पेड़ जीवन के स्रोत की तरह होते हैं... देखते देखते एक पेड़ अपने भीतर जन्म लेने लगता। पेड़ को केवल आँख भर देखते ही नहीं... देखते... देखते ही पेड़ सा हो जाते हैं।

वह बतलाता है कि जीना है तो किस तरह से जीवन को जीना है। किसी के आगे पीछे नहीं।

अपने स्व में रहो। देर से ही सही... जो कुछ तुम्हारा है वह तुम्हारा ही रहेगाअभाव की हर दर पर भाव का जीवन है।

विराट होकर जीना ही सही मायने में जीना... जिसे हम सब पेड़ के दर्शन से प्राप्त करते हैं।

पेड़ का होना ही संस्कृति का उत्सव है- पुराने पेड़ हैं सम्भाल कर रखते जीवन की तरह जीवन की बातें पेड़ पृथ्वी का ... जीवन का ... और सभ्यता के क्रम में पसरी बातों का हिसाब सम्भाल कर रखते हैं।

एक संस्कृति बार-बार जीवन की उत्तर जीविता को अपनी ही शाखाओं व प्रशाखाओं से जीवित करती रहती है। पेड़ की संस्कृति को मनुष्य पेड़ की दुनिया में आकर ही जी पाता है। पेड़ की संस्कृति को पाने के लिए आदमी को अपनी दुनिया में पेड़ को लाना पड़ता है... इससे आगे पेड़ को समझने के हमें पेड़ की दुनिया में जाना पड़ता है।

अभाव में, प्रतिकूलता में एक पेड़ खिलता है.... और बतलाता है कि सम में रहो समत्व योग के साथ चलों ... कभी भी रुक जाने की, भाग जाने की, या यूं ही समय काटने की आदत नहीं होनी चाहिए।

दुनिया को अपने हिसाब से बदलने के लिए अपने स्वभाव में रहते हुए ही कुछ किया जा सकता है। संसार को बदल पाना कोई हँसी-खेल नहीं है।

यह तभी संभव होता जब हम सब अपने मूल स्वभाव के साथ अपना कार्य करते हैं स्वभाव को अपने पूरे अस्तित्व के साथ जी रहे हो... यह जीना आसान नहीं है पर जब हम स्वभाव में रहना सीख लेते हैं तो कुछ भी मुश्किल नहीं होता।

कोई ऐसा कार्य न हो जो हमारे स्वभाव से मेल न खाता हो। स्वभाव के विपरीत जाकर जब कुछ भी किया जाता है तो इसके लिए अलग से प्रयास करना पड़ता है।

वह कार्य हमारे अनुकूल या प्रतिकूल न होकर हमारे विपरीत हो जाता है- इसे साधने के लिए हमें अपने पूरे स्वभाव में परिवर्तन करना पड़ता है। इस स्थिति में हम वहीं नहीं करते जो हम कर सकते हैं बल्कि वह करते हैं जो दूसरे चाहते हैं।

इस तरह परवश होकर न केवल हम अपने कार्य को, अपनी गति को रोकते हैं बल्कि कुछ भी स्वाभाविक रूप से कर ही नहीं पाते।

संसार को तभी बनाया और बदला जा सकता है जब हम अपने स्वभाव में रहना सीख जायें। स्वभाव के साथ पेड़ जीता है।

कुछ भी न इधर की न उधर की... जो है बस अपना ही है... अपने जरूरत भर के पदार्थ का पंचभूतों से उपयोग करता रहता है। कुछ भी अनावश्यक नहीं जितनी जरूरत है उतना का ही संग्रह और वह भी लौटा कर अपनी दुनिया में चला जाना सीखलाता है।

पेड़ की दुनिया ही ऐसी है... जो लिया उससे बहुत ज्यादा ... ज्यादा देने की सीख देता है। जब इस तरह जीना सीख लेते हैं तो कुछ भी मुश्किल नहीं।

यहां पदार्थ की दुनिया नहीं होती यहां तो बस मूल स्वभाव होता है जो कभी रुकता नहीं बस चलता रहता है। जीवन की सारी विविधता पेड़ के किनारे से शुरु हो जाती है।

