लोक संस्कृति का ध्रुवतारा हुआ अस्त : के.सी. मालू की विदाई, एक युग का अवसान

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Published on : 14 Jul, 26 17:07

गोपेन्द्र नाथ भट्ट 

लोक संस्कृति का ध्रुवतारा हुआ अस्त : के.सी. मालू की विदाई, एक युग का अवसान

राजस्थान की लोक संस्कृति, संगीत और राजस्थानी भाषा आंदोलन के आकाश से एक ऐसा ध्रुवतारा विलुप्त हो गया, जिसकी आभा ने दशकों तक लोक परंपराओं को नई ऊर्जा, नई पहचान और वैश्विक प्रतिष्ठा प्रदान की। वीणा म्यूजिक समूह के संस्थापक, कला और संगीत के अप्रतिम मर्मज्ञ तथा ‘राजस्थान रत्न’ से सम्मानित केशरी चंद मालू (के.सी. मालू) का निधन केवल एक व्यक्ति का निधन नहीं, बल्कि एक ऐसे युग का अवसान है जिसने राजस्थान की लोकधुनों को गाँव की चौपालों से उठाकर विश्व मंच तक पहुँचाया।

राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने उनके निधन को राजस्थान की लोक संस्कृति के लिए अपूरणीय क्षति कहा । वहीं मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने उन्हें राजस्थानी लोक संगीत और संस्कृति को नई पहचान दिलाने वाला युगपुरुष बताया, जबकि विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि राजस्थान रत्न पुरस्कार से सम्मानित के.सी. मालू ने राजस्थानी लोक संगीत को विश्वभर में प्रतिष्ठा दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। केन्द्रीय पर्यटन और संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि राजस्थानी लोक संगीत के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में उनका अमूल्य योगदान सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल की यह टिप्पणी विशेष रूप से हृदय को स्पर्श करती है कि “आज राजस्थानी संगीत का ध्रुवतारा नेपथ्य में डूब गया।” वास्तव में यह केवल एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उनके विराट सांस्कृतिक व्यक्तित्व का सबसे सटीक मूल्यांकन है।

मंगलवार को जयपुर के अजमेर रोड स्थित पुरानी चुंगी मोक्षधाम में जैन रीति-रिवाजों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया गया। ज्येष्ठ पुत्र हेमजीत मालू और छोटे पुत्र प्रसन्नजीत मालू ने मुखाग्नि देकर अपने पिता को अंतिम विदाई दी। वातावरण में गहरा मौन था, आँखों में नमी थी और हर चेहरा यह स्वीकार कर रहा था कि आज राजस्थान ने अपनी सांस्कृतिक चेतना का एक अमूल्य प्रहरी खो दिया है। अंतिम यात्रा में केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल सहित अनेक जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों, साहित्यकारों, कलाकारों, संगीतकारों और हजारों शुभचिंतकों ने श्रद्धासुमन अर्पित किए। सुप्रसिद्ध ग़ज़ल गायिका पीनाज़ मसानी सहित देशभर के अनेक कलाकारों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण थी कि के.सी. मालू केवल राजस्थान के नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक जगत के सम्मानित व्यक्तित्व थे।

के.सी. मालू ने उस समय लोक संगीत को अपना जीवन समर्पित किया, जब आधुनिक मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के बीच लोकधुनें धीरे-धीरे हाशिये पर जा रही थीं। उन्होंने केवल गीतों की रिकॉर्डिंग नहीं की, बल्कि लोक कलाकारों की प्रतिभा को पहचानकर उन्हें मंच दिया, सम्मान दिया आत्मविश्वास और रोजगार दिया। वीणा कैसेट्स के माध्यम से असंख्य लोकगीत, भजन, मांड, पधारो म्हारे देस की स्वर-लहरियाँ और राजस्थानी संस्कृति की आत्मा देश-विदेश तक पहुँची। आज भी राजस्थान के घर-घर में गूँजने वाले अनेक लोकगीतों के पीछे कहीं न कहीं के.सी. मालू की दूरदृष्टि और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता की छाप दिखाई देती है। केशरी चंद मालू अपने आपमें एक संस्थान थे और यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि उनके एकल प्रयास से राजस्थानी गीत और संगीत सम्पूर्ण भारत ही नहीं विश्व के हर घर तक पहुँचने में सफल हुआ । उन्होंने संगीत की कैसेट्स से और रेडियो टेलीविजन तथा आधुनिक सोशल मीडिया प्लेटफार्म के हर दौर को देखा।

