विनायक के सितार पर झरती रही गौड़ मल्हार की फुहार, पल्लवी के नृत्य भावों ने रचा भारतीय संस्कृति का विराट संसार

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Published on : 09 Aug, 26 16:08

चित्तर के सितार ने रची सुरवृष्टि, मोहिनीअट्टम में जीवंत हुईं राम-सीता, कृष्ण और शिव की कथाएं

विनायक के सितार पर झरती रही गौड़ मल्हार की फुहार, पल्लवी के नृत्य भावों ने रचा भारतीय संस्कृति का विराट संसार

उदयपुर। शिल्पग्राम के दर्पण सभागार में शनिवार की सांझ मानो संगीत के आकाश पर सावन उतर आया। बाहर हरियाली का मौसम था और भीतर सितार के तारों पर मेघों की छाया।

पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर की ओर से आयोजित ‘मल्हार’ उत्सव की दूसरी संध्या में शास्त्रीय संगीत और नृत्य ने मिलकर ऐसी अनुभूति रची, जिसमें वर्षा की रिमझिम, भक्ति की निर्मलता, करुणा की गहराई और अध्यात्म का आलोक एक साथ प्रवाहित होता रहा।

आरम्भ में केंद्र निदेशक डॉ अश्विन एम दलवी ने दीप प्रज्जवन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

सितार वादक विनायक चित्तर ने राग गौड़ मल्हार से कार्यक्रम का आगाज किया। उनके आलाप में स्वर किसी दूरस्थ क्षितिज पर उमड़ते बादलों की तरह धीरे-धीरे आकार लेते गए। मंद्र से तार सप्तक की यात्रा में राग का सौंदर्य खुलता चला गया और सभागार मानो वर्षा की प्रतीक्षा में ठहरा हुआ प्रतीत हुआ। जोड़ और झाला में सितार की चमकती तानों ने उस प्रतीक्षा को जैसे झमाझम फुहारों में बदल दिया।

विलंबित और मध्यलय की बंदिशों में विनायक चित्तर ने गौड़ मल्हार की गंभीरता के साथ उसकी चंचलता को भी उभारा। कभी स्वर मिट्टी की सोंधी खुशबू जैसे लगे, तो कभी बूंदों से कांपते पत्तों की हल्की थिरकन जैसे। तबले पर पं. पार्थसारथी मुखर्जी की संगत ने इस सुर-यात्रा को लय का सशक्त आधार दिया। दोनों कलाकारों का संवाद ऐसा था, जिसमें ताल और तान एक-दूसरे को सुनते, समझते और आगे बढ़ाते प्रतीत हुए।

इसके बाद मोहिनीअट्टम नृत्यांगना पल्लवी कृष्णन ने मंच को भावों की पवित्र भूमि में बदल दिया। गोस्वामी तुलसीदास की रचना ‘श्री रामचंद्र कृपालु भजमन’ से आरंभ हुई प्रस्तुति में राम के शौर्य, मर्यादा और करुणा का सौंदर्य साकार हुआ। उनकी आंखों की भाषा, हस्तमुद्राओं की लय और पदचाप की दृढ़ता ने भक्ति को दृश्य रूप दे दिया।

इसी कड़ी में ‘चिंताविष्टायाया सीता’ में सीता के मन का अकेलापन, अपमान, प्रश्न और आत्मबल गहरे प्रभाव के साथ उभरा। यह केवल एक पौराणिक चरित्र की व्यथा नहीं, बल्कि संवेदना और स्वाभिमान की एक मौन पुकार बनकर सामने आया। धरती में समा जाने का प्रसंग प्रस्तुति को अत्यंत मार्मिक ऊंचाई तक ले गया।

वहीं, ‘माया मोहन कृष्ण’ में द्रौपदी की पुकार, गजेंद्र की रक्षा और कुरुक्षेत्र में अर्जुन के विषाद को हरते कृष्ण के प्रसंगों ने धर्म, करुणा और मार्गदर्शन के अनेक रूपों को साकार किया। समापन ‘शिव पंचाक्षर स्तोत्रम्’ से हुआ, जहां ‘नमः शिवाय’ की अनुगूंज में मंच शिवमय हो उठा।

इस अवसर पर केंद्र निदेशक डॉ.दलवी संग उप निदेशक पवन अमरावत, सहायक निदेशक दुर्गेश चांदवानी, अधीक्षण अभियंता सी एल सालवी, कार्यक्रम अधिशासी हेमंत मेहता सहित शहर के कई सुर रसिक उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का संचालन संस्कृतिकर्मी दीपक पंवार ने किया। ‘मल्हार’ की यह संध्या देर तक इस स्मृति के साथ मन में गूंजती रही कि जब संगीत बरसता है, तब नृत्य उसे आत्मा की भाषा दे देता है।


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