पंचम दिवस -
शहर के ऐतिहासिक तपोभूमि लालीवाव मठ में गुरुपूर्णिमा महोत्सव के तहत प.पू. महामण्डलेश्वर हरिओमदासजी महाराज के सानिध्य में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के 5वें दिन रविवार को पहले व्यासपीठ का पूजन और आरती हुई । श्रीमद् भागवत भगवान की आरती पापियों को पाप से है तारती.... । जैसे ही यह आरती शुरु हुई पण्डाल में उपस्थित श्रद्धालु अपने अपने स्थान पर खड़े होकर गाने लगे । इसके बाद व्यास पण्डित अनिल कृष्णजी महाराज ने जोर से बोलना पड़ेगा.... राधे-राधे.... पंचम दिन कथा शुरु की । कथा के आंरभ में सियारामदास महाराज, शिवदास महाराज, जयश्री-महेन्द्रजी पंचाल, हिना-मिथुन पंचाल, महक-गौरव पंचाल, मीनाक्षी-रितेश पंचाल, मांगीलाल धाकड़, महेश राणा, शांतिलाल भावसार, सुभाष अग्रवाल, शांतिलाल तेली, अरविन्द खेरावत, हर्षद मेहता, पंकज, कृष्णा आदि द्वारा व्यासपीठ पर माल्यार्पण किया गया । इसके बाद बाल व्यास पण्डित अनिल कृष्णजी महाराज ने जोर से बोलना पड़ेगा.... राधे-राधे.... चतुर्थ दिन कथा शुरु की ।
भागवत के सभी प्रसंग शिक्षाप्रद: पण्डित अनिलकृष्ण महाराज
श्रीमद् भागवत के सभी प्रसंग शिक्षाप्रद हैं । उन प्रसंगों के द्वारा परिवार, समाज व राष्ट्र का कल्याण हो सकता है । यह बात गुरुवार को तपोभूमि लालीवाव मठ में चल रहीं श्रीमद् भागवत कथा के पांचवे दिन कथा व्यास अनिल कृष्ण महाराज ने कही । उन्होंने कहा कि जो लोग मागंने के लिए भक्ति करते हैं वह सच्चे भक्त नहीं, वो तो व्यापारी हैं । आध्यात्म भी मनुष्य के अन्दर भी भोजन का कार्य करता है यह आध्यात्मक मनुष्य के अंदर की तृप्ति को पूरा करता है यह आध्यात्म ही वैराग्य है । मनुष्य एक अनुकरणशील प्राणी है । जिसमें नकल करने का भी एक स्वाभाव है भक्ति योग, ज्ञान योग, कर्म योग, ये तीन योग मनुष्य को मिल जाये तो मनुष्य का जीवन सार्थक हो जाता है । मनुष्य यदि सत्य का ही अनुसरण करे तो यह सारे योग मनुष्य में समा जाते है । उन्होंने कहा कि भक्ति करो तो मीराबाई की तरह करो मेरो तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोय जब भक्ति करो तो उस समय सिर्फ परमात्मा के सिवा कुछ याद न करो ।
मानव सांसारिक वस्तुओं में सुन्दरता ढूंढता है । सुंदर और भोग प्रदान करने वाली वस्तुओं को एकत्रित कर प्रसन्न होता है । भगवद्प्रेमी अपने आराध्य के स्वरूप चिंतन में ही आनंदि होता है । तपोभूमि लालीवाव मठ द्वारा आयोजित सात दिवसीय भागवत कथा के पांचवे दिन रविवार को कथा सुनाते ये बातें कही । कहा भगवान सवत्र्र व्याप्त हैं लेकिन उन्हें इन भौतिक आँखों से देखा नहीं जा सकता । उन्हें देखने के लिए स्वच्छ हृदय और पवित्र मानसिक आँखे चाहिए । भगवान के स्वरुप के चिंतन के बाद किसी की आवश्यकता नहीं रह जाती । कहा मानव स्वार्थ को इंगित करते हुए कहा कि हम भगवान को सिर्फ मुसीबत में याद करते हैं । हमें सुख व दुख दोनों समय कन्हैया का स्मरण करना चाहिए । पण्डित अनिलकृष्ण ने कहा की हम भगवान से जैसा सम्बंध जोड़ते हैं वे उसी रूप में हमें मिलते हैं । भक्तवत्सल भगवान अपने भक्तों की पुकार पर मदद के लिए दौड़े चले आते है । अपने प्रेमियों के दुख हरने में भगवान को प्रसन्नता होती है ।
