मेवाड़ में सर्वप्रथम महाराणा स्वरूप सिंह ने उदयपुर शहर के बाहर चेटक सर्कल से स्वरूप सागर के आस पास पांच सौ बीघा भूमि ईसाई मिशनरी चिकित्सा एवं शिक्षा सेवा कार्य हेतु प्रदान की। जिसमें डॉ. शेपर्ड का महत्वपूर्ण योगदान था वह उदयपुर पहुँचने वाला पहला चिकित्सक था जो स्कोटिश मिशन के द्वारा शिक्षा एवं चिकित्सा के उद्देश्य से यहाँ आया था।
डॉ. शेपर्ड के द्वारा लिखित पुस्तक “शेपर्ड ऑफ उदयपुर - द लेण्ड आई लव्ड” से ज्ञात होता है कि नवम्बर सन् 1877 में डॉ. शेपर्ड मात्र 29 वर्ष की युवावस्था में विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक राजवंश की राजधानी उदयपुर नगर में अजमेर - देवली होते हुए पहुँचा। प्राचीन मार्ग से हटकर 180 किलोमीटर दूरी पार कर भारत की वीर भूमि चित्तौड़ के गौरवपूर्ण इतिहास की जानकारी ली। शेपर्ड ने अपनी पुस्तक “शेपर्ड ऑफ उदयपुर - द लेण्ड आई लव्ड” के प्रारम्भिक चार अध्यायों में राजपूत जाति और उनके शौर्य, पराक्रम के साथ देश प्रेम, उदात चरित्र का वर्णन करते हुए राजपूत जाति में प्रचलित अफीम एवं शराब के व्यसन के कारण विश्व प्रसिद्ध अति प्राचीन कुलीन नस्ल की दुर्बलता का चित्रण भी किया। टॉडगढ़ से उदयपुर आने के मार्ग के जानकार मुन्नवीर खाँ ने उसे देवगढ़ व मगरा क्षेत्र के निवासियों व उनके कठोर जीवन का ज्ञान दिया।
सन् 1877 उसने अपनी पुस्तक के पृष्ठ 95-96 पर उदयपुर नगर के अतिसुन्दर फोटो एवं इसके साथ स्वरूप सागर के दरवाजे का दृश्यांकन किया, इसकी पुस्तक में दिये गये तत्कालीन उदयपुर नगर के प्राकृतिक दृश्य और झीलों तथा स्मारकों के सम्भवतः दुर्लभ चित्र है।
अपनी इसी पुस्तक के पृष्ठ 103 - 106 पर उदयपुर नगर में गिर्वा स्थित सभी ऐतिहासिक स्थलों यथा राजमहल, पीछोला, जगदीश मंदिर, जगमन्दिर, जल महल, स्वरूप सागर इत्यादि का भ्रमण कर उसने उनके बारे में प्रामाणिक विवरण भी लिखा। शेपर्ड ने ब्यावर से अपने साथ आए खुदाबक्श नामक व्यक्ति को पहला इसाई धर्म में दीक्षित कर यहाँ रखा था।
स्मरण रहे उदयपुर के चेटक सर्कल स्थित मेवाड़ का सबसे पुराना चर्च है जो डॉ. शेपर्ड की स्मृति में ही आज भी जाना जाता है। डॉ. शेपर्ड एक प्रसिद्ध चिकित्सक था। उसने अपनी निजी आय से उदयपुर में यहाँ अस्पताल खोलकर गरीबों व पीड़ित लोगों की चिकित्सा सेवा की। उसे इस मिशन हेतु अपने मातृदेश स्कॉटलैण्ड से उसे इस बाबत् आर्थिक सहायता मिलती थी। उदयपुर में वह धानमण्डी स्थित एक किराए के मकान में रहता और उसके पास अस्पताल चलाने की स्वीकृति स्थानीय गृहस्वामी व महाराणा की स्वीकृति आवश्यक थी। इसके अभाव में वह शहर की मण्डी मार्ग में एक व्यापारी के यहाँ किराए के मकान में रहते हुए चिकित्सा का कार्य करता रहा।
