आदिवासियों की परम्परागत ज्ञान प्रणाली अनुकरणीय है

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Published on : 09 Aug, 26 07:08

आदिवासियों की परम्परागत ज्ञान प्रणाली अनुकरणीय है

आज विश्व आदिवासी दिवस के उपलक्ष्य में ग्लोबल हिस्ट्री फोरम एवं मेवाड़ इतिहास परिषद के तत्वावधान में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण केन्द्र की पश्चिमी शाखा के उपनिदेशक डाॅ. निलांजन खटुआ ने की।

उन्होंने अपने उद्बोधन में बताया कि सदियों से ही आदिवासी प्राकृतिक परम्परागत जीवन शैली अपनाते हैं। जिसमें जैविक खाद-बीज से उत्पन उपजों से प्राप्त खाद्य पदार्थों का ही सेवन करते हैं इसी कारण वे स्वस्थ और दीर्घायु रहते हैं।

डाॅ. खटुआ ने आगे बताया कि मानव शास्त्र के अनेक अंग्रेज विद्वानों ने भारत के आदिवासियों को यहाँ के अन्य निवासियों से पृथकता का जीवन व्यतीत करने वाला बताया है।

लेकिन भारतीय विद्वानों ने इस मत का खंडन किया है। घुरये के अनुसार हमारे देश में जन जातियों ने अपने पड़ोस में रहने वाली अन्य जातियों से कभी भी पृथकता का जीवन व्यतीत नहीं किया।

मजूमदार और ऐयप्पन के मत में भारत की जन जातियों ने अपने क्षेत्रों में निवास करने वाले हिन्दू ग्रामीण समुदाय की संस्कृति और भाषा को अपनाया है।

उनके इस मत का समर्थन कुछ इतिहासकारों ने भी किया है। डी. डी. कौशाम्बी के अनुसार प्राचीन काल से ही हिन्दू राजाओं और जागीरदारों ने ब्राह्मणों को दान में भूमि अथवा अन्य प्रकार के प्रलोभन देकर जनजातियों के क्षेत्रों में बसने के लिये प्रोत्साहित किया।

प्रारंभिक मध्यकालीन युग में यह प्रक्रिया जारी रही। जनजाति क्षेत्रों में बसने वाले निवासियों ने उनमें ब्राह्मण समाज के आदर्शों व नियमो को प्रचलित करने का प्रयत्न किया।

जनजातियों के प्रतिरोध की चिन्ता न करते हुए भी शासकों व बाहर से आकर उनके क्षेत्रों में बसने वाले निवासियों ने इस प्रक्रिया को जारी रखा।

ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि पूर्व-औपनिवेशिक काल में गैर जनजातियों और जनजातियों के पारस्परिक समन्वय की प्रक्रिया में प्रवृत्तियाँ देखी जा सकती हैं।

ग्लोबल हिस्ट्री फोरम के संस्थापक अध्यक्ष डाॅ. जी. एल. मेनारिया ने बताया कि आदिवासियों के इतिहास एवं संस्कृति पर बोलते हुए बताया कि दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी संतों की धूणियाँ और धाम उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में शिक्षा और सांस्कृतिक चेतना के प्रमुख केन्द्र थे।

इसी अवधी में भारत में धार्मिक व सामाजिक सुधार आन्दोलन आरम्भ हो चुका था। अतः हम उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में संत सूरमाल दास द्वारा चलाये गये आन्दोलन को इस प्रदेश की सांस्कृतिक परम्पराओं से उपजा आन्दोलन मान सकते हैं।

डाॅ. मेनारिया ने बताया कि संत सूरमाल दास का जन्म गुजरात के साबरकांठा जिले में लसाड़िया गाँव के एक भील (खराड़ी) परिवार में हुआ था। उनका परिवार लकड़ी काट के, शिकार करके व जरूरत पड़ने पर राहजनी करके जीवन निर्वाह करता था।

