मानसून का इंतजार करते-करते पथरा गई किसानों की आंखें, खरीफ फसलों पर संकट की गहराती चिंता

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Published on : 19 Jul, 26 05:07

त्वरित टिप्पणी:गोपेन्द्र नाथ भट्ट 

मानसून का इंतजार करते-करते पथरा गई किसानों की आंखें, खरीफ फसलों पर संकट की गहराती चिंता

 

भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है और देश की कृषि व्यवस्था का सबसे बड़ा आधार मानसून है। विशेष रूप से राजस्थान जैसे राज्य में मानसून केवल मौसम नहीं, बल्कि किसानों के जीवन, आजीविका और उम्मीदों का पर्याय है। इस वर्ष मानसून की धीमी चाल और कई क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। खेत तैयार हैं, बीज और खाद की व्यवस्था हो चुकी है, लेकिन आसमान से बरसने वाली बूंदों का इंतजार करते-करते किसानों की आंखें मानो पथरा गई हैं। समय पर बारिश नहीं होने से खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो रही है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

राजस्थान में खरीफ मौसम की प्रमुख फसलें बाजरा, मूंग, उड़द, सोयाबीन, मूंगफली, मक्का, तिल और कपास हैं। इनकी बुवाई जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के मध्य तक सबसे उपयुक्त मानी जाती है। यदि इस अवधि में पर्याप्त वर्षा नहीं होती है तो बुवाई प्रभावित होती है और उत्पादन में गिरावट की आशंका बढ़ जाती है। कई क्षेत्रों में किसानों ने पहली बारिश के बाद बुवाई कर दी थी, लेकिन उसके बाद लंबे अंतराल तक बारिश नहीं होने से बीजों का अंकुरण प्रभावित हुआ और कई जगह दोबारा बुवाई की नौबत आ गई है। इससे किसानों की लागत बढ़ने के साथ आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है।

राजस्थान के अधिकांश जिले वर्षा आधारित कृषि पर निर्भर हैं। जहां सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं, वहां किसान पूरी तरह मानसून पर आश्रित रहते हैं। बारिश में देरी से केवल खेती ही प्रभावित नहीं होती, बल्कि पशुओं के लिए चारे का संकट भी पैदा होने लगता है। तालाब, बांध और जोहड़ पर्याप्त नहीं भरते, जिससे पेयजल और सिंचाई दोनों की समस्या गहराने लगती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसका सीधा असर लोगों की आजीविका पर पड़ता है।

खरीफ फसलों पर संकट का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता। यदि उत्पादन घटता है तो खाद्यान्न, तिलहन और दलहन की उपलब्धता प्रभावित होती है, जिससे बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे महंगाई पर भी दबाव बढ़ता है। कृषि आधारित उद्योगों और ग्रामीण रोजगार पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार कमजोर मानसून का प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है।

किसानों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि खेती में लगाया गया निवेश कहीं डूब न जाए। बीज, उर्वरक, डीजल और मजदूरी की लागत लगातार बढ़ रही है। यदि समय पर अच्छी वर्षा नहीं होती तो किसानों को कर्ज का बोझ उठाना पड़ सकता है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह स्थिति और अधिक कठिन होती है, क्योंकि उनके पास जोखिम उठाने की क्षमता सीमित होती है।

हालांकि मौसम विभाग का अनुमान है कि मानसून आगे सक्रिय हो सकता है और कई क्षेत्रों में अच्छी वर्षा होने की संभावना है। यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश होती है तो खरीफ फसलों को काफी हद तक राहत मिल सकती है। लेकिन यदि वर्षा का लंबा अंतराल जारी रहता है तो उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना लगभग तय माना जा रहा है।

ऐसी परिस्थितियों में सरकार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराना, आवश्यक होने पर पुनर्बुवाई के लिए सहायता देना, फसल बीमा योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना तथा सिंचाई के वैकल्पिक साधनों को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। साथ ही जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों और जल प्रबंधन को व्यापक स्तर पर बढ़ावा देना भी भविष्य के लिए स्थायी समाधान साबित हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का स्वरूप लगातार बदल रहा है। कभी अत्यधिक वर्षा तो कभी लंबे समय तक सूखे जैसी परिस्थितियां अब सामान्य होती जा रही हैं। ऐसे में कृषि क्षेत्र को भी नई तकनीकों, सूखा सहनशील बीजों और आधुनिक कृषि पद्धतियों के अनुरूप ढालने की आवश्यकता है, ताकि मानसून की अनिश्चितता का प्रभाव कम किया जा सके।

अंततः कहा जा सकता है कि मानसून का इंतजार केवल किसानों का इंतजार नहीं, बल्कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का इंतजार है। समय पर और संतुलित वर्षा ही खेतों में हरियाली, किसानों के चेहरे पर मुस्कान और बाजार में स्थिरता ला सकती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि मानसून शीघ्र सक्रिय होगा और किसानों की पथराई आंखों में फिर से उम्मीद और समृद्धि की नई किरण दिखाई देगी।


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