गुरु पूर्णिमा पर गुरु-शिष्य परंपरा को मिला सम्मान

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Published on : 29 Jul, 26 17:07

‘गुरुवंदन‘ कार्यक्रम में किया संत-महात्माओं का अभिनंदन

गुरु पूर्णिमा पर गुरु-शिष्य परंपरा को मिला सम्मान

श्रीगंगानगर। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर देवस्थान विभाग के तत्वावधान में बुधवार को श्रीगंगानगर में श्रद्धा, सम्मान एवं भारतीय संस्कृति के गौरवशाली गुरु-शिष्य परंपरा को समर्पित ‘गुरुवंदन‘ कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। कार्यक्रमों के दौरान विभिन्न आश्रमों, मंदिरों एवं धार्मिक संस्थानों में विराजमान संत-महात्माओं का सम्मान कर उन्हें माननीय मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा का गुरुवंदन संदेश, गुरु दक्षिणा तथा सम्मान सामग्री भेंट की गई।
जिला मुख्यालय स्थित श्री धर्म संघ संस्कृत महाविद्यालय प्रन्यास में आयोजित मुख्य कार्यक्रम में गंगानगर विधायक श्री जयदीप बिहाणी, अतिरिक्त जिला कलक्टर प्रशासन श्री सुभाष कुमार एवं देवस्थान विभाग के अधिकारियों तथा कार्मिकों की उपस्थिति में ब्रह्मचारी श्री कल्याण स्वरूप जी का सम्मान कर गुरुवंदन पर्व मनाया गया। इसके अतिरिक्त डेरा मल्ला टिब्बा (विजयनगर), संस्कृत महाविद्यालय (रायसिंहनगर), श्री श्याम वर्ण गौशाला (घड़साना), ज्ञाननाथ आश्रम (अनूपगढ़), विवेक आश्रम (सादुलशहर), वाल्मीकि आश्रम (मटीलीराठान), सोमनाथ की कुटिया (श्रीकरणपुर) तथा खेजड़ी मंदिर एवं करणी माता मंदिर (सूरतगढ़) में भी संत-महात्माओं का सम्मान किया गया। आयोजित कार्यक्रमों में संत-महात्माओं को मुख्यमंत्री का संदेश, गुरु दक्षिणा, श्रीफल, माला, शॉल, दुपट्टा, मिठाई तथा सम्मान सामग्री भेंट कर अभिनंदन किया गया।
आयोजित कार्यक्रमों में संत श्री आकाश मुनि, श्री सज्जन तिवाड़ी, संत शंकरानंद गिरी, संत केहराराम, संत मेवादास, बाबा कर्मनाथ, श्री वासुदेव दास, श्री हनुमान प्रसाद शर्मा एवं श्री भगवती प्रसाद भोजक सहित अन्य संत-महात्माओं को माननीय मुख्यमंत्री का संदेश एवं सम्मान सामग्री भेंट की गई। आयोजित कार्यक्रमों में पूर्व मंत्री श्री सुरेन्द्र पाल सिंह टीटी, श्री शरणपाल सिंह मान, श्री आत्माराम तरड़, श्री सतपाल कासनिया, श्री सुरेन्द्र गोदारा सहित स्थानीय जनप्रतिनिधियों, जिला एवं उपखंड स्तरीय अधिकारियों, कर्मचारियों, देवस्थान विभाग के कार्मिकों तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता निभाई। उक्त कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय संस्कृति में गुरु के सर्वोच्च स्थान, आध्यात्मिक परंपराओं के संरक्षण तथा संत-महात्माओं के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता की भावना को सशक्त करने का संदेश दिया गया।


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