धर्म का धन : श्रद्धा की अमानत, स्वार्थ का साधन नहीं

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Published on : 06 Jul, 26 16:07

- श्रमण डॉ पुष्पेन्द्र ।

धर्म का धन : श्रद्धा की अमानत, स्वार्थ का साधन नहीं

समाज की सबसे बड़ी शक्ति यदि कोई है, तो वह उसकी आस्था है। धन, सत्ता, ज्ञान और संसाधन समय के साथ बदल सकते हैं, परंतु जिस समाज की आस्था जीवित रहती है, वह समाज हर संकट से उबरने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि मंदिर, स्थानक, तीर्थ, उपाश्रय और धर्मस्थल केवल ईंट-पत्थरों से निर्मित भवन नहीं होते, बल्कि वे करोड़ों श्रद्धालुओं की श्रद्धा, तप, त्याग और विश्वास के जीवंत केंद्र होते हैं।

एक श्रद्धालु जब धर्मस्थल में प्रवेश करता है, तो वह केवल पूजा करने नहीं आता; वह अपने मन की व्यथा, आशा, कृतज्ञता और विश्वास भी वहीं अर्पित करता है। उसकी दक्षिणा केवल मुद्रा नहीं होती, बल्कि उसकी मेहनत की कमाई, उसके परिवार का विश्वास और धर्म के प्रति उसका समर्पण होता है। इसलिए धर्मस्थलों में आने वाला प्रत्येक अंश समाज की अमानत है।

दुर्भाग्य तब उत्पन्न होता है, जब धर्म के नाम पर प्राप्त धन या संसाधनों का उपयोग धर्म के उद्देश्य से हटकर व्यक्तिगत लाभ, वैभव, प्रतिष्ठा या स्वार्थ के लिए होने लगे। यह केवल आर्थिक अनियमितता नहीं होती, बल्कि समाज की आस्था पर कुठाराघात होता है। जिस धन में हजारों श्रद्धालुओं की भावनाएँ जुड़ी हों, उसका दुरुपयोग केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि आत्मा और अंतरात्मा का भी विषय है।

इतिहास साक्षी है कि धर्म का धन कभी किसी को स्थायी सुख नहीं दे पाया। जो संपत्ति छल, विश्वासघात या धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके अर्जित होती है, वह बाहर से भले वैभव का प्रदर्शन करे, पर भीतर शांति नहीं दे सकती। भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि अनुचित साधनों से प्राप्त धन अंततः विनाश का कारण बनता है। धर्म के धन के संदर्भ में यह बात और भी अधिक सत्य प्रतीत होती है, क्योंकि उसमें केवल धन नहीं, असंख्य लोगों की श्रद्धा समाहित होती है।

जैन दर्शन के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने मानवता को संयम, सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह का अमूल्य संदेश दिया। इनमें अपरिग्रह का सिद्धांत विशेष रूप से आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है। अपरिग्रह का अर्थ केवल अधिक वस्तुएँ न रखना नहीं है; इसका वास्तविक अर्थ है—लोभ, स्वार्थ, संग्रह की मानसिकता और अधिकार के दुरुपयोग से स्वयं को मुक्त करना।

यदि धर्म से जुड़े व्यक्ति ही अपरिग्रह को भूल जाएँ और धर्म को संग्रह, प्रभाव या व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का साधन बना लें, तो भगवान महावीर के संदेश का सार ही समाप्त हो जाता है। धर्म का उद्देश्य मनुष्य को बड़ा बनाना नहीं, बल्कि उसके अहंकार को छोटा करना है। धर्म हमें अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व सिखाता है; संग्रह नहीं, समर्पण सिखाता है; स्वार्थ नहीं, सेवा का मार्ग दिखाता है।

धर्मस्थलों का निर्माण समाज के सहयोग से होता है। एक गरीब व्यक्ति अपनी छोटी-सी बचत से दान देता है, कोई किसान अपनी उपज का अंश अर्पित करता है, कोई व्यापारी अपनी आय का हिस्सा धर्मकार्य में लगाता है। सभी की भावना एक ही होती है—धर्म जीवित रहे, संस्कृति सुरक्षित रहे और आने वाली पीढ़ियाँ भी इन मूल्यों से जुड़ी रहें। ऐसे में यदि उस विश्वास को ठेस पहुँचती है, तो केवल एक व्यक्ति नहीं, पूरा समाज आहत होता है।

आज आवश्यकता आरोप लगाने या विवाद बढ़ाने की नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि की है। धर्मस्थलों का संचालन पूर्ण पारदर्शिता, ईमानदारी और उत्तरदायित्व के साथ होना चाहिए। आय-व्यय का स्पष्ट लेखा-जोखा, समाज के प्रति जवाबदेही और धर्म के उद्देश्य के अनुरूप संसाधनों का उपयोग—ये केवल प्रशासनिक व्यवस्थाएँ नहीं, बल्कि धार्मिक मर्यादाएँ हैं।

समाज को भी यह समझना होगा कि धर्म की रक्षा केवल दान देने से नहीं होती, बल्कि धर्म की मर्यादाओं की रक्षा करने से होती है। जहाँ पारदर्शिता है, वहाँ विश्वास बढ़ता है; जहाँ विश्वास बढ़ता है, वहीं धर्म फलता-फूलता है। यदि कहीं त्रुटि दिखाई दे, तो उसका समाधान भी धर्मसम्मत, संयमित और संवादपूर्ण तरीके से होना चाहिए। कटुता, आरोप और वैमनस्य किसी भी धार्मिक वातावरण को शुद्ध नहीं बना सकते।

हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि व्यक्ति से बड़ा धर्म है, पद से बड़ी मर्यादा है और संस्था से बड़ी आस्था है। व्यक्ति बदल सकते हैं, व्यवस्थाएँ बदल सकती हैं, परंतु धर्म और उसकी प्रतिष्ठा अक्षुण्ण रहनी चाहिए। यदि धर्म की पवित्रता सुरक्षित रहेगी, तो समाज का विश्वास भी अडिग रहेगा।

भगवान महावीर का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा वैभव संग्रह में नहीं, त्याग में है; अधिकार में नहीं, उत्तरदायित्व में है; और बाहरी संपत्ति में नहीं, अंतःकरण की निर्मलता में है। यही संदेश आज प्रत्येक धार्मिक संस्था, प्रत्येक पदाधिकारी और प्रत्येक श्रद्धालु के लिए समान रूप से प्रासंगिक है।

आइए, संकल्प लें कि धर्म को कभी स्वार्थ का साधन नहीं बनने देंगे। मंदिर, स्थानक और तीर्थ केवल भवन नहीं, हमारी आत्मा के प्रतीक हैं। उनकी पवित्रता, पारदर्शिता और मर्यादा की रक्षा करना हम सभी का नैतिक और धार्मिक कर्तव्य है। जब धर्म शुद्ध रहेगा, तभी समाज सुदृढ़ रहेगा; और जब आस्था सुरक्षित रहेगी, तभी संस्कृति अमर रहेगी।
 


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