अलविदा ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स... अब 1930 में अहमदाबाद में मिलेंगे.

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Published on : 03 Aug, 26 04:08

अलविदा ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स... अब 1930 में अहमदाबाद में मिलेंगे.

कॉमनवेल्थ गेम्स- 2026 में सीमित खेलो के बावजूद भारतीय खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन*

गोपेन्द्र नाथ भट्ट 

कॉमनवेल्थ गेम्स (राष्ट्रमंडल खेलों) - 2026 का औपचारिक समापन 2 अगस्त 2026 रविवार को स्कॉटलैंड के सबसे बड़े शहर ग्लासगो के ओवीओ हाइड्रो में हुआ। 

 

ग्यारह दिनों तक चले इन खेलों के समापन समारोह में टिप्पणी लिखे जाने तक सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों और स्वयंसेवकों का सम्मान किया जा रहा है। साथ ही 2030 में आयोजित होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के लिए राष्ट्रमंडल खेल के ध्वज का भारत को हस्तांतरण भी हो रहा है। ज्ञातव्य है कि अगले राष्ट्रमंडल खेलो का आयोजन गुजरात की पुरानी राजधानी अहमदाबाद शहर में होगा । समापन समारोह के हैंडओवर सेगमेंट में भारत के विख्यात संगीतकार शंकर महादेवन ने कॉमनवेल्थ गेम्स- 2030 के लिए भारत की पहली आधिकारिक झलक और सांस्कृतिक प्रस्तुति से समा बांध दिया। भारत के लिए यह समापन समारोह विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसके साथ ही 2030 के राष्ट्रमंडल खेलों के मेजबान के रूप में अहमदाबाद की औपचारिक जिम्मेदारी की शुरुआत हो गई है। 

 

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में इस बार सीमित खेलों के बावजूद भारत का दमदार प्रदर्शन रहा तथा भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन से देश का मान बढ़ा।

स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित 2026 के कॉमनवेल्थ गेम्स भारत के लिए कई मायनों में विशेष रहे। इन खेलों का स्वरूप पिछले संस्करणों की तुलना में काफी अलग था। इस बार कॉमनवेल्थ गेम्स में केवल 10 खेल शामिल किए गए और भारत के पारंपरिक पदक दिलाने वाले कुश्ती, बैडमिंटन, हॉकी, क्रिकेट तथा टेबल टेनिस जैसे खेलों को शामिल नहीं किया गया। इसके बावजूद भारतीय खिलाड़ियों ने उपलब्ध अवसरों का भरपूर लाभ उठाते हुए उल्लेखनीय प्रदर्शन किया और विश्व खेल मंच पर देश का गौरव बढ़ाया। 

 

भारत ने प्रतियोगिता के अंतिम चरण तक 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीतकर पदक तालिका में चौथा स्थान हासिल किया है। सबसे बड़ी उपलब्धि मुक्केबाज़ी में रही, जहाँ भारतीय मुक्केबाज़ों ने सात स्वर्ण और तीन रजत पदक जीत कर अपना दबदबा स्थापित किया। एथलेटिक्स, पैरा एथलेटिक्स, भारोत्तोलन और जूडो में भी भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया। 

भारोत्तोलन में भारत की स्टार खिलाड़ी मीराबाई चानू ने लगातार तीसरी बार राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण पदक जीतकर हैट्रिक के साथ इतिहास रच दिया। उन्होंने एक बार फिर साबित किया कि निरंतरता और अनुशासन ही महान खिलाड़ियों की पहचान होते हैं। दूसरी ओर राजस्थान की मुक्केबाज़ अरुंधति चौधरी ने महिला 70 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर देश और प्रदेश दोनों का गौरव बढ़ाया। इन खेलों की सबसे प्रेरक उपलब्धियों में भारतीय पैरा खिलाड़ियों का प्रदर्शन रहा। भारत ने पैरा स्पर्धाओं में रिकॉर्ड सात पदक जीतकर यह संदेश दिया कि दिव्यांग खिलाड़ी भी विश्व स्तर पर देश का नाम रोशन करने में किसी से पीछे नहीं हैं। यह सफलता भारत में खेलों के व्यापक विकास और समावेशी खेल नीति का सकारात्मक संकेत है। 

 

भारत के प्रदर्शन का मूल्यांकन केवल पदकों की संख्या से नहीं किया जाना चाहिए। यदि कुश्ती, बैडमिंटन, हॉकी और क्रिकेट जैसे खेल भी इस संस्करण में शामिल होते, तो भारत का पदक आंकड़ा और अधिक प्रभावशाली हो सकता था। इसलिए सीमित खेलों के बावजूद भारतीय खिलाड़ियों ने जो सफलता हासिल की, वह उनकी क्षमता, तैयारी और मानसिक दृढ़ता का प्रमाण है। इन खेलों ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत अब केवल कुछ पारंपरिक खेलों तक सीमित नहीं है। मुक्केबाज़ी, एथलेटिक्स और पैरा खेलों में उभरती नई प्रतिभाएँ भविष्य के ओलंपिक और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए मजबूत आधार तैयार कर रही हैं। भारत सरकार की खेलो इंडिया जैसी योजनाओं, आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं और वैज्ञानिक कोचिंग का सकारात्मक प्रभाव भी इन परिणामों में दिखाई देता है। 

 

भारत की यह सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्ष 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी भारत के अहमदाबाद को मिली है। ऐसे में ग्लासगो का प्रदर्शन भारत के लिए आत्मविश्वास बढ़ाने वाला साबित होगा। अब आवश्यकता है कि खेल अवसंरचना, प्रतिभा पहचान, खेल विज्ञान और खिलाड़ियों के दीर्घकालीन प्रशिक्षण पर और अधिक निवेश किया जाए ताकि भारत 2030 में मेजबान होने के साथ-साथ पदक तालिका में भी शीर्ष देशों की चुनौती पेश कर सके। 

 

कुल मिला कर 2026 के कॉमनवेल्थ गेम्स ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत की खेल शक्ति लगातार विस्तार पा रही है। सीमित खेलों के बावजूद भारतीय खिलाड़ियों ने साहस, अनुशासन और उत्कृष्ट प्रदर्शन से दुनिया को प्रभावित किया। यह प्रदर्शन केवल पदकों की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत के उभरते खेल सामर्थ्य, नई पीढ़ी के आत्मविश्वास और भविष्य की बड़ी सफलताओं का मजबूत संकेत है। अब अब 1930 में राष्ट्रमंडल देशों के खिलाड़ी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गृह प्रदेश गुजरात के अहमदाबाद शहर 

 में मिलेंगे तो अपने देश में मेजबानी कर रहे खिलाड़ियों के हौसले और भी अधिक बुलन्दियों पर रहेंगे,ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।


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