बच्चों की थाली बदलेगी तो बदलेगा भारत का भविष्य

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Published on : 01 Aug, 26 11:08

बच्चों की थाली बदलेगी तो बदलेगा भारत का भविष्य

जंक फूड पर महाराष्ट्र का फैसला सिर्फ प्रतिबंध नहीं, स्वस्थ पीढ़ी तैयार करने की शुरुआत है।

— भगवान प्रसाद गौड़, सामाजिक विचारक, उदयपुर

किसी देश का भविष्य उसकी बड़ी-बड़ी इमारतों, उद्योगों या आर्थिक आंकड़ों से नहीं बल्कि उसके बच्चों के स्वास्थ्य से तय होता है। आज स्कूल जाने वाला बच्चा ही कल देश का नागरिक, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षक, सैनिक, उद्यमी और नीति-निर्माता बनेगा। इसलिए बच्चे की थाली में क्या है, यह सवाल केवल परिवार की रसोई तक सीमित नहीं रह सकता। यह देश के भविष्य से जुड़ा सवाल है।

इसी नजरिए से महाराष्ट्र सरकार का स्कूलों और उनके आसपास 50 मीटर के दायरे में जंक फूड की बिक्री, मुफ्त वितरण और विज्ञापन पर रोक लगाने का फैसला महत्वपूर्ण है। यह फैसला सिर्फ चिप्स, बर्गर, पिज्जा या अन्य अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों को स्कूल से दूर करने का प्रयास नहीं है। इसके पीछे एक बड़ी सोच है-बच्चों को छोटी उम्र से ही स्वस्थ भोजन और संतुलित जीवनशैली की आदत डालना।

पिछले कुछ वर्षों में हमारे बच्चों की खाने की पसंद तेजी से बदली है। घर की दाल-रोटी, सब्जी, दूध, दही, छाछ और मौसमी फल अब कई बच्चों को उतने आकर्षक नहीं लगते, जितने पैकेट में बंद चिप्स, नूडल्स, पिज्जा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक, आइसक्रीम और अत्यधिक मीठे या तले हुए खाद्य पदार्थ। इसके पीछे केवल बच्चे की पसंद नहीं है। विज्ञापन, रंगीन पैकेजिंग, डिजिटल प्रचार और बाजार की आक्रामक रणनीति भी उसकी पसंद को प्रभावित करती है।

समस्या स्वाद से शुरू होकर स्वास्थ्य तक पहुंचती है। मोटापा, टाइप-2 मधुमेह, उच्च रक्तचाप और दूसरी जीवनशैली संबंधी बीमारियां अब केवल बुजुर्गों की समस्या नहीं रह गई हैं। बच्चों और युवाओं में भी इनका खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में बीमारी होने के बाद इलाज करने के बजाय बचपन से ही बीमारी की रोकथाम करना कहीं बेहतर रास्ता है।

स्कूल इस काम के लिए सबसे महत्वपूर्ण जगह हो सकते हैं। स्कूल में बच्चा सिर्फ किताबें नहीं पढ़ता, वह जीवन जीने का तरीका भी सीखता है। वह समय की कीमत, अनुशासन, स्वच्छता, व्यवहार और जिम्मेदारी सीखता है। फिर भोजन की अच्छी आदतें क्यों नहीं सीख सकता? अगर स्कूल के गेट के बाहर ही अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों की दुकानें और आकर्षक विज्ञापन उसका इंतजार कर रहे हों, तो स्कूल में दी जाने वाली स्वास्थ्य शिक्षा कमजोर पड़ जाती है।

महाराष्ट्र का फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने बच्चों के आसपास के खाद्य वातावरण को बदलने की कोशिश की है।

 

दुनिया ने गलती की, फिर उससे सीखा-

फास्ट फूड और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की संस्कृति का विस्तार पहले पश्चिमी देशों में तेजी से हुआ। वहां इसके दुष्परिणाम भी पहले दिखाई दिए। मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और दूसरी जीवनशैली संबंधी बीमारियों ने सरकारों और समाज को सोचने के लिए मजबूर किया। इसके बाद कई देशों ने बच्चों को लक्षित खाद्य विज्ञापनों, स्कूलों में बिकने वाले खाद्य पदार्थों और पोषण मानकों को लेकर सख्त नियम बनाए।

जापान ने विद्यालयी भोजन को पोषण शिक्षा से जोड़ा। ब्रिटेन ने बच्चों को लक्षित अस्वास्थ्यकर खाद्य विज्ञापनों पर नियंत्रण बढ़ाया। फ्रांस ने स्कूलों में जंक फूड को सीमित किया। अमेरिका के कई राज्यों ने स्कूलों के लिए पोषण संबंधी मानक तय किए।

हमें इस अनुभव से सीखने की जरूरत है। पश्चिमी देशों से फास्ट फूड की संस्कृति भारत में आई, लेकिन अब वहां के अनुभव से यह भी सीखना होगा कि उसके दुष्परिणाम सामने आने के बाद उन्होंने क्या कदम उठाए। हमारे सामने आज मौका है कि जिस गलती का परिणाम दूसरे देशों ने भुगता, उससे हम पहले ही सबक ले लें। देर हुई है, लेकिन अभी बहुत देर नहीं हुई।

 

हमारी परंपरा में भोजन सिर्फ भोजन नहीं था-

स्वस्थ भोजन का विचार भारत के लिए कोई नया विचार नहीं है। हमारी परंपरा में भोजन को शरीर और मन दोनों के निर्माण का आधार माना गया। आयुर्वेद में आहार को स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण आधार माना गया है। हमारी गुरुकुल परंपरा में सात्विक भोजन, योग, व्यायाम, श्रम और अनुशासित दिनचर्या शिक्षा का हिस्सा थे।

