उदयपुर, अरावली पर्वतमाला के संरक्षण, पुनर्जीवन और सतत विकास को लेकर तैयार किया गया ‘उदयपुर घोषणापत्र’ सोमवार को सुप्रीम कोर्ट समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया। घोषणापत्र में अरावली के दीर्घकालिक संरक्षण के साथ पारिस्थितिक पुनर्स्थापना, जल सुरक्षा, जिम्मेदार खनन और वैज्ञानिक भू-प्रबंधन के लिए व्यापक रूपरेखा प्रस्तावित की गई है।
यह घोषणापत्र 5 मई 2026 को उदयपुर में आयोजित राष्ट्रीय राउंड टेबल “Aravalli Hill Range: From Conflict to Collaboration for Ecological, Cultural & Hydrological Conservation and Sustainable Mining” में अपनाया गया था। इसे डॉ. अनिल मेहता द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
घोषणापत्र में अरावली पर्वतमाला को पृथ्वी की सबसे प्राचीन जीवित पर्वत प्रणालियों में से एक बताते हुए कहा गया है कि अरावली केवल पहाड़ियों की श्रृंखला नहीं, बल्कि एक सतत भू-वैज्ञानिक, पारिस्थितिक, जलवैज्ञानिक और सभ्यतागत परिदृश्य है। यह गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली क्षेत्र में जैव विविधता, वनों, नदियों, आर्द्रभूमियों, भूजल पुनर्भरण, जलवायु संतुलन और लाखों लोगों की आजीविका के लिए महत्वपूर्ण है।
घोषणापत्र में अरावली की पहचान केवल ऊंचाई अथवा स्थानीय ऊंचाई के अंतर के आधार पर करने के बजाय वैज्ञानिक भू-आकृतिक मानकों को अपनाने की सिफारिश की गई है।
इसमें भूगर्भीय संरचना, भू-आकृतिक विकास, रिज की संरचना, जलग्रहण क्षेत्र, पारिस्थितिक कनेक्टिविटी और भू-भाग की प्रकृति को आधार बनाने का सुझाव दिया गया है। घोषणापत्र के अनुसार अरावली की सुरक्षा प्रशासनिक सीमाओं या मनमाने ऊंचाई मानकों के बजाय उसकी भू-वैज्ञानिक निरंतरता के आधार पर होनी चाहिए।
घोषणापत्र में अरावली के लिए रियल एस्टेट, पर्यटन अथवा शहरी विकास को सुविधाजनक बनाने वाली किसी संकीर्ण या कृत्रिम परिभाषा का विरोध किया गया है।
इसमें कहा गया है कि रिसॉर्ट, होटल, बहुमंजिला परिसरों और अन्य व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए पहाड़ियों को काटना, रिज को समतल करना अथवा प्राकृतिक ढलानों में बदलाव करना अरावली की पारिस्थितिक अखंडता के अनुकूल नहीं है।
घोषणापत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी भी पहाड़ी, रिज या महत्वपूर्ण अरावली भू-आकृति को रियल एस्टेट विकास के लिए काटा, समतल, खंडित या अन्य तरीके से परिवर्तित नहीं किया जाना चाहिए।
घोषणापत्र में अरावली को “भारत के पश्चिमी जल टावर” के रूप में रेखांकित किया गया है। इसमें भूजल पुनर्भरण, जलग्रहण क्षेत्रों, नदियों, झीलों और आर्द्रभूमियों के संरक्षण को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।
साथ ही बाढ़ नियंत्रण, सूखा प्रतिरोध और जल सुरक्षा के लिए अरावली की प्राकृतिक प्रणालियों को संरक्षित करने पर जोर दिया गया है। वन्यजीव कॉरिडोर, रिज सिस्टम, वन, आर्द्रभूमि, एक्विफर और जलग्रहण क्षेत्रों को एकल पारिस्थितिक नेटवर्क के रूप में प्रबंधित करने का प्रस्ताव है।
घोषणापत्र में भील, गरासिया और अन्य स्थानीय आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान एवं संरक्षण प्रणालियों को अरावली संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है।
गवरी, मगरा बावजी पूजा और पारंपरिक सामुदायिक संरक्षण जैसी परंपराओं को संरक्षण एवं प्रोत्साहन देने की बात कही गई है। साथ ही इन समुदायों के पारंपरिक अधिकारों, आजीविका और संरक्षण संबंधी निर्णयों में सार्थक भागीदारी का सम्मान करने पर जोर दिया गया है।
अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाले प्रमुख नीतिगत मामलों में संविधान के अनुच्छेद 338A(9) के अनुरूप राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) से परामर्श को आवश्यक संवैधानिक सुरक्षा उपाय बताया गया है।
घोषणापत्र में खनिज संसाधनों को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संपदा मानते हुए कहा गया है कि खनिजों की उपलब्धता, क्षमता और आर्थिक व्यवहार्यता का निर्धारण वैज्ञानिक भू-वैज्ञानिक जांच के आधार पर किया जाना चाहिए।
नीतिगत मानक के रूप में प्रस्ताव रखा गया है कि चिन्हित अरावली पहाड़ी क्षेत्र में कुल खनन फुटप्रिंट सामान्यतः 3 से 5 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।
