शिक्षा, शोध और संस्थागत विकास में अमूल्य योगदान के लिए सीटीएई परिवार एवं एमईएआई ने किया सम्मानित
उदयपुर। शिक्षा, शोध और अकादमिक नेतृत्व के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले खनन अभियांत्रिकी विशेषज्ञ डॉ. अनुपम भटनागर 38 वर्षों की गौरवमयी सेवा के बाद सेवानिवृत्त हुए। महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के प्रौद्योगिकी एवं अभियांत्रिकी महाविद्यालय (सीटीएई) के खनन अभियांत्रिकी विभाग में प्रोफेसर पद पर रहते हुए उन्होंने शिक्षा, शोध और संस्थागत विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया। इस अवसर पर महाविद्यालय परिवार एवं माइनिंग इंजीनियर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एमईएआई), राजस्थान चैप्टर, उदयपुर द्वारा उनका अभिनंदन किया गया।
उन्होंने उदयपुर, चारभुजा, कोठारिया एवं कपासन से शिक्षा प्राप्त करने के बाद वर्ष 1988 में खनन अभियांत्रिकी में स्नातक, वर्ष 1996 में एम.टेक. तथा वर्ष 2003 में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।
उन्होंने वर्ष 1988 में सीटीएई के खनन अभियांत्रिकी विभाग में एडहॉक असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाओं की शुरुआत की। वर्ष 1989 में उनका नियमित चयन हुआ। अपनी प्रतिभा और समर्पण के बल पर वे वर्ष 2007 में एसोसिएट प्रोफेसर तथा वर्ष 2010 में प्रोफेसर पद पर पहुंचे।
अपने सेवाकाल में डॉ. भटनागर ने 11 वर्षों तक विभागाध्यक्ष एवं एक वर्ष तक अधिष्ठाता के रूप में नेतृत्व प्रदान किया। इसके अलावा प्लेसमेंट सेल प्रभारी, आहरण एवं वितरण अधिकारी (डीडीओ) तथा प्रवेश प्रभारी जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को भी कुशलतापूर्वक निभाया।
डॉ. भटनागर राज्य स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (एसईएसी) के सदस्य, एमबीएम विश्वविद्यालय जोधपुर के लोकपाल तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों के बोर्ड ऑफ स्टडीज के सदस्य रहे। उन्होंने राजस्थान लोक सेवा आयोग एवं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर में शैक्षणिक पदों के चयन के लिए गठित साक्षात्कार मंडलों में भी विशेषज्ञ के रूप में सेवाएं दीं।
शोध के क्षेत्र में भी डॉ. भटनागर की उपलब्धियां उल्लेखनीय रही हैं। उन्होंने 75 से अधिक शोध-पत्र प्रकाशित किए, एक पुस्तक एवं चार प्रयोगशाला मैन्युअल लिखे। उन्होंने परियोजना प्रभारी के रूप में दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं का संचालन किया। उनके एक महत्वपूर्ण शोध कार्य को एआईसीटीई यंग साइंटिस्ट अवार्ड से सम्मानित किया गया। वहीं माइनिंग इंजीनियर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा वर्ष 2005 में उन्हें प्रतिष्ठित सीताराम रुंगटा पुरस्कार से सम्मानित किया गया।