उदयपुर। पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. अनिल मेहता ने सोमवार को अरावली क्षेत्र से संबंधित एक समिति के समक्ष विस्तृत प्रस्तुतीकरण देते हुए कहा कि अरावली पर्वतमाला की परिभाषा केवल ऊंचाई या समुद्र तल से ऊंचे होने के आधार पर तय नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि अरावली की वैज्ञानिक एवं कानूनी परिभाषा न्यायिक निर्णय के बजाय वैज्ञानिक अध्ययन, सार्वजनिक परामर्श और विधायी-नीतिगत प्रक्रिया के माध्यम से निर्धारित की जानी चाहिए।
10 अगस्त 2026 को उदयपुर में प्रस्तुत अपने दस्तावेज में डॉ. मेहता ने दो महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए—अरावली को परिभाषित करने का अधिकार किसके पास होना चाहिए तथा रिचर्ड ई. मर्फी की भू-आकृतिक वर्गीकरण पद्धति का उपयोग केवल ऊंचाई के आधार पर अरावली की पहचान के लिए क्यों नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन किसी प्राचीन पर्वत तंत्र की स्थायी वैज्ञानिक परिभाषा में भूविज्ञान, भू-आकृति विज्ञान, पारिस्थितिकी, जल विज्ञान, भूमि उपयोग, सांस्कृतिक विरासत और विकास नीति जैसे अनेक विषय शामिल होते हैं। इसलिए यह कार्य बहु-विषयक वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से पारदर्शी विधायी ढांचे में किया जाना अधिक उपयुक्त है।
डॉ. मेहता ने टी.एन. गोदावर्मन मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायालय पर्यावरणीय हितों की रक्षा के लिए कानून की व्याख्या कर सकता है, लेकिन किसी पर्वतमाला की स्थायी और राष्ट्रीय स्तर पर लागू होने वाली परिभाषा तैयार करना व्यापक नीति संबंधी विषय है।
वैज्ञानिक पक्ष पर उन्होंने कहा कि राजस्थान सरकार द्वारा रिचर्ड ई. मर्फी की पुस्तक Landforms of the World का संदर्भ लिया गया था, किंतु मर्फी की मूल पद्धति को यदि केवल ऊंचाई तक सीमित कर दिया जाए तो यह वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। मर्फी ने भू-आकृतियों का वर्गीकरण संरचनात्मक, स्थलाकृतिक तथा अपरदन-निक्षेपण संबंधी कारकों के संयुक्त आधार पर किया था; केवल ऊंचाई उसके लिए पर्याप्त नहीं थी।
डॉ. मेहता ने अरावली को विश्व की सबसे प्राचीन वलित पर्वतमालाओं में से एक बताते हुए कहा कि करोड़ों वर्षों के अपरदन के कारण इसकी ऊंचाई कम हुई है, लेकिन इसकी भूवैज्ञानिक निरंतरता, जलागम क्षमता, पारिस्थितिक संपर्क और पर्वतीय स्वरूप आज भी विद्यमान हैं।
उन्होंने अरावली को एक “पवित्र पारिस्थितिक परिदृश्य” बताते हुए इसकी सांस्कृतिक, धार्मिक और सभ्यतागत महत्ता पर भी जोर दिया। प्रस्तुतीकरण में निष्कर्ष निकाला गया कि केवल ऊंचाई के आधार पर अरावली की परिभाषा करना एक प्राकृतिक रूप से निरंतर पर्वतमाला को कृत्रिम रूप से खंडित करने के समान होगा।