GMCH STORIES

भारतीय एग्रो इकोनॉमिक्स रिसर्च सेंटर की अखिल भारतीय कार्यकारिणी की  दो दिवसीय बैठक का समापन हुआ

( Read 324 Times)

30 Nov 25
Share |
Print This Page

भारतीय एग्रो इकोनॉमिक्स रिसर्च सेंटर की अखिल भारतीय कार्यकारिणी की  दो दिवसीय बैठक का समापन हुआ

भारतीय एग्रो इकोनॉमिक्स रिसर्च सेंटर की अखिल भारतीय कार्यकारिणी की  दो दिवसीय बैठक का समापन हुआ।

बैठक का प्रारंभ दीप प्रज्वलन के साथ किया गया।

*भूमि अधिग्रहण कानून* *उदयपुर डिक्लेरेशन*

देश में अंग्रेजों द्वारा 1884 में भूमि अधिग्रहण कानून लाया गया। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी यही कानून अनेकों वर्षों तक लागू रहा एवं निर्बाध रूप से किसानों का शोषण होता रहा। सन 2013 में एक नया कानून पारित हुआ जो 1 जनवरी 2014 से प्रभावित हुआ जिसमें भारतीय किसान संघ द्वारा दिए गए दो सुझाव जिसमें उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण, अंतिम पर्याय हो तथा सामाजिक सहमति का आकलन हो, मान्य किए ग़ए । लेकिन किसानों का शोषण नहीं रुक पाया क्योंकि देश के विभिन्न राज्यों ने 2013 के कानून में अपनी सुविधा अनुसार संशोधन करके कानून को कमजोर कर दिया।

 

भारतीय एग्रो इकोनामिक रिसर्च सेंटर द्वारा भूमि अधिकरण विषय पर एक देशवासी सर्वे किया गया जिससे पता चला कि - 

1. सरकारों द्वारा भूमि का वास्तविक कब्जा लेने के बाद भी मुआवजा नहीं मिला या नगण्य मिला, वह भी समय पर नहीं मिला।

2. विस्थापियों को रोजगार, पुनर्वास तथा आवास की व्यवस्था केवल कागजों तक ही सीमित रही।

3. अधिग्रहण के बाद बची हुई भूमि नई परिस्थिति के कारण पानी में डूबने से या इसी प्रकार अन्य कारणों से कृषि योग्य नहीं रही । लेकिन उसका मुआवजा लेने का प्रावधान नही हैं ।                              

4. लैंड पूलिंग एक्ट जैसे कानून बनाकर छद्म आकर्षण द्वारा भोले भाले किसानों को कागजी आश्वासन के आधार पर छलपूर्वक स्वीकृति लेने का चल हुआ जिसमें अधिकारियों को आतंक फैलाने की छुट्टी थी इस अत्याचार को रोकने का कोई प्रयास या प्रावधान नहीं है नियम को मानने की कोई बाध्यता नहीं है किसी अंकुश की व्यवस्था भी नहीं है।

5. उपचार के लिए केवल न्यायपालिका ही है क्योंकि न्यायपालिका ने नियमों की अवहेलना करने पर कई निर्णय किसान हित में पारित किये, लेकिन किसान के पास न्यायिक लड़ाई लड़ने का ना तो समय है ना पैसा अतः किसान इसे अपनी नियति मानकर हताश हो जाता है। पूरे देश में लगभग यही स्थिति है ।

6. योजनाएं समय पर पूरी न होने से किसान आर्थिक एवं मानसिक रूप से टूटकर हताश हो जाते हैं इस पर कोई विचार नहीं किया गया ।

 

उपरोक्त अनीयमिताओं को देखते हुए को भारतीय एग्रो रिसर्च सेंटर द्वारा उदयपुर डिक्लेरेशन द्वारा निम्न सुझाव प्रस्तव प्रस्तुत करता है - 

1. कानून या संशोधन करने में ग्राम सभा में 80% निवासियों की सहमति अनिवार्य ली जाए, जो न्यायिक या स्वतंत्र अधिकारी की उपस्थिति में हो ताकि दबाव से कार्य न हो जिसका डिजिटल रिकॉर्ड हो ।

2. मुआवजा वास्तविक बाजार मूल्य या रजिस्ट्री मूल्य जो अधिक हो उसे चार गुना हो तथा प्रति वर्ष में उसका पुन: मूल्यांकन हो। 

