मैं नगर निगम द्वारा मुखर्जी चौक सब्जी मार्केट के बाहर वर्षों से अपनी आजीविका चला रही महिला फल एवं सब्जी विक्रेताओं को हटाने की कार्रवाई की कड़ी निंदा करता हूँ।
हम शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को बेहतर बनाने और सुव्यवस्थित करने के विरोधी नहीं हैं। यदि प्रशासन शहर को व्यवस्थित करना चाहता है तो यह स्वागत योग्य कदम है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस अभियान की शुरुआत केवल मुखर्जी चौक से ही क्यों की गई?
उदयपुर के कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ यातायात की स्थिति मुखर्जी चौक से भी अधिक गंभीर है। दिल्ली गेट, तीज का चौक तथा शहर के अन्य प्रमुख स्थानों पर लंबे समय से अव्यवस्था बनी हुई है, लेकिन वहाँ समान रूप से कार्रवाई देखने को नहीं मिलती। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि चयनात्मक कार्रवाई क्यों की जा रही है।
मुखर्जी चौक पर सभी धर्मों और समाजों के लोग व्यापार करते हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि यहाँ बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाएँ वर्षों से फल एवं सब्जी बेचकर अपने परिवार का पालन-पोषण करती रही हैं। जब कार्रवाई केवल ऐसे स्थानों पर अधिक दिखाई देती है जहाँ अल्पसंख्यक समुदाय की आजीविका या धार्मिक-सामाजिक गतिविधियाँ जुड़ी हों, तो समाज में संदेह और असंतोष का वातावरण बनता है।
हाल के समय में इमरत रसूल बाबा के बाहर पार्किंग का मामला, चेतक मस्जिद क्षेत्र की विधायक द्वारा निरंतर अनर्गल बयानबाज़ी , नागा नगरी में कथित एकतरफा कार्रवाई तथा अब मुखर्जी चौक के फल - सब्ज़ी विक्रेताओं को हटाना—इन घटनाओं के क्रम को देखकर आमजन में यह धारणा बन रही है कि अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े मामलों में प्रशासन का रवैया समानता का नहीं है। ऐसी धारणा सामाजिक सौहार्द के लिए उचित नहीं है।
मेरी राज्य सरकार और नगर निगम प्रशासन से मांग है कि किसी भी प्रकार की कार्रवाई बिना किसी भेदभाव के पूरे शहर में समान रूप से लागू की जाए। साथ ही, इन गरीब महिला विक्रेताओं के पुनर्वास और सम्मानजनक आजीविका की समुचित व्यवस्था किए बिना उन्हें हटाना न्यायसंगत नहीं है।
हम प्रशासन से आग्रह करते हैं कि ट्रैफिक सुधार और शहर के विकास के साथ-साथ गरीबों के रोजगार, संवैधानिक समानता और सामाजिक सौहार्द का भी पूरा ध्यान रखा जाए।