उदयपुर की लेखिका श्रीमती सुलेखा श्रीवास्तव की कृति मुक्तक बिंदु , मुक्तकों का एक ऐसा रंगबिरंगा गुलदस्ता है जिसमें शब्दों के तानेबाने में जीवन के विभिन्न फूलों की महक को महसूस किया जा सकता है। कृति में मोतियों की मणि माला की तरह पिरोए गए शब्दों के फूल हैं । ये पुष्प हैं भावनाओं के, जज्बातों के, प्राकृतिक सौंदर्य के, अलमस्त बचपन के, प्रेम की सुगंध के, अध्यात्म की गंध के, परिवार के सपनों के, समाज की विद्रूपताओं के, जीवन के फलसफे के, व्यक्ति और समाज के दर्द के, काव्य के विविध रसों के, मानव मन में उठने वाली तरंगों के जिन्हें शब्दों के तीनेबाने में बुन कर लेखिका ने अपने मन उमड़ती भावनाओं को संजोने का प्रयास कर पाठकों को आईना दिखाया है। इस कृति के दो खंडों में ये मुक्तक पाठक को उनके सृजन का सौंदर्य बोध तो कराएंगे ही साथ ही आनंद की गंगा में गोते लगा कर विचार और चिंतन के बिंदु भी उनके सामने रखते हुए , चक्षुओं पर पड़े पर्दे को भी हटाने में कारगर होंगे।

कृति के एक खंड में दो - दो पंक्तियों के 213 और दूसरे खंड में चार - चार पंक्ति के 242 मुक्तक मानव जीवन के परिवेश और संदर्भों के इर्दगिर्द ही दिखाई देते हैं। हर मुक्तक कोई न कोई खुशी, दर्द, पीड़ा, प्रकृति, प्रेम और अध्यात्म का संदेश देता है। ये संदेश इतने प्रभावी हैं कि पाठक के दिल में सीधे उतर कर उसे झकझोर देते हैं और सोचने को विवश कर मानवता की भावनाओं को जगाने में सक्षम हैं।
भाषा की सहजता, सरलता, भावों का प्रवाह रवानी लिए प्रवाहमान है।
मन में उठती तरंगों को ले कर प्रकृति के विविध भावों को सृजित कुछ मुक्तकों की बानगी देखिए.....
सूर्य के तेज और चांदनी का शुक्रिया अदा करते हैं,
झूमती लता गाते झरनों का शुक्रिया अदा करते हैं ।
धूप भुला कर जिंदगी की छांव में ऐ मालिक, तेरी दी हुई सांसों का शुक्रिया अदा करते हैं ।।
बड़ा संदेशा देते हैं यह नन्हे नन्हे फूल,
देखो प्रहरी बनकर बैठे चंहु ओर ये शूल । खुशी से पहले दर्द को तो सहना ही होगा,
शूलों की चुभन के बाद हम तक आना होगा ।।
छा रही है फिर घनी काली घटाएं,
जादू सा बिखराती मौसम की अदाएं ।
आई राधा फूल जुल्फों में सजाए,
कान्हा भी थे बंसी होठों से लगाए ।।
हमारी संस्कृति और पर्व जीवन का बड़ा उल्लास हैं, देखिए होली और संस्कृति को ले कर लिखे गए मुक्तक..............
बसन्त की लिये डोली, फिर से पहुंची होली, फूल खिले मन मुस्काये, सारी बगिया संग होली ।
घर घर पहुंची शोर मचाती मस्तों की टोली, पिचकारी छोड़ते बढ़ते ये इक दूजे के हमजोली ।।
भारत देश वो कहलाता, जो त्योहारों का देश, हर त्योहार के पीछे के संदेशों का ये देश ।
संदेशों में छुपी अपूर्व संस्कृति का ये देश,
इसी से जाना जाता है ये संस्कारो का देश ।।
अध्यात्म की गंध से सुवासित नए अंदाज में लिखें ये मुक्तक देखें.........
आओ हम तुम गीत गाएं, हवा में परचम सा फहराएं,
खिलती कलियों की खुशबू, आज़ाद हवा में लहराएं ।
इतना दिया है मालिक ने, शुकराना अदा कर पाएं,
सौ हाथों से पाया है, दो हाथ जोड़ तो आएं ।।
कब तक रमे रहोगे गृहस्थी में,
आना तो पड़ेगा ही विरक्ति में ।
नैया जो पार लगाना चाहते हो,
डूबना तो पड़ेगा ही भक्ति में ।।
लाख लाख शुकराना, उस अनुपम सत्ता का, छोटी सी झोली में भर दिया खजाना इतना ।
कभी न उसने तोला कोई मोल पात्रता का, पात्रता नन्हीं कश्ती सी, दिया है सागर जितना।।
जीवन का फलसफा दिखाई देता है इन मुक्तकों में.......
