लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल बहुमत में नहीं, बल्कि संवाद, सहमति और स्वस्थ संसदीय परंपराओं में निहित होती है। विधानमंडल वह सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है, जहाँ जनता की आकांक्षाएँ, समस्याएँ और अपेक्षाएँ जनप्रतिनिधियों के माध्यम से अभिव्यक्ति पाती हैं। ऐसे में सदन की कार्यवाही गरिमापूर्ण, व्यवस्थित और जनोन्मुख रहे, यह केवल सरकार या विपक्ष की ही नहीं, बल्कि सभी जनप्रतिनिधियों की सामूहिक जिम्मेदारी होती है। इसी दृष्टि से राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी द्वारा विधानसभा के प्रत्येक सत्र से पूर्व संसद की तर्ज पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की परंपरा लोकतांत्रिक संस्कृति को नई दिशा देने वाली पहल के रूप में स्थापित हो रही है।
सोलहवीं राजस्थान विधानसभा का छठा सत्र 20 अगस्त से प्रारम्भ हो रहा है। उससे पहले 18 अगस्त को विधानसभा में सर्वदलीय बैठक आयोजित की जाएगी। इस बैठक में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, संसदीय कार्य मंत्री, सत्ता पक्ष एवं विपक्ष के मुख्य सचेतक तथा विभिन्न दलों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है। यह बैठक केवल आगामी सत्र की औपचारिक तैयारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य सदन की कार्यवाही को अधिक प्रभावी, शांतिपूर्ण और जनहितकारी बनाना है।
विशेष महत्व की बात यह है कि राजस्थान विधानसभा के इतिहास में सत्र प्रारम्भ होने से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाने की इस प्रकार की पहल करने वाले विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी पहले स्पीकर हैं। संसदीय लोकतंत्र में यह व्यवस्था अनेक स्थानों पर प्रचलित रही है, किंतु राजस्थान विधानसभा में इसे संस्थागत स्वरूप देने का श्रेय देवनानी को जाता है। उनकी अध्यक्षता में यह सातवीं सर्वदलीय बैठक होगी। पिछले अनुभवों ने सिद्ध किया है कि संवाद की यह प्रक्रिया सदन के भीतर बेहतर समन्वय और सकारात्मक वातावरण के निर्माण में प्रभावी रही है।
विधानसभा अध्यक्ष का दायित्व केवल सदन की कार्यवाही का संचालन करना भर नहीं होता, बल्कि वे संसदीय मर्यादाओं के संरक्षक भी होते हैं। पक्ष और विपक्ष दोनों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए सदन को सुचारु रूप से चलाना उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। ऐसे में यदि सत्र प्रारम्भ होने से पहले सभी दलों को एक मंच पर बैठाकर संभावित विषयों, कार्यसूची, जनहित के मुद्दों और संसदीय आचरण पर विचार-विमर्श किया जाए, तो अनेक अनावश्यक गतिरोध स्वतः समाप्त हो सकते हैं।
स्पीकर देवनानी लगातार इस बात पर बल देते रहे हैं कि विधानसभा केवल राजनीतिक बहस का मंच नहीं, बल्कि लोकतंत्र का पवित्र मंदिर है। यहाँ होने वाली प्रत्येक चर्चा का सीधा संबंध प्रदेश की जनता के जीवन, विकास और भविष्य से होता है। इसलिए सदन की गरिमा बनाए रखना प्रत्येक विधायक का समान दायित्व है। उनकी यह सोच केवल सिद्धांत तक सीमित नहीं रही, बल्कि सर्वदलीय बैठकों के माध्यम से उन्होंने इसे व्यवहार में भी उतारा है।