पेड़ को देखते बातें करते... बहुत कुछ बदल जाता.. हमारे भीतर जो टुच्चापन होता वह पेड़ के आते ही चला जाता ... पेड़ सबसे पहले आदमी बनाता .... और आदमी की तरह जीना सीखलाता।

अपने आप को समझ पाना, पहचानना और जब स्वयं को जान जायेंगे तो बहुत कम बातें रह जाती है पता करने को पता नहीं कहाँ-कहाँ आदमी भागता रहता है पर जो खुद वह है, जो पास है, जो स्वभाव है उसे ही समझ नहीं पाता और इस भागादौड़ी में जीवन कहीं किनारे छुट जाता है।

जिसे देखों वहीं भागा जा रहा है कहाँ ? पता नहीं।

पर भाग रहा है। इस भागती दुनिया में एक जगह स्थिरता के साथ सोचने व टिकने का काम पेड़ ही करते हैं।

पेड़ से यह सीखने की जरूरत है। पेड़ नहीं होते तो संसार में इतनी उदारता कहां से आती?

सोचना कठिन है। अपने स्व में रहने की सीख सबसे पहले पेड़ के किनारे से मिलती है... वह किसी की नकल नहीं करता, न किसी से कुछ लेता।

सामने दो पेड़ हैं अपने-अपने ढंग से रहते हैं- एक पीपल का पेड़ है, विराट है। किसी बात की चिंता नहीं।

कौन आ रहा है? कौन जा रहा है? किसी से कुछ भी लेना-देना नहीं।

जो भी मेरे पास आयेगा ...उसे राहत - छाया-सुकून मिलेगा। अपनी विराटता में सभी को स्वीकार करता।

दूर से ही दिखता है.... पीपल के नर्म... नर्म नये पत्ते हिलते-डुलते रहते हैं गिलहरी से लेकर असंख्य पक्षी इसकी साख पर आते रहते हैं अपनी-अपनी गाथाओं के साथ जीवन को जीते हैं।

दूसरी तरफ अमलतास है। पीले-पीले गुच्छेदार फूलों से लदा हुआ।

जीवंत ... सबको जीवन के रंग में खिलना सिखलाता है। दोनों पेड़ अपने अपने स्व में स्थित हैं।

किसी से कुछ भी लेना देना नहीं। यहां तो बस जीवन को जीवन की तरह जीया है।

एक सम पर ... कोई आये ... कोई जाये पेड़ अपनी जगह पर, अपनी तरह से संसार के हर रंग को जीता है पर अपना रंग कभी नहीं छोड़ता अपने ही रंग में खिलता है पेड़ ... पेड़ का कोई बाजार नहीं होता वह किसी के पीछे-पीछे नहीं चलता... पेड़ का बस जीवन होता है।

खुशी में झूमता रहता है पेड़। पेड़ जीता रहता है।

अपने भीतर से जीवन की खुशियों को धारण करता है। यहां कुछ भी बनावटी नहीं होता ... सहज गति से पेड़ चलता रहता है।

कभी भी पेड़ पर कृत्रिम/बनावटी पत्ते व रंग चढ़े पत्ते नहीं दिखते। वह तो जैसा भी होता बस सामने आ जाता।

अपनी प्रकृति में खुश रहता। यह खुश बने रहना ही स्वभाव है... जो पेड़ की प्रकृति है उससे वह अलग जा ही नहीं सकता।

इसी तरह मनुष्य को अपने स्वभाव में रहना चाहिए। एक मनुष्य में हर स्थिति में मनुष्यपन बना रहे यह मनुष्यता की सबसे बड़ी जरूरत है।

मनुष्य खुश रहे। अपने आस-पास की दुनिया में होने के अर्थ के साथ जाये तब तो बात बनती है।

यदि कुछ भी संरक्षित होता है तो यह हमारे भीतर के मनुष्य के कारण ही संभव है। पेड़ से यह सीखने की जरूरत है कि हर स्थिति में अपनी जगह पर रहना है।