पण्डित अनिलकृष्णजी भागवत कथा रस का पान कराते हुए विभिन्न उद्धरणों से कृष्ण की लीलाओं के महत्व का ज्ञान कराया और कथाओं के माध्यम से जीवन में भक्ति रस संचार की आवश्यकता और इसके प्रभावों को समझाया।
देवताओं की प्रार्थना, गौमाताओं की प्रार्थनाओं को परिपूर्ण करने, यमुना माँ की इच्छा पूर्ण करने भगवान श्री कृष्ण गौकुल, मथुरा, वृन्दावन में अपनी लिलाएँ की है ।
वेद शास्त्रों में चरण पूजनीय है क्योंकि पूरी शक्ति चरणों पर केन्द्रित होती है । मस्तक चरणों में टेकने से हमारी ज्ञान शक्ति जागृत होती है ।
कथा व्यापक होती है - भगवान का अवतार सबको जोड़ने के लिए, मनुष्य को उनके आर्दशों को अपनाकर मानव जीवन सार्थक बनाने के लिए होता है । सभी मनुष्य एक हो जाए ।
पूतनावध, भगवान श्री कृष्ण ने आंख बंद करते हुए भगवान शंकर को याद कर जहर पी लीया अर्थात भगवान हर चीज प्रत्येक भावना, इच्छा को भी स्वीकार कर लेती है ।
उन्होंने संतों और गुरुओं के सान्निध्य में पहुंच कर साधना एवं अभ्यास सीखने का आह्वान प्राणीमात्र से किया और कहा कि इसी से भवसागर से व्यक्ति तर सकता है।
पण्डित अनिलकृष्ण ने कहा कि ब्रह्माजी ने सृष्टि निर्माण से पूर्व पहले ‘काल’ अर्थात समय का निर्माण किया और उसके बाद ही मानसिक सृष्टि को उत्पन्न किया तथा ऋषियों को जन्म दिया।
ज्ञान को सदैव प्राप्त करने लायक बताते हुए उन्होंने कहा कि ज्ञान किसी से भी प्राप्त हो, ग्रहण कर लेना चाहिए। चाहे ज्ञान देने वाला अपने से छोटा हो या बड़ा। इसी प्रकार जीवन भर अच्छाइयों को ही ग्रहण करना चाहिए। मनुष्य को अपने या किसी दूसरे के बारे में भी कहीं कोई बुराई सुनने मिले तो उसे पूरी तरह भूल जाना चाहिए।
इसके साथ नामकरण, पूतना वध, गौचारण, माखन चोरी, अधासुर, बकासुर, शकटासुर, तृणावर्त आदि दैत्यों का उद्धार, कालिया नाग का उद्धार, चीरहरण व गोवर्धन पूजा आदि प्रसंग सुनाए गए एवं गोवर्धन भगवान की झांकी तैयार कर छप्पन भोग भगवान को लगाए गये । इसके साथ ही सायं 7 बजे भागवतजी की आरती उतारी गई एवं प्रसाद वितरण किया गया ।
अनूठी परम्परा - लालीवाव मठ में कन्या पूजन एवं सामूहिक दिव्य भोज
बांसवाड़ा, 25 जुलाईध्सदियों से लोक आस्था के परम्परागत श्रद्धा केन्द्र रहे ऐतिहासिक सिद्ध तपोभूमि श्री लालीवाव मठ में हर साल गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में होने वाले श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह महोत्सव में वर्षों से जारी यह परम्परा अपने आप में अनूठी और अनुकरणीय है।
मठ में महोत्सव के दौरान् एक दिन कन्याओं का विधिविधान से पूजन किया जाता है और इसके बाद कन्याओं का सामूहिक भोज होता है। इसमें बड़ी संख्या में कन्याएं हिस्सा लेती हैं, जिन्हें मनुहार के साथ जिमाया जाता है।
श्री लालीवाव मठ में आज इसी परम्परा का मनोहारी दिग्दर्शन दैवीय भावों को साकार करता रहा।
लालीवाव पीठाधीश्वर महामण्डलेश्वर श्रीमहंत श्री हरिओमदासजी महाराज ने कन्याओं को संबोधित करते हुए आशीर्वाद प्रदान किया और कन्या पूजन को भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं में महत्वपूर्ण बताते हुए इसे शक्ति उपासना का प्रमुख अंग बताया।