पिछली छह सर्वदलीय बैठकों के अनुभव बताते हैं कि इस पहल से सत्ता और विपक्ष के बीच संवाद बढ़ा है, विधान सभा की कार्यवाही को लेकर बेहतर समझ विकसित हुई तथा सदन में चर्चाओं का समय भी बढ़ा है । साथ ही अनेक विषयों पर पहले से सहमति बनने के कारण सदन के समय का अधिक सार्थक ढंग से उपयोग हुआ है । लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, किंतु मतभेदों को टकराव में बदलने के बजाय संवाद के माध्यम से समाधान तक पहुँचाना ही संसदीय परिपक्वता का परिचायक है।स्पीकर देवनानी के समक्ष जब-जब सदन में अवरोध की परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई तो उन्होंने सभी पक्षों के जन प्रतिनिधियों को अपने चेंबर में बुलाकर आपसी संवाद और समझाईश से स्थिति को सामान्य बनाने के प्रयास किए है। उनका यह प्रयोग प्रायः सफल रहा है। हालाँकि अध्यापक पृष्ठभूमि के होने के कारण उन्होंने कई बार अनुशासन हीनता की स्थिति में सख़्त रुख़ अपना कर सदन की मर्यादा के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं किया है ।
वर्तमान में देशभर की विधानसभाओं और संसद में व्यवधान, नारेबाजी और कार्यवाही बाधित होने की घटनाएँ अक्सर चर्चा का विषय बनती दिखाई देती हैं। ऐसे दौर में राजस्थान विधानसभा में सत्र पूर्व सर्वदलीय बैठक की परंपरा लोकतांत्रिक कार्यसंस्कृति का सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करती है। देवनानी की यह पहल इस विचार को भी मजबूत करती है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अपनी जगह है, किंतु जनहित के प्रश्नों पर सभी दलों का साझा उत्तरदायित्व सर्वोपरि होना चाहिए।
लोकतंत्र की सफलता केवल सरकार के प्रभावी संचालन से नहीं, बल्कि एक सशक्त और रचनात्मक विपक्ष से भी सुनिश्चित होती है। सर्वदलीय बैठक दोनों पक्षों को यह अवसर प्रदान करती है कि वे संसदीय कार्यवाही को अधिक सार्थक बनाने के लिए अपनी-अपनी प्राथमिकताओं और सुझावों को साझा करें। इससे सदन में संवाद का वातावरण बनता है, पारस्परिक विश्वास बढ़ता है और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता का विश्वास भी मजबूत होता है।
राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी द्वारा प्रारम्भ की गई यह परंपरा भविष्य में संसदीय लोकतंत्र की एक आदर्श कार्यप्रणाली के रूप में स्थापित हो रही है। यदि प्रत्येक सत्र से पहले इसी प्रकार सहमति और संवाद का वातावरण तैयार होता रहा, तो न केवल सदन की कार्यवाही अधिक उत्पादक बनेगी, बल्कि लोकतंत्र की वह मूल भावना भी सशक्त होगी, जिसमें विचारों का मतभेद स्वीकार्य है, किंतु जनहित सर्वोपरि रहता है।
राजस्थान विधानसभा के पिछले (पंचम) सत्र में हुई 24 बैठकों में लगभग 184 घंटे कार्यवाही चली। यानी प्रति बैठक औसतन लगभग 7 घंटे 40 मिनट कार्य हुआ। व्यापक वार्षिक परिप्रेक्ष्य में भी राजस्थान विधानसभा की बैठकों की औसत अवधि लगभग 7 घंटे रही है, जोकि कई अन्य राज्यों से अधिक है। विधानसभाध्यक्ष देवनानी का लक्ष्य है कि राज्य विधानसभा वर्ष में लगभग 40 दिन चले और सदन में अधिकतम समय तक सार्थक बहस हो। उनका मानना है कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सदन का अधिक समय तक चलना आवश्यक है।
राज्य विधान सभा के आगामी षष्ठम सत्र से पहले होने वाली सर्वदलीय बैठक से यही अपेक्षा है कि सभी राजनीतिक दल दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर जनता की आकांक्षाओं को केंद्र में रखेंगे। जब संवाद, विश्वास और सहयोग की भावना के साथ सदन चलेगा, तभी विधानसभा वास्तव में जनभावनाओं की प्रभावी अभिव्यक्ति का मंच बन सकेगी। यही लोकतंत्र की सफलता है और यही स्वस्थ संसदीय परंपराओं की सबसे बड़ी पहचान भी होती है ।