उदयपुर, पृथ्वी के सीमित संसाधनों के बीच असीमित उपभोग की प्रवृत्ति ही जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण है। यदि मानव ने अपनी जीवनशैली और उपभोग की आदतों में समय रहते बदलाव नहीं किया तो आने वाले वर्षों में पृथ्वी पर जीवन और अधिक कठिन हो जाएगा। यह बात आईआईटी बॉम्बे के पूर्व प्रोफेसर, प्रख्यात ऊर्जा विशेषज्ञ तथा "सोलर मैन" और "सोलर गांधी" के नाम से विख्यात प्रो. चेतन सिंह सोलंकी ने विद्या भवन पॉलिटेक्निक महाविद्यालय में आयोजित "ऊर्जा स्वराज एवं जलवायु परिवर्तन समाधान" विषयक विशेष व्याख्यान में कही।
विद्या भवन पॉलिटेक्निक के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग एवं पर्यावरण संरक्षण गतिविधि इको क्लब के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में प्रो. सोलंकी ने कहा कि विज्ञान, तकनीक और अर्थव्यवस्था का विस्तार संभव है, लेकिन पृथ्वी का आकार नहीं बढ़ सकता। ऐसे में ऊर्जा के विवेकपूर्ण उपयोग और सीमित उपभोग को अपनाना ही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
प्रो. सोलंकी अपनी विशेष सोलर बस के साथ उदयपुर पहुंचे। यह बस ही उनका घर, कार्यालय, बैठक कक्ष और प्रशिक्षण केंद्र है। बस की छत पर लगे सौर पैनलों से बिजली का उत्पादन होता है, जिससे इसके सभी आवश्यक उपकरण संचालित होते हैं। बस में रहने, भोजन बनाने, कार्य करने और यात्रा करने की सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसका उद्देश्य लोगों को स्वच्छ ऊर्जा आधारित जीवनशैली का व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करना है।
विद्या भवन पॉलिटेक्निक के प्राचार्य डॉ. अनिल मेहता ने बताया कि प्रो. सोलंकी 13 मई से 20 अगस्त 2026 तक 100 दिवसीय "भारत क्लाइमेट सत्याग्रह यात्रा" पर हैं। यह यात्रा वर्ष 2020 में शुरू हुई उनकी 11 वर्षीय "एनर्जी स्वराज यात्रा" का हिस्सा है। उन्होंने इस पूरी अवधि में घर नहीं लौटने का संकल्प लिया है।
अपने व्याख्यान में प्रो. सोलंकी ने कहा कि जिस प्रकार किसी व्यक्ति के शरीर का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ने पर उसे बुखार माना जाता है, उसी प्रकार औद्योगिक क्रांति के बाद पृथ्वी का औसत तापमान भी लगभग 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। इसका परिणाम हीट वेव, सूखा, बाढ़, अनियमित वर्षा, जंगलों में आग और समुद्र के बढ़ते जलस्तर के रूप में सामने आ रहा है।
उन्होंने कहा कि पृथ्वी को "बुखार" आ चुका है, लेकिन मानव अब भी उसी जीवनशैली को अपनाए हुए है जिसने यह संकट पैदा किया है।
प्रो. सोलंकी ने कहा कि लोग बाहर दिखाई देने वाले कचरे की चिंता करते हैं, जबकि सबसे अधिक प्रदूषण घरों से निकलता है। उन्होंने बताया कि एक सामान्य परिवार वर्षभर में लगभग 150 किलोग्राम ठोस कचरा पैदा करता है, लेकिन इसके साथ लगभग 10 हजार किलोग्राम अदृश्य कचरा कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के रूप में वातावरण में छोड़ता है।
उन्होंने कहा कि पंखा, एयर कंडीशनर, एलपीजी गैस, मोबाइल चार्जिंग, इंटरनेट, ऑनलाइन खरीदारी तथा हर उत्पाद के निर्माण और परिवहन में ऊर्जा की खपत और कार्बन उत्सर्जन छिपा होता है।
प्रो. सोलंकी ने लोगों से एक वर्ष तक नए कपड़े नहीं खरीदने का संकल्प लेने का आग्रह करते हुए कहा कि वस्त्र उद्योग विश्व के सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों में शामिल है। उन्होंने बताया कि एक जोड़ी नए कपड़ों के निर्माण में लगभग 10 हजार लीटर पानी की खपत, 20 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन और रासायनिक प्रदूषण होता है।
उन्होंने कहा कि केवल सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और आधुनिक तकनीकें ही जलवायु संकट का समाधान नहीं हैं। जब तक अनावश्यक उपभोग कम नहीं होगा, तब तक कोई भी तकनीक पर्याप्त साबित नहीं होगी।
कार्यक्रम के दौरान प्रो. चेतन सोलंकी द्वारा लिखित एवं पेंगुइन प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक "क्लाइमेट चेंज 2100 – सर्वाइव ऑर थ्राइव" का लोकार्पण प्राचार्य डॉ. अनिल मेहता ने किया।
डॉ. मेहता ने कहा कि उदयपुर जैसे झीलों के शहर के लिए जलवायु परिवर्तन केवल वैश्विक मुद्दा नहीं, बल्कि जल सुरक्षा, जैव विविधता और नागरिक स्वास्थ्य से जुड़ा स्थानीय विषय भी है। उन्होंने ऊर्जा संरक्षण, जल संरक्षण और सीमित उपभोग को समय की आवश्यकता बताया।
कार्यक्रम में विद्या भवन सोसायटी के उपाध्यक्ष एवं ऊर्जा अभियंता भगवत बाबेल ने प्रो. सोलंकी का स्वागत किया। इस अवसर पर उदयपुर सोलर ऑब्जर्वेटरी के उप प्रमुख डॉ. भुवन जोशी, डॉ. रमित भट्टाचार्य, डॉ. बृजेश सिंह, पूर्व अतिरिक्त मुख्य नगर नियोजक सतीश श्रीमाली, नाहर सिंह, मनीष मेघवाल, विभागाध्यक्ष प्रकाश सुंदरम, प्राध्यापक नितिन सनाढ्य, रमेशचंद्र कुम्हार सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, विद्यार्थी और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
यदि इसे किसी दैनिक समाचार पत्र के लिए प्रकाशित करना है, तो इसे 400–500 शब्दों के अधिक संक्षिप्त हार्ड न्यूज़ (AP/इनवर्टेड पिरामिड) प्रारूप में भी तैयार किया जा सकता है।