उनका योगदान केवल संगीत तक सीमित नहीं था। बल्कि वे राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाने के आंदोलन के प्रमुख स्तंभों में रहे। पिछले दिनों जब सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को भारत सरकार की नई नीति के अनुरूप प्रारम्भिक शिक्षा में मातृ भाषा राजस्थानी में शिक्षा देने के लिए एक नीति और पाठ्यक्रम बना उसे लागू करने के निर्देश दिए तो के सी मालू ने इसके पक्ष में मुखर होकर उच्चतम में याचिका दायर करने वाले राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार और दैनिक जलते दीप और राजस्थानी मासिक पत्रिका माणक के प्रधान संपादक की प्रशंसा करते हुए एक सार्वजनिक बयान भी जारी किया। मालू ने राजस्थान भाषा मान्यता समिति जिसके वे स्वयं अध्यक्ष थे के बैनर नई दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदेश के विभिन्न भागों से पहुंचे राजस्थान भाषा समर्थकों के एक बड़े प्रदर्शन और सभा का नेतृत्व किया और प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी से मिलने गए शिष्टमंडल में भी शामिल हुए। उन्होंने जीवनभर यह विश्वास जगाया कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और अस्मिता की आधारशिला होती है। उनकी आवाज़ सदैव राजस्थानी भाषा के सम्मान और उसके संवैधानिक अधिकारों के लिए उठती रही।

राजस्थानी संगीत एवं लोक कलाओं की सेवा करने के साथ ही मालू अपने पैतृक गांव चूरू जिले के सुजानगढ़ कस्बें में ढाई सौ करोड़ रु की लागत से 300 पलंगों का एक सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बनाने में भी अहम भूमिका निभा रहे थे । अपने जीवन के इस सपने को पूरा करने तथा अपनी जन्म भूमि के प्रति ऋण चुकाने के कार्य में वे अपने जीवन की अंतिम सांस तक जुटे रहें।

जीवन की सबसे बड़ी सफलता पुरस्कारों को हासिल करने में नहीं है , बल्कि लोगों की स्मृतियों में जीवित रहने में होती है। के.सी. मालू ने यह दुर्लभ स्थान अपने कर्म, अपनी सादगी और अपनी सांस्कृतिक साधना से अर्जित किया। उन्होंने कभी स्वयं को केंद्र में नहीं रखा। उनके लिए सदैव कलाकार, लोकधुन और राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत ही सर्वोपरि रही। शायद यही कारण है कि उनके जाने पर केवल उनका परिवार ही नहीं, पूरा राजस्थान स्वयं को शोकाकुल अनुभव कर रहा है। बुधवार को जयपुर के अनुविभा भवन में आयोजित होने वाली श्रद्धांजलि सभा निश्चय ही केवल औपचारिक आयोजन नहीं होगी, बल्कि उस सांस्कृतिक तपस्वी के प्रति सामूहिक कृतज्ञता का भाव होगी, जिसने अपने जीवन की हर सांस राजस्थान की लोक आत्मा को समर्पित कर दी।शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है, किन्तु संस्कृति के लिए जिया गया जीवन कभी समाप्त नहीं होता।

के.सी. मालू आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी स्वर-साधना, उनका सांस्कृतिक दृष्टिकोण और लोकधरोहर के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहेगा। जब-जब राजस्थानी लोकगीतों की मधुर तान गूँजेगी, जब-जब किसी नए कलाकार को मंच मिलेगा और जब-जब राजस्थान अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करेगा, तब-तब के.सी. मालू की स्मृति उसी उजास के साथ जीवित रहेगी, जैसे मरुभूमि के आकाश में सदैव चमकता कोई ध्रुवतारा।
 


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