खनन के लिए साइट-विशिष्ट भू-वैज्ञानिक अध्ययन और समग्र लैंडस्केप प्रभाव आकलन आवश्यक बताया गया है। साथ ही संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों, महत्वपूर्ण जलग्रहण क्षेत्रों, भूजल पुनर्भरण क्षेत्रों, वन्यजीव कॉरिडोर, जियो-हेरिटेज स्थलों और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों से बचने की सिफारिश की गई है।
घोषणापत्र में पर्यावरणीय निगरानी, संसाधन दक्षता, पुनर्चक्रण, सर्कुलर इकोनॉमी, श्रमिक सुरक्षा और खनन क्षेत्रों की पारिस्थितिक पुनर्स्थापना पर भी जोर दिया गया है। अवैध खनन और अनधिकृत भूमि परिवर्तन पर प्रभावी नियंत्रण तथा कानून के तहत कड़ी कार्रवाई की बात कही गई है।
घोषणापत्र में निरंतर रिज सिस्टम, वन, वन्यजीव कॉरिडोर, भूजल पुनर्भरण क्षेत्र, प्रमुख जलग्रहण क्षेत्र, झीलों के कैचमेंट, पवित्र सांस्कृतिक स्थल और जियो-हेरिटेज क्षेत्रों को ‘नो-गो एरिया’ घोषित करने की सिफारिश की गई है।
इन क्षेत्रों में खनन तथा अन्य अपरिवर्तनीय भूमि उपयोग परिवर्तन, जिसमें रियल एस्टेट विकास भी शामिल है, को प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव है।
घोषणापत्र में केवल कानूनी संरक्षण को पर्याप्त नहीं मानते हुए ‘देव अरावली अभियान’ (Dedicated Actions for Revitalizing Aravali) शुरू करने का आह्वान किया गया है।
इस बहु-पक्षीय अभियान में सरकार, वैज्ञानिक संस्थान, उद्योग, नागरिक समाज, शिक्षण संस्थान, आदिवासी समुदाय, युवा संगठन और आम नागरिकों को शामिल करने की परिकल्पना की गई है।
अभियान के तहत पारिस्थितिक पुनर्स्थापना, जलग्रहण क्षेत्रों का पुनर्जीवन, जैव विविधता संरक्षण, नागरिक विज्ञान, सांस्कृतिक पुनर्जीवन, जिम्मेदार खनन और टिकाऊ आजीविका को बढ़ावा देने की बात कही गई है।
घोषणापत्र में मौजूदा “4M Paradigm—Meter, Map, Mining and Money” से आगे बढ़कर “Science, Society, Spirituality and Stewardship” पर आधारित नई सोच विकसित करने का आह्वान किया गया है।
घोषणापत्र में केंद्र सरकार से Integrated Aravalli Landscape Conservation Policy तैयार करने की सिफारिश की गई है। इसमें भू-वैज्ञानिक निरंतरता, पारिस्थितिक अखंडता, जल सुरक्षा, जैव विविधता, सतत खनन, सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक संरक्षण को आधार बनाने की बात कही गई है।
इसके साथ ही स्वतंत्र अरावली आयोग गठित करने का प्रस्ताव रखा गया है। इसमें Geological Survey of India, Survey of India, ISRO, Forest Survey of India, Central Ground Water Board, Central Water Commission, NCST Commission, संबंधित वन्यजीव एवं जनजातीय संस्थानों, विश्वविद्यालयों, नागरिक समाज और स्थानीय समुदायों के विशेषज्ञों को शामिल करने की सिफारिश की गई है।
प्रस्तावित आयोग अरावली के वैज्ञानिक सीमांकन, प्रबंधन और संरक्षण के लिए मजबूत मानदंड विकसित करेगा तथा सतत एवं जिम्मेदार खनन, खनिज संसाधन दक्षता, खदान बंद करने और पारिस्थितिक पुनर्स्थापना जैसे विषयों पर संबंधित उद्योग संगठनों से भी परामर्श करेगा।
उदयपुर घोषणापत्र का केंद्रीय संदेश “Conservation Before Conversion” यानी “परिवर्तन से पहले संरक्षण” है।
घोषणापत्र में कहा गया है कि अरावली को केवल मापने, नक्शे में दर्ज करने, खनन करने या आर्थिक लाभ के लिए उपयोग करने वाली पहाड़ियों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे एक जीवित भू-वैज्ञानिक, पारिस्थितिक और सांस्कृतिक विरासत परिदृश्य के रूप में समझने, संरक्षित करने, पुनर्स्थापित करने और जिम्मेदारी से संभालने की आवश्यकता है।
घोषणापत्र में स्पष्ट किया गया है कि “संरक्षण के लिए अरावली की एक परिभाषा और विकास के लिए दूसरी परिभाषा नहीं हो सकती।” किसी भी भूमि उपयोग परिवर्तन से पहले अरावली की भू-वैज्ञानिक निरंतरता, पारिस्थितिक अखंडता, जलवैज्ञानिक कार्यों, जैव विविधता और सांस्कृतिक मूल्यों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
उदयपुर घोषणापत्र इस बात पर जोर देता है कि अरावली का भविष्य संरक्षण और विकास में से किसी एक को चुनने में नहीं, बल्कि भूगोल, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के बीच संतुलन स्थापित करने में है।