अपना लो सुखद स्मृति प्रेम विश्वास त्याग, किस विधि से जागते हैं फिर तुम्हारे भाग । अपने आप ही तुम्हारा दिल बड़ा हो जाएगा, छल कपट जनित जो दुख कहीं खो जाएगा ।।
पत्थर में ढूंढ लिए भगवान,
पूजते हो प्रतिदिन नादान ।
एक बार चलती फिरती, |
मूरत में ढूंढ देखो इंसान ।।
बच्चें और उनकी मनोवृति पर लिखें ये मुक्तक बाल सुलभ वृत्ति को दर्शाते हैं........
बोलते हैं तो फूलों की बारिश किया करते हैं. गहन नहीं हल्की फुल्की बात किया करते हैं । ये नन्हे मासूम हृदय कब घात किया करते हैं, अनबन हो अगले ही पल मेल किया करते हैं ।।
बचपन ने आंखें खोलीं खिलौने घेरे बैठे थे, आईपैड थामे नन्हें हाथ मुंह फेरे से बैठे थे । गुल्ली डंडा कंचे बॉल रूठे रूठे लगते हैं, तितली नैया कागज की झूठे झूठे लगते हैं ।।
जीवन में स्वास्थ्य से बढ़ कर कुछ नहीं। कहा है पहला सुख निरोगी काया। एक मुक्तक स्वास्थ्य पर देखिए.......
चिकित्सालय, तकनीकें, वैज्ञानिक प्रयोग,
पर जरा ध्यान से ही इनका करो उपयोग । स्वास्थ्य के लिए बेहतर है ऐसे तो सिर्फ योग, मजबूरी में लो इनका गर लेना पड़े सहयोग ।।
चुनाव और सरकारी व्यवस्थाओं पर व्यंग्य भी इनके मुक्तकों में यूं नजर आता है......
सुनो सिंहासन डोलता है
वोटर चुप हो बोलता है
बुद्धि मानी या चालाकी
सब एक वोट से तोलता है
टैक्स तो ले लेते हैं सुविधाएं छीन लेते हैं सीनियर सिटीजंस को ये बोझ मान लेते हैं। पौध लगा पालें सींचे वो वृक्ष खड़ा करते हैं, सौंप के तैयार फसल खुद मंच छोड़ देते हैं ।।
ये चुनिंदा सृजन बानगी है उन मुक्तकों की जो इस कृति रूपी गुलदस्ते में जीवन के विभिन्न पहलुओं को अपने में समाए हैं। हर मुक्तक अपने आप में एक फलसफा कहता दिखाई देता हैं। जीवन का कोई भी पक्ष अछूता नहीं है जो इनमें दिखाई न दें। जिस कुशलता से लेखिका ने लिखा है वह उनके सृजन पक्ष की स्वयं गवाही देते हैं।
आमुख में लेखिका लिखती हैं, " इसमें सरल व गंभीर, विभिन्न प्रकार के विषयों पर, विभिन्न स्थितियों में प्रतिक्रिया स्वरूप मन में उठने वाली विभिन्न वैचारिक तरंगों का काव्यम्य चित्रण शामिल है। मुक्तक मूलतः वस्तुस्थिति जन्य साक्ष्य का वाजिब चित्रण प्रस्तुत करते हैं। काव्य के अलंकरण का प्रयास पढ़ते हुए आपका सौंदर्य बोध आपको भावों के सागर में हिचकोले खाती काव्य लहरों की नैया में बिठाकर दूर बहा ले जाएगा जो कि इस पुस्तक का मूल उद्देश्य भी है। " पुस्तक की प्रिंटिंग अच्छी और आवरण पृष्ठ आकर्षक है।
पुस्तक : मुक्तक बिंदु
विधा : पद्य
लेखक : श्रीमती सुलेखा श्रीवास्तव
प्रकाशक : हिमांशु पब्लिकेशन, उदयपुर, नई दिल्ली
मूल्य : 280 ₹
प्रकार : पेपर बैक, पेज : 135
ISBN : 978-93-87201- 13 - 2