चातुर्मास आत्मपरिवर्तन का स्वर्णिम अवसर, इन चार महीनों में बदल जाए जीवनः साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी

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Published on : 28 Jul, 26 15:07

परमात्मा की वाणी का श्रवण ही सम्यक ज्ञान की ओर पहला कदम विषयक प्रवचन

चातुर्मास आत्मपरिवर्तन का स्वर्णिम अवसर, इन चार महीनों में बदल जाए जीवनः साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी

उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित चातुर्मासिक आध्यात्मिक प्रवचनमाला में मंगलवार को साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि वर्षभर में अनेक पर्व आते हैं, लेकिन चातुर्मास ऐसा आध्यात्मिक पर्व है, जिसके चार महीनों में यदि व्यक्ति अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन नहीं ला पाया तो इस पर्व का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाता है। उन्होंने कहा कि जैसे प्रकृति में मौसम बदलता है और तपती धूप के स्थान पर हरियाली छा जाती है, उसी प्रकार हमारे विचारों, व्यवहार और भावों में भी परिवर्तन आना चाहिए।
साध्वी श्रीजी ने कहा कि चातुर्मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और सम्यक ज्ञान प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर है। इन चार महीनों में प्रत्येक व्यक्ति को नियमित रूप से परमात्मा की वाणी का श्रवण करना चाहिए, क्योंकि शेष आठ महीनों में ऐसा अवसर मिले या न मिले, लेकिन चातुर्मास में धर्मश्रवण का लाभ अवश्य लेना चाहिए।
उन्होंने कहा कि परमात्मा के चरणों में पूर्ण समर्पण से ही जीवन का वास्तविक लाभ मिलता है। संसार में जो उत्पन्न होता है, उसका नाश भी निश्चित है, किंतु आत्मा का स्वरूप शाश्वत है। गुरु भगवंतों के माध्यम से हमें यही शाश्वत सत्य सुनने और समझने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि केवल सुन लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि एकाग्रचित्त होकर सुनना आवश्यक है। ध्यान भटकने पर सुनी हुई बातें मन में नहीं टिकतीं और उनका जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
साध्वी श्रीजी ने कहा कि आज अधिकांश लोग ज्ञान इसलिए प्राप्त करते हैं ताकि आजीविका चल सके, लेकिन सम्यक ज्ञान वह है जो जीवन के संताप, अशांति और भ्रम को समाप्त कर दे। उसी ज्ञान की प्राप्ति का प्रयास प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए।
प्रवचन के दौरान उन्होंने इंद्रियों के महत्व पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि पाँच इंद्रियों में कान और आँख सबसे महत्वपूर्ण हैं। आज व्यक्ति मंदिर में भी ईश्वर दर्शन से अधिक दूसरों के वस्त्र, वाहन और वैभव को देखने में व्यस्त रहता है। उन्होंने प्रश्न करते हुए कहा कि क्या हम घर केवल रहने के लिए बनाते हैं या दूसरों को दिखाने के लिए? यदि हम शरीर और आत्मा की उतनी ही चिंता करें जितनी बाहरी दिखावे की करते हैं, तो जीवन अधिक सुखमय बन सकता है। उन्होंने आधुनिक जीवनशैली पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि अत्यधिक सुविधाओं की आदत शरीर को कमजोर बनाती है, जबकि परमात्मा की वाणी का श्रवण मन और आत्मा को सशक्त बनाता है।
प्रवचन से पूर्व साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमनरुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मयरुचि श्रीजी ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। प्रवचन के अंत में श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ प्राप्त किया। बुधवार को गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर विशेष व्याख्यान एवं गुरु महिमा पर आधारित प्रवचन आयोजित होंगे।


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