इसी अवधि में मेवाड़ महाराणा सज्जनसिंह गम्भीर रूप से रूग्ण हो गए अतः उनकी चिकित्सा हेतु रेजिडेन्सी सर्जन डॉ. शोमरवेल को महाराणा की चिकित्सा हेतु डॉ. शेपर्ड को भी उसके साथ नियुक्त किए गए। शोमरवेल व शेपर्ड की दवाइयों से महाराणा बीमारी से मुक्त हो गए। इस पर उन्होंने तुरन्त राजमहल बुलाकर 3000 रू. फीस दी। शोमरवेल ने चिकित्सा शुल्क नहीं लेना चाहा, परन्तु महाराणा ने उसे अपना कर्त्तव्य समझ फीस दे दी। इस बात पर डॉ. शेपर्ड ने बताया कि हम चिकित्सा सेवा का कार्य करते हैं हमारा उद्देश्य लाभ प्राप्त करना नहीं रहा है। अतः आप जो 3000 रू. दे रहे हैं, उस राशि से हमें उचित स्थान पर भूमि का एक प्लॉट खरीदने की आज्ञा प्रदान करें तो हम वहाँ चिकित्सालय बनाकर जनोपयोगी कार्य करेंगे। महाराणा ने मेवाड़ के प्रधान को आदेशित कर धानमण्डी में अस्पताल के लिये भूमि का पट्टा प्रदान किया। साथ ही आवश्यक धनराशि भी प्रदान की। इस प्रकार उदयपुर मेवाड़ में प्रथम चिकित्सालय धानमण्डी में चलाया गया। कुछ समय बाद स्वस्थ होकर महाराणा चित्तौड़ गए तो साथ में डॉ. शोमरवेल एवं डॉ. शेपर्ड भी था। डॉ. शोमरवेल ने मिशन बोर्ड द्वारा प्रेषित पत्र महाराणा को दिया जिसमें उनके द्वारा उदयपुर में मिशन हॉस्पीटल खोलने की स्वीकृति के साथ इस पुनीत कार्य हेतु भूमि का पट्टा व राशि स्वीकृत की थी।
किन्तु कुछ महीनों बाद महाराणा सज्जन सिंह पुनः बीमार पड़ गए उस वक्त उनकी चिकित्सा की देखरेख डॉ. शेपर्ड एवं रेजिडेन्ट डॉ. मुले करते थे, किन्तु कुछ ही दिनों बाद सज्जनसिंह का देहावसान हो गया और जब महाराणा फतहसिंह के राज्यारोहण की कानूनी पहेली बनी उसका चश्मसाक्षी डॉ. शेपर्ड था उसने अपनी पुस्तक में लिखा कि महाराणा सज्जनसिंह ने निधन के पूर्व अपने उत्तराधिकार का कोई वसीयत नामा नहीं लिखा और न ही कोई मौखिक रूप में नाम नामित किया।
इस संकट के साथ प्रधान पन्नालाल मेहता को ब्रिटिश रेजिडेन्ट ने निर्देश दिया कि बिना ब्रिटिश सरकार के स्वीकृत आदेश के उत्तराधिकारी चुनने और उसके राज्यारोहण की कार्यवाही नहीं करेंगे।
महाराणा फतह सिंह के महाराणा बनने के कानूनी और परम्परागत नियमों की जानकारी हेतु उस वक्त ब्रिटिश रेजिडेन्ट ने तत्कालीन मेहता पन्नालाल से सलाह ली कि मेवाड़ में उत्तराधिकार के नियम क्या है, तब प्रधान पन्नालाल मेहता ने बताया कि सामन्त मण्डल से सलाह लें, सामन्तों ने कहा कि राजमाता जीवित है अतः उनसे पूछंे कि क्या बागोर, करजाली में कोई पुरूष उत्तराधिकारी है तब पता चला कि केवल शिवरती परिवार में जो सबसे छोटा था, उसका पुत्र फतहसिंह ही योग्य है। अतः रेजिडेन्ट एवं प्रधान मेहता पन्नालाल कुछ चयनित सामन्तों को लेकर बागोर हवेली पहुँचे वहाँ राजमाता से पूछा तो उसने शर्त रखी कि यदि बागोर परिवार से कोई पुत्र हो जाएगा तो महाराणा के पद पर उसे ही अधिकृत माना जावे। इस कारण सज्जन सिंह की मृत्यु के बाद महाराणा फतहसिंह का राज्यारोहण पर्व सम्पन्न हुआ।
महाराणा फतहसिंह के राज्यारोहण होने के दूसरे दिन शेपर्ड राजमहल गया और उसने महाराणा को नजराना भेंट किया, उस पर महाराणा ने 11,000 रू. चिकित्सा शुल्क के लिए दिए। उस पर शेपर्ड ने बताया कि इस राशि के स्वर्गीय महाराणा सज्जन सिंह की स्मृति में अस्पताल में पृथक वार्ड बनवाने की स्वीकृति प्रदान की जाये।