आज जरूरत इस बात की है कि हम अपनी पारंपरिक समझ को आधुनिक विज्ञान से जोड़ें। इसका अर्थ यह नहीं कि बच्चों को आधुनिक भोजन से पूरी तरह दूर कर दिया जाए। बात संतुलन की है। बच्चों को यह समझाना होगा कि स्वाद जरूरी है, लेकिन स्वाद से पहले स्वास्थ्य जरूरी है।

 

सिर्फ रोकना नहीं, बेहतर विकल्प देना होगा-

महाराष्ट्र सरकार का फैसला स्वागतयोग्य है, लेकिन केवल प्रतिबंध से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। बच्चों को जंक फूड से दूर करने के साथ उन्हें पौष्टिक और स्वादिष्ट विकल्प भी देने होंगे।

स्कूलों में पोषण शिक्षा को नियमित गतिविधि बनाया जा सकता है। खेल, योग, स्वच्छ पेयजल, रसोई बागवानी और स्थानीय पौष्टिक खाद्य पदार्थों को बढ़ावा दिया जा सकता है। स्कूलों, आंगनवाड़ियों और बालवाड़ियों में चलने वाली पोषाहार व्यवस्थाओं में भी विविधता लाने की जरूरत है। केवल पेट भरना लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि भोजन में प्रोटीन, विटामिन, खनिज और अन्य जरूरी पोषक तत्वों का संतुलन भी देखा जाना चाहिए।

स्थानीय स्तर पर उपलब्ध मोटे अनाज, दालें, हरी सब्जियां, मौसमी फल, दूध और पारंपरिक पौष्टिक व्यंजनों को पोषाहार कार्यक्रमों में अधिक स्थान दिया जा सकता है। इससे बच्चों का स्वास्थ्य सुधरेगा और स्थानीय किसानों तथा छोटे उत्पादकों को भी बाजार मिलेगा।

 

परिवार की भूमिका सबसे बड़ी-

स्कूल अपना काम कर सकता है, सरकार नियम बना सकती है और डॉक्टर चेतावनी दे सकते हैं, लेकिन बच्चे की पहली पाठशाला परिवार ही है। यदि घर में रोज जंक फूड खाया जा रहा है और माता-पिता स्वयं स्वस्थ भोजन की आदत नहीं अपनाते, तो बच्चे पर स्कूल का संदेश सीमित प्रभाव ही डालेगा।

इसलिए माता-पिता को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। बच्चे को हर बार बाजार का पैकेट देने के बजाय घर के भोजन को आकर्षक बनाना होगा। खाने की मेज पर मोबाइल से दूरी, भोजन का निश्चित समय और परिवार के साथ भोजन जैसी छोटी आदतें भी बच्चे के व्यक्तित्व पर बड़ा असर डाल सकती हैं।

 

स्वास्थ्य पर खर्च नहीं, स्वास्थ्य में निवेश-

बच्चों के स्वास्थ्य पर किया गया खर्च वास्तव में भविष्य में होने वाले स्वास्थ्य खर्च को कम करने वाला निवेश है। नियमों की निगरानी, पोषण विशेषज्ञों की सेवाएं, स्वास्थ्य निरीक्षण और जागरूकता कार्यक्रम रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर सकते हैं। दूसरी ओर स्थानीय और पारंपरिक खाद्य पदार्थों को बढ़ावा मिलने से छोटे उत्पादकों और किसानों को भी लाभ होगा।

भारत जनसांख्यिकीय बदलाव के दौर से गुजर रहा है। परिवार छोटे हो रहे हैं और जन्म दर में गिरावट आ रही है। ऐसे समय में प्रत्येक बच्चे का स्वस्थ और सक्षम होना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। संख्या से अधिक गुणवत्ता का महत्व बढ़ रहा है। यदि आने वाली पीढ़ी स्वस्थ, शिक्षित और सक्षम होगी, तो वही भारत की सबसे बड़ी ताकत बनेगी।

अब महाराष्ट्र से पूरे देश तक बात पहुंचनी चाहिए

महाराष्ट्र ने एक जरूरी बहस शुरू की है। अब दूसरे राज्यों को भी अपने-अपने स्तर पर स्कूलों के आसपास स्वस्थ खाद्य वातावरण बनाने पर विचार करना चाहिए। खाद्य कंपनियों और उद्योगों को भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझनी होगी। बच्चों को लक्ष्य बनाकर अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों का आक्रामक प्रचार केवल व्यापार का विषय नहीं हो सकता।

भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की चर्चा अक्सर अर्थव्यवस्था, तकनीक और बुनियादी ढांचे के संदर्भ में होती है। लेकिन एक विकसित देश वह भी होता है, जो अपने बच्चों को स्वस्थ बचपन देता है।

इसलिए महाराष्ट्र का यह फैसला सिर्फ जंक फूड पर रोक नहीं है। यह एक सवाल भी है-हम अपने बच्चों को कैसी जिंदगी देना चाहते हैं?

अगर बच्चों की थाली में पौष्टिक भोजन होगा, दिनचर्या में खेल और योग होगा, जीवन में अनुशासन होगा और परिवार में स्वास्थ्य को प्राथमिकता मिलेगी, तो उसका असर केवल एक बच्चे पर नहीं पड़ेगा। वह आने वाले भारत की कार्यशक्ति, उत्पादकता और सामाजिक क्षमता को मजबूत करेगा।

अस्पताल बढ़ाना जरूरी है, लेकिन ऐसी पीढ़ी तैयार करना उससे भी जरूरी है जिसे कम अस्पतालों की जरूरत पड़े। स्वस्थ बचपन ही सशक्त भारत की पहली शर्त है।


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