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बिहार में ‘नीतीश राज’ के बाद होगा अब ‘सम्राट राज’

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14 Apr 26
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बिहार में ‘नीतीश राज’ के बाद होगा अब ‘सम्राट राज’

सम्राट चौधरी बुधवार को बिहार के मुख्यमंत्री की शपथ लेंगे। भाजपा विधायक दल द्वारा उन्हें नेता चुनने के बाद सम्राट चौधरी ने राज्यपाल के समक्ष अपना दावा पेश किया जिसे राज्यपाल ने मंजूर कर लिया है। वे बुधवार सवेरे अपने पद को शपथ लेंगे। इसके साथ ही बिहार की राजनीति में नीतीश युग का अन्त हो जाएगा लेकिन उनके पुत्र निशांत कुमार सम्राट चौधरी मंत्रिपरिषद में एक और उप मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले सकते है।

बिहार की राजनीति हमेशा से परिवर्तन, प्रयोग और सामाजिक समीकरणों की प्रयोगशाला रही है। पिछले डेढ़ दशक से राज्य की सत्ता का केंद्र रहे नीतीश कुमार ने “सुशासन” और विकास के एजेंडे पर अपनी  
अलग पहचान बनाई। उनके नेतृत्व में कानून-व्यवस्था, सड़क, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में सुधार देखने को मिला। यही कारण है कि इस दौर को अक्सर “नीतीश राज” कहा जाता है और उन्हें सुशासन बाबू भी बोला जाता था, लेकिन अब राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से उभर रहा है कि क्या आने वाले समय में बिहार “नीतीश राज” से आगे बढ़कर “सम्राट राज” की ओर बढ़ेगा? यह सवाल सम्राट चौधरी के उभार के साथ और भी प्रासंगिक हो गया है।

बिहार में हाल के वर्षों में राजनीतिक गठबंधनों का तेजी से बदलना एक नई प्रवृत्ति बन गई है। भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में अपने संगठन को मजबूत करने और स्वतंत्र नेतृत्व विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इसी रणनीति के तहत सम्राट चौधरी को आगे लाया गया है। सम्राट चौधरी खुद को एक आक्रामक और स्पष्टवादी नेता के रूप में स्थापित करने में सफल रहे हैं। वे खासकर पिछड़े वर्ग (OBC) के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, जो बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है।

हालांकि नीतीश कुमार का शासन विकासोन्मुख रहा है, लेकिन उनके राजनीतिक फैसलों—विशेषकर बार-बार गठबंधन बदलने—ने उनकी छवि को कुछ हद तक प्रभावित किया है। जनता के बीच यह धारणा बनी है कि सत्ता में बने रहने के लिए उन्होंने वैचारिक लचीलापन ज्यादा दिखाया है।
यही वह बिंदु है, जहां भाजपा और सम्राट चौधरी “स्थिरता” और “मजबूत नेतृत्व” का मुद्दा उठाकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं। वे “डबल इंजन सरकार” का नारा देकर केंद्र और राज्य के बेहतर तालमेल का वादा कर रहे हैं।

बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण सबसे अहम कारक रहा है। लालू प्रसाद यादव ने पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के आधार पर राजनीति की, जिसे बाद में नीतीश कुमार ने अधिक व्यापक सामाजिक गठबंधन में बदल दिया।
अब सम्राट चौधरी इसी सामाजिक समीकरण को पुनर्गठित करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका ध्यान विशेष रूप से अति पिछड़े वर्ग (EBC) और गैर-यादव ओबीसी समुदायों पर है। यदि भाजपा इस वर्ग को अपने पक्ष में करने में सफल होती है, तो यह बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
 भाजपा को न केवल मजबूत संगठनात्मक ढांचा खड़ा करना होगा, बल्कि सम्राट चौधरी को एक सर्वमान्य मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में स्थापित भी करना होगा।
इसके अलावा, पार्टी को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन जैसे जमीनी मुद्दों पर ठोस और विश्वसनीय समाधान प्रस्तुत करने होंगे। केवल राजनीतिक नारों के आधार पर सत्ता परिवर्तन संभव नहीं है।

यह भी ध्यान रखना होगा कि बिहार में विपक्ष, विशेषकर राष्ट्रीय जनता दल, अभी भी मजबूत जनाधार रखता है। इसके साथ ही, नीतीश कुमार का अनुभव और उनकी गठबंधन साधने की क्षमता उन्हें अभी भी राजनीति के केंद्र में बनाए हुए है।
इसलिए, “नीतीश राज” का अंत और “सम्राट राज” की शुरुआत कोई सरल या तात्कालिक प्रक्रिया नहीं है। यह एक लंबी राजनीतिक लड़ाई का परिणाम होगा।

बिहार की राजनीति फिलहाल संक्रमण के दौर से गुजर रही है। “नीतीश राज” के बाद “सम्राट राज” की चर्चा यह दर्शाती है कि राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाएँ बन रही हैं।हालांकि, यह परिवर्तन केवल व्यक्ति आधारित नहीं होगा, बल्कि इसके पीछे सामाजिक समीकरण, संगठनात्मक मजबूती और जन मुद्दों पर विश्वसनीयता जैसे कई कारक काम करेंगे। आने वाले चुनाव यह तय करेंगे कि बिहार की जनता स्थिरता और अनुभव को प्राथमिकता देती है या नए नेतृत्व और बदलाव की ओर कदम बढ़ाती है।
स्पष्ट है कि बिहार की राजनीति में आने वाले समय में मुकाबला और भी दिलचस्प और निर्णायक होने वाला है।
 


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