बहिर्मुखी से अन्तर्मुखी बनने का अभ्यास करेंःसुरेन्द्र मुनि

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Published on : 08 Aug, 26 13:08

बहिर्मुखी से अन्तर्मुखी बनने का अभ्यास करेंःसुरेन्द्र मुनि

उदयपुर। देवेंद्रधाम में आयोजित प्रवचन में सुरेन्द्र मुनि ने मनुष्य जीवन में आत्मचिंतन और सकारात्मक सोच के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य जब तक बाहरी संसार और भौतिक गतिविधियों में उलझा रहता है, तब तक उसके भीतर राग-द्वेष की प्रवृत्तियां बनी रहती हैं।

इन्हीं के कारण कर्मों का बंधन होता है।प्रत्येक व्यक्ति को प्रयास करना चाहिए कि वह राग-द्वेष से मुक्त हो। जब राग-द्वेष समाप्त होंगे, तभी संसार से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा।

अन्तर्मुखी बनने के लिए सांसारिक गतिविधियों से मन हटाकर मनन, चिंतन और आत्मावलोकन आवश्यक है।उन्होंने कहा कि मन के विचारों और भावों को शुभ-अशुभ बनाने में हमारी सोच की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

हमारे हाथ में यह है कि हम अपने भावों को किस दिशा में ले जाएं।

सकारात्मक विचारों से मनोबल मजबूत होता है और अशुभ भावों को शुभ में परिवर्तित करने की क्षमता विकसित होती है।मुनिश्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि कपिल केवली का जीवन इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य अपने अशुभ भावों को शुभ में परिवर्तित कर सकता है।

उन्होंने कहा कि साधारण व्यक्ति का जीवन भी तभी सार्थक बनता है, जब वह आत्मचिंतन करते हुए अपने भीतर के दोषों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करे।प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि ने वर्तमान जीवनशैली पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज मनुष्य स्वयं की सुख-सुविधाओं से अधिक दूसरों को देखकर दुखी होता है।

दूसरों की उन्नति और सुख को देखकर स्वयं में तुलना की भावना पैदा करना मानसिक अशांति का कारण बनता है। इसलिए व्यक्ति को अपनी सोच को सकारात्मक बनाकर आत्मसंतोष की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।प्रवचन के दौरान उपाध्याय रमेश मुनि एवं अन्य संतों का सानिध्य भी रहा।

मुनिश्री ने मंगलभावना व्यक्त करते हुए समाज को आत्मचिंतन, सद्भाव और सकारात्मक जीवनशैली अपनाने का संदेश दिया। प्रवचन सभा में पंजाब, भीलवाड़ा,जयपुर,फरीदकोट से गुरू भक्तगण उपस्थित रहे।


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