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हीट-रेसिस्टेंट टेंट और फौलादी इरादे

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24 Apr 26
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हीट-रेसिस्टेंट टेंट और फौलादी इरादे

कहते हैं कि आपदा किसी का पता पूछकर नहीं आती, लेकिन जब आती है तो सब कुछ उजाड़ देती है। लखनऊ के विकास नगर में लगी भीषण आग ने भी यही किया—300 से अधिक परिवारों के सिर से छत छीन ली। मलबे के ढेर पर बैठी सिसकती बस्तियों की आवाज़ जब राजस्थान के जोधपुर तक पहुँची, तो वहाँ के एक संगठन ने वह कर दिखाया जो अक्सर बड़े-बड़े सरकारी तंत्र भी नहीं कर पाते। 

प्रशासनिक स्तर पर राहत के नाम पर प्लास्टिक की पन्नियां और तिरपाल बांटे जा रहे थे। लेकिन 40 डिग्री की चिलचिलाती धूप में ये पन्नियां राहत कम और 'भट्टी' ज़्यादा साबित हो रही थीं। इसी बीच 'ट्रू होप फाउंडेशन' (True Hope Foundation) और उसके सह-संस्थापक धवल दर्जी एक वैज्ञानिक समाधान और फौलादी इरादा लेकर लखनऊ की गलियों में उतरे।

पन्नियां नहीं, दिया 'सुरक्षा कवच'
अग्निकांड के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी चिलचिलाती गर्मी और लू। प्लास्टिक की पन्नियां न केवल गर्मी सोखती हैं, बल्कि उनमें दोबारा आग लगने का खतरा भी बना रहता है। धवल दर्जी ने इस पारंपरिक ढर्रे को तोड़ते हुए 100 'हीट-रेसिस्टेंट' (ताप-रोधी) शेल्टर स्थापित किए। 

ये टेंट साधारण तिरपाल नहीं हैं; ये खास तकनीक से बने हैं जो सूरज की तपिश को रिफ्लेक्ट (Reflect) कर देते हैं। 10x20 फीट के इन मजबूत आशियानों के अंदर का तापमान बाहर के मुकाबले काफी कम रहता है, जिससे बेघर हुए बुजुर्गों और बच्चों को इस भीषण गर्मी में एक बड़ी राहत मिली है।

जोधपुर से लखनऊ: मानवता का सेतु

हाल ही में 'डिजास्टर मैनेजमेंट हीरो अवार्ड' से सम्मानित धवल दर्जी के लिए यह सिर्फ एक चैरिटी नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन की एक नई परिभाषा गढ़ने जैसा था। धवल बताते हैं, "हमारा मकसद सिर्फ तिरपाल बांटना नहीं था। हम चाहते थे कि जिसने अपना घर खोया है, उसे कम से कम एक ऐसी छत मिले जहाँ वह चैन से सांस ले सके। ये शेल्टर वाटरप्रूफ भी हैं, जो आने वाली बारिश में भी इन परिवारों की ढाल बनेंगे।"

 बदली राहत की तस्वीर

आज विकास नगर की उस बस्ती में जहाँ सिर्फ काली राख और धुंआ था, वहाँ सफेद रंग के ये आधुनिक टेंट उम्मीद की नई इबारत लिख रहे हैं। स्थानीय लोग राजस्थान से आए इन युवाओं के जज्बे को देखकर दंग हैं। एक पीड़ित महिला ने नम आंखों से बताया, "पन्नियों के नीचे दम घुट रहा था, लेकिन इन बच्चों ने हमें जो घर (टेंट) दिए हैं, उनमें अब थोड़ी ठंडक और सुकून है।"

राजस्थान के इस संगठन ने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे फौलादी हों और सोच आधुनिक, तो सिसकियों को मुस्कुराहट में बदलने के लिए संसाधनों से ज़्यादा 'संवेदना' की ज़रूरत होती है। 'ट्रू होप फाउंडेशन' का यह मॉडल अब पूरे देश के लिए आपदा प्रबंधन की एक मिसाल बन चुका है


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