उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा आदि ठाणा-6 ने गुरुवार को कहा कि मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ी संपत्ति धन-दौलत नहीं, बल्कि पुण्य की कमाई है। एक बार अर्जित किया गया पुण्य कभी नष्ट नहीं होता और वही जीवन में सुख, समृद्धि, सम्मान तथा सफलता का आधार बनता है। उन्होंने कहा कि केवल मेहनत से ही धन नहीं मिलता, बल्कि उसके पीछे पुण्य का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है।
उन्होंने कहा कि एक मजदूर सुबह से शाम तक कड़ी मेहनत करने के बाद भी केवल अपने परिवार के भोजन की व्यवस्था कर पाता है, जबकि दूसरा व्यक्ति कम परिश्रम में भी लाखों रुपये कमा लेता है। इसका कारण केवल भाग्य नहीं, बल्कि पुण्य का प्रभाव है। पुण्यशाली व्यक्ति के जीवन में अवसर और समृद्धि स्वयं उसके द्वार तक पहुंचती है। इसलिए मनुष्य को धन कमाने के साथ-साथ पुण्य कमाने पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए।
साध्वी ने कहा कि जीवन क्षणभंगुर है। जैसे ही मनुष्य की आंखें हमेशा के लिए बंद होती हैं, उसी क्षण उसकी अंतिम यात्रा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। कुछ ही मिनट पहले जो करोड़ों की संपत्ति का स्वामी था, वही थोड़ी देर बाद चिता पर लेटा होता है। अंततः उसे मुखाग्नि देने वाला भी उसका अपना पुत्र ही होता है। ऐसे में धन, पद और प्रतिष्ठा का अहंकार व्यर्थ है। साथ जाने वाला यदि कुछ है तो वह केवल पुण्य और सत्कर्म हैं।
उन्होंने कहा कि संसार में सबसे मूल्यवान यदि कुछ है तो वह समय है। धन खो जाए तो दोबारा कमाया जा सकता है, लेकिन बीता हुआ एक क्षण भी किसी कीमत पर वापस नहीं पाया जा सकता। इसलिए प्रत्येक पल का सदुपयोग धर्म, सेवा, साधना और आत्मकल्याण में करना चाहिए।
प्रवचन में उन्होंने विश्व विजेता सिकंदर का उदाहरण देते हुए कहा कि अपार वैभव और असीम शक्ति का स्वामी होने के बावजूद वह मृत्यु को नहीं रोक सका। जब मृत्यु सामने आई तो उसका खजाना, साम्राज्य और वैभव किसी काम नहीं आया। मृत्यु एक ऐसा सत्य है जो किसी के साथ भेदभाव नहीं करती। आत्मा के शरीर छोड़ते ही व्यक्ति का नाम समाप्त हो जाता है और उसे केवल शरीर या शव कहा जाता है। जब नाम और पहचान भी स्थायी नहीं हैं, तब उनके अहंकार का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
प्रवचन के प्रारंभ में साध्वी प्रज्ञानजना, साध्वी नमनरुचि, साध्वी योगरुचि एवं साध्वी तन्मयरुचि ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने प्रवचन का श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त किया।