भारतीय लोक कला मण्डल पद्मश्री देवीलाल सामर की 115वीं जयंती श्रद्धा एवं सादगी के साथ मनाई गई

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Published on : 30 Jul, 26 17:07

भारतीय लोक कला मण्डल पद्मश्री देवीलाल सामर की 115वीं जयंती श्रद्धा एवं सादगी के साथ मनाई गई

उदयपुर। भारतीय लोक कला मण्डल के संस्थापक संचालक स्वर्गीय पद्मश्री देवीलाल सामर की 115वीं जयंती गुरुवार को संस्था परिसर में श्रद्धा एवं सादगी के साथ मनाई गई।

संस्था के निदेशक डॉ. लईक हुसैन ने बताया कि पद्मश्री देवीलाल सामर का जन्म 30 जुलाई 1911 को हुआ था। वे प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति अत्यंत संवेदनशील थे। अपने जीवनकाल में वे प्रत्येक वर्ष अपने जन्मदिवस के अवसर पर संस्था परिवार के साथ वन भ्रमण का आयोजन करते थे। उनकी इसी प्रेरणादायी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए भारतीय लोक कला मण्डल में प्रतिवर्ष 30 जुलाई को उनकी जयंती श्रद्धापूर्वक मनाई जाती है।

इस अवसर पर संस्था के मुख्य कार्यकारी अधिकारी तेजेन्द्र सिंह मारवाह, अधिकारियों, कर्मचारियों एवं कलाकारों ने पद्मश्री देवीलाल सामर की आदमकद प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

कार्यक्रम में संस्था के कलाकारों द्वारा "राम सृष्टा भी, राम सृष्टि भी है…" तथा "किस विधि में समझाऊँ मन तोहे…" सहित विभिन्न भजनों की भावपूर्ण प्रस्तुतियाँ दी गईं, जिनसे उपस्थित सभी जन भाव-विभोर हो उठे। वक्ताओं ने पद्मश्री देवीलाल सामर के लोक कला संरक्षण, कठपुतली कला के संवर्धन तथा भारतीय लोक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनके अमूल्य योगदान को स्मरण करते हुए उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प व्यक्त किया। इसके पश्चात दी परफ़ॉर्मर्स कल्चरल सोसायटी, उदयपुर के तत्वावधान में साहित्य सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘‘पूस की रात’’ पर आधारित नाटक का प्रभावशाली मंचन किया गया जिसका निर्देशन प्रबुद्ध पाण्डेय द्वारा किया गया।

नाटक ‘पूस की रात’’  की कहानी में गरीब किसान हल्कू, उसकी पत्नी मुन्नी तथा उनके वफादार कुत्ते जबरा के माध्यम से एक किसान के जीवन संघर्ष, गरीबी, कर्ज के बोझ और सामाजिक विषमताओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया गया। कलाकारों के सशक्त अभिनय, प्रभावशाली निर्देशन एवं जीवंत प्रस्तुति ने उपस्थित दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। नाटक में हल्कू - पियुश जैन, मुन्नी/पेमली दिविशा पालीवाल, महाजन की भूमिका में हुसैन आर.सी. ने किया। नाटक में संगीत किशन सोनी ने तो प्रकाश व्यवस्था दिव्याश्ंाु नागदा ने की।


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