीटों से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।

प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान किसानों ने वैज्ञानिकों से विभिन्न तकनीकी विषयों पर चर्चा कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। किसानों ने विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को अत्यंत उपयोगी बताते हुए भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों के नियमित आयोजन की अपेक्षा व्यक्त की।


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