3. भूमि का कब्जा लेने के पूर्व आर एंड आर योजना पूर्ण रूप से लागू हो जिसके पालन हेतु जिलेवार जवाब देही तय हो जिसके वैकल्पिक भूमि आवास प्रशिक्षण एवं रोजगार सुनिश्चित हो सके।

4. जहा जनजाति आदीवासी लोगों का विस्थापना अति आवश्यक हो तब उन सभी ग्राम वासियों को यथास्थिति एक ही जगह नए संपूर्ण ग्राम के रूप में पुनर्वास के द्वारा स्थापित किया जाए ताकि उनकी संस्कृति समाज सामाजिक परिवेश आदि का बचाव हो सके ।

5. जब तक अत्यंत आवश्यक सार्वजनिक उद्देश्य ना हो बहू फसली सिंचित भूमि के अधिकरण पर रोक लगे 

6. वन क्षेत्र में उपलब्ध ऊसर भूमि पर सर्वे कर उसका तथा अन्य बंजर भूमि का पहला प्रयोग किया जाए ।

7. गांव को विस्थापन की स्थिति में वहां के निवासी अपनी आजीविका ही खो देते हैं जिससे उन्हें मजबूरन मजदूरी करनी पड़ती है अतः उन्हें अन्य प्रशिक्षण देकर रोजगार की गारंटी हो ।

8. लैंड पूलिंग स्कीम समाप्त हो ।

9. परियोजना में किस को शेयर होल्डर बनाकर हिस्सेदारी दी जाए ।

10. सार्वजनिक उपदेश से अधिग्रहण भूमि का बिल्डर, कंपनी आदि को पुनः विक्रय या स्थानांतरण पूर्ण प्रतिबंध हो ।

11. अधिकृत भूमि का 5 वर्षों में उपयोग नहीं किया जाता है तो उक्त भूमि उसी किसान को वापस हो जिसमें लिया गया मुआवजा वापस देय नहीं होगा ।

 

12. भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया डिजिटल तथा पारदर्शी हो तथा पब्लिक डोमेन में हो तथा मोबाइल शिकायत एप विकसित हो ।

13. सरकार बोली लगाकर नीलामी के तौर पर किसानों के साथ भूमि खरीदने का सौदा तुरंत भुगतान के साथ भी कर सकती है लेकिन भूमि का मूल्य तत्कालीन बाजार भाव के चार गुना से कम ना हो। 

14. विभिन्न राज्यों द्वारा किए गए संसाधनों के कारण मुख्य प्रावधान ही समाप्त हो गए हैं अतः केंद्र सरकार राज्य सरकारों की समिति से तथा आवश्यकता हो तो संविधान संशोधन द्वारा पूरे देश में कानून में एकरूपता लाई जाए। 

15. भूमि अधिकरण के कार्य में ब्यूरोकैसी सभी नियमों की अवहेलना कर अपने अधिकारों का दुरुपयोग करती है जिसे सरकारों से पूरी सुरक्षा प्राप्त होती है, इसके बचाव के लिए नियमों में यह व्यवस्था करनी होगी कि किसी भी स्थिति में नियमानुसार पर्याप्त मुआवजा दिए बिना, किसान की भूमि का अधिग्रहण होता है तो उसे क्रिमिनल ऑफेंस की श्रेणी में माना जाए, जो गैर जमानती अपराध की श्रेणी में हो तथा रिस्ट्रोइस्पेक्टिव प्रभाव से लागू किया जाए, ताकि देश भर में पेंडिंग केस जहां किसानों के साथ अति की गई वह केस सुलझा सकेंगे।

बैठक में दिनेश जी कुलकर्णी अखिल भारतीय संगठन मंत्री भारतीय किसान संघ, श्री प्रमोद कुमार चौधरी अध्यक्ष भारतीय एग्रो इकोनामिक रिसर्च सेंटर श्री मकरंद करे महामंत्री भारतीय एग्रो इकोनामिक रिसर्च सेंटर और और श्रीनिवास मूर्ति, राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता परिषद, दिल्ली। अधिवक्ता परिषद दिल्ली के अध्यक्ष श्री संदेश संजय जी पोद्दार। श्री अजय जी तलहर, श्री प्रताप सिंह जी धाकड़, कुलगुरु, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय गरिमा  उपस्थिती रही।

 

बैठक में भारतीय किसान संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, भारतीय मजदूर संघ इत्यादि संगठनों के पदाधिकारी की गरिमा में उपस्थिति रही।


Source :
This Article/News is also avaliable in following categories :
Your Comments ! Share Your Openion

You May Like