बचपन में वे नास्तिक व क्रूर थे। युवावस्था में अपनी पत्नी के सख्त बीमार पड़ने पर उनमें वैराग्य उत्पन्न हुआ।

उन्होंने अपने ग्राम में धूणी लगाकर भक्ति करनी आरम्भ की। ऐसा विश्वास किया जाता है कि उनको चमत्कारी शक्तियाँ भी प्राप्त हो गई थी।

शीघ्र ही उनके मत का प्रचार दक्षिणी राजस्थान व आस पास के गुजरात के क्षेत्रों के भीलों में हो गया। 1874 में खेरवाड़ा में पोलिटिकल सुपिरिन्टेंडेट हिली ट्रेक्ट्स के पद पर कार्यरत टी. ई. गोरेन नाम अंग्रेज अधिकारी ने उनसे भेंट की।

इस मुलाकात में सूरजी ने डूंगरपुर में अन्य भीलों से अपने अनुयायियों की सुरक्षा करने की मांग की। 1877 में उनके अनुयायियों की संख्या लगभग तीन हजार आंकी गई थी।

ये अनुयायी गुजरात में सामला जी से लेकर मेवाड़ में रिखबदेव के पास के प्रदेशों में फैले हुए थे। वर्तमान में डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा गुजरात में इस पंथ के हजारों शिष्य हैं।

उनके द्वारा चलाये गये पंथ को सूरमाल दास पंथ कहते हैं। लसाड़िया में इसकी मुख्य धूणी होने के कारण इसे लसाड़िया पंथ की कहा जा सकता है।

इस अवसर पर डाॅ. मीनाक्षी मेनारिया ने बताया कि सूरमाल दास ने भक्ति मार्ग को अपनाया। उन्होंने भजन, पाठ-पूजा, यज्ञ, हवन आदि को महत्व दिया।

वे राम भक्त थे। उनका विश्वास था कि कर्म के आधार पर एक जीव पुनर्जन्म से छुटकारा पा सकता है।

उन्होंने एक मनुष्य को स्वच्छ रहने तथा सादे कपड़े पहनने का आदेश दिया। नैतिक जीवन व्यतीत करने के लिये सूरमाल दास ने एक आचार-संहिता बनाई।

पाप, चोरी व जीव हत्या न करनाय क्राम, क्रोध, अभिमान एवं माया जाल से दूर रहना; व्यभिचार न करना तथा शराब व मांस का प्रयोग न करना इस संहिता के प्रमुख तत्व थे।

उन्होंने जीवन को क्षण भंगुर माना। उनके शिष्य अन्य व्यक्तियों के हाथ का बनाया हुआ भोजन नहीं करते हैं।

इस अवसर पर मेवाड़ इतिहास परिषद के सचिव डाॅ. मनोज भटनागर ने बताया कि वागड़ क्षेत्र में रहने वाले जनजातीय वर्ग में सांस्कृतिक चेतना उत्पन्न करने में स्थानीय संतों और जननायकों का प्रभाव है जिनके आश्रम/गुरूगृह/धुणियाँ याने धाम इत्यादि सामाजिक सुधार की दृष्टि से महत्वपूर्ण केन्द्र थे।

19-20वीं सदी के इस काल में सूरमाल दास, दुर्लभराम जी, मावजी महाराज एवं गोविन्द गिरी द्वारा स्थापित धूणियाँ/धाम जनजातीय वर्ग में गुरू-शिष्य परम्परा के औपचारिक एवं अनऔपचारिक शिक्षा के केन्द्र थे।

संगोष्ठी के अन्त में डाॅ. कैलाश रावल ने उपस्थित सदस्यों का अभिवादन किया एवं धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर डाॅ. हेमचन्द्र शर्मा, डाॅ. नीतू मेनारिया, डाॅ. आभा शर्मा, डाॅ. गुणवंत सिंह देवड़ा इत्यादि इतिहासविद् एवं शिक्षाविद् उपस्थित थे।


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