पशुओं में थनैला रोग के बचाव एवं उपचार विषय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित

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Published on : 01 Aug, 26 17:08

डेयरी पशुओं में थनैला रोग का उपचार एवं बचाव कैसे करेः डॉ. बेरवाल

पशुओं में थनैला रोग के बचाव एवं उपचार विषय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित

श्रीगंगानगर। पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बीकानेर के अंतर्गत कार्यरत पशु विज्ञान केंद्र, सूरतगढ़ के द्वारा ग्राम 7 जैड  श्रीगंगानगर में थनैला रोग के बचाव एवं उपचार विषय पर गैरसंस्थागत एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर आयोजन शनिवार को किया गया।
 प्रशिक्षण में केन्द्र प्रभारी अधिकारी डॉ. राजकुमार बेरवाल ने बताया की मैस्टाइटिस (थनैला) दुधारू पशुओं जैसे गाय व भैंस का एक प्रमुख संक्रामक रोग है। इस रोग में पशु के थन (अयन) में सूजन आ जाती है, जिससे दूध का उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं। यदि समय पर उपचार न किया जाए तो पशु की दुग्ध उत्पादन क्षमता स्थायी रूप से कम हो सकती है, जिससे पशुपालकों को आर्थिक हानि होती है। जो पशुपालकों के द्वारा दुधारू पशुओं में खराब प्रबंधन के कारण थनों में इंफेक्शन होने से होती है, जिससे हमारे दैनिक जीवन में काम आने वाला दूध में संक्रमण का खतरा बना रहता है।
उन्होंने बताया कि थनैला रोग होने पर थनों में सूजन, लालपन, दूध का रंग बदल जाना व पानी जैसा पतलापन, दूध में थक्के व रक्त या मवाद आना, दूध कम हो जाना, पशु को बुखार आना एवं भूख कम लगना, पशु सुस्त दिखाई देना, प्रभावित थन को छूने पर दर्द होना, खून आना आदि लक्षण दिखाई देते है। थनैला रोग से दूसरे पशुओं को बचाने के लिए थनैला रोग से संक्रमित पशु को अन्य पशुओं से अलग कर दें तथा उसका दूध सबसे अंत में निकालें और कच्चा दूध का सेवन हमें नहीं करना चाहिए। थनैला से बचाव के लिए ड्राई काऊ थैरेपी का उपयोग करें, दूध की लैबोरेट्री में जांच करवायें, नजदीकी डॉक्टर से संपर्क कर पशु का उपचार करवायंे।
पशु विज्ञान केन्द्र द्वारा संचालित प्रयोगशाला में दूध, मूत्र, गोबर आदि की जाँच व पशुओं के लिए वरदान साबित हो रहा हरा चारा अजोला घास के लाभ के बारे में बताया। इस प्रशिक्षण शिविर में कुल 37 पशुपालकों ने भाग लिया। 


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