पेड़ न तो पाला बदलता न स्वभाव, वह तो बस अपनी जगह पर होता। जीवंत बना रहता।

हँसता ... बोलता ... खिलता पेड़ ही जीवन का आधार होता।

जीते जागते लोग पेड़ के साथ चलते हैं... पेड़ से बातें करते हैं... पेड़ के संसार में सब होते ... कोई अपना या कोई पराया नहीं ... पेड़ जादू की तरह जीवन को जीना सिखलाता है... विपरीतताओं में खिलकर .. जीवन का इतिहास व संस्कृति का रंग एक पेड़ लिखता रहा है।

पेड़ पृथ्वी पर जीवन की संभावना के आदि स्त्रोत व प्रतीक हैं।

भीषण आग बरसाने वाली गर्मी में भी पेड़ अपने साख पर नई-नई कोंपलें सजा लेते हैं ... दूर-दूर तक घूम आइये-कहीं सुकून नहीं मिलेगा पर पेड़ के नीचे आते ही एक आनंद का परिसर सामने आ जाता है- एक ताजगी, एक चमक, एक लहलहापन, एक रंग खिल जाता यह केवल प्रकृति में मिलेगा।

पेड़ अपने हर पात में जीवन का विस्तार करता है। यहां जीवन आप से आप खिल जाता है।

पेड़ किसी एक समय में नहीं होता। वह अपने भीतर काल के पार जाने की, विपरीत स्थिति में जीने की क्षमता रखता है।

पेड़ के किनारे कभी खाली नहीं होते-वहां कुछ न कुछ मिल ही जाता है। एक बार पेड़ के किनारे पर जाकर देखे।

पेड़ टूट जाता है। खण्डित हो जाता फिर भी अपनी खुशहाली नहीं छोड़ता।

पेड़ को खुश होने के लिए किसी को गिराने की आवश्यकता नहीं। वह अपने स्वभाव से खुश होता है।

जीवन को सहज गति के साथ जीता है। पेड़ की जड़े कभी मिट्टी नहीं छोड़ती ... संभव कर मिट्टी पकड़े रहती हैं।

मिट्टी को पकड़े रहना ही जिजीविषा का सच है। इस रूप में कई ऐसे पेड़ की कहानियां सामने आती है जो गिर गये थे आंधी तूफान में घायल हो गये फिर भी अपनी जड़ों में मिट्टी को पकड़े रहते थे।

हँस रहे थे अपने हरितिमा भरे रंग के साथ। पेड़ का जीवन हर थके, परेशान व घबराये इंसान को जीवन के प्रति चाह देते मिल जायेगा।

सभ्यता व संस्कृति के संरक्षण में पेड़ हमेशा से जीवन का पाठ पढ़ाते रहे हैं। सभ्यता की सड़क के किनारे-किनारे पेड़ अपने अस्तित्व के साथ मानव जीवन का सिरा पकड़े कहा-अनकहा बहुत कुछ कहते रहते हैं।

किसी पुराने पेड़ की कथा उठा लीजिए ... वह एक स्कूल की तरह शिक्षण-प्रशिक्षण देता मिल जायेगा। पेड़ अकेला नहीं होता न ही हरियाली का स्रोत, वल्कि जीवन प्रणाली से शब्द उठाते हुए संस्कृति की गाथा को सामने लाता है।

इस क्रम में कुछ पेड़ ... स्कूल का पीपल, बरगद का पेड़, पाकड़ व नीम का पेड़, जिनके साथ झूलती स्मृतियां रचती रहती हैं सभ्यता का पाठ। यदि ये न होते तो हम संसार को किन आँखों से देखते ... ?

पेड़ से बात करते-पेड़ को देखते ... जीते संसार की एक रचना होती रहती है। पेड़ और कविता पृथ्वी के आदि सहचर हैं- उम्मीद है कि इस पृथ्वी को बचाने में पेड़ और कविता अपने ढंग से मददगार होंगे... पेड़ और कविता पृथ्वी की उम्मीद की तरह आँखों में टंगे है। पेड़ और कविता पृथ्वी को बचाने के लिए एक उम्मीद की तरह बार-बार जन्मते रहेंगे... इसी उम्मीद के साथ ... ।