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राजस्थानी भाषा में शिक्षा सम्बन्धी सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से एक बार फिर से राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता और राजस्थान की राज्यभाषा बनने की उम्मीदें बढ़ी 

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14 May 26
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राजस्थानी भाषा में शिक्षा सम्बन्धी सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से एक बार फिर से राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता और राजस्थान की राज्यभाषा बनने की उम्मीदें बढ़ी 

एन जी भट्ट 

 

राजस्थानी भाषा को लेकर जाने माने वरिष्ठ पत्रकार दैनिक जलते दीप और राजस्थानी मासिक पत्रिका माणक के प्रधान संपादक पदम मेहता और राजस्थानी भाषा के निष्णात विद्वान प्रो.कल्याण सिंह शेखावत की याचिका पर माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंगलवार, 12 मई को दिए गए ऐतिहासिक फ़ैसले का देश-विदेश में फैले राजस्थानी समुदाय के करोड़ो लोगों द्वारा खुशी भरे दिल से स्वागत किया जा रहा है और चारों तरफ से दोनों याचिकाकर्ताओं को बधाईयां और शुभकामनाएं मिल रही है। मीडिया और सोशल मीडिया में भी जबर्दस्त प्रतिक्रियाएं आ रही है।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से एक बार फिर से राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता और राजस्थान की राज्यभाषा बनने की उम्मीदें बढ़ गई है।

 

राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर संवैधानिक मान्यता देने की मांग पिछले कई दशकों से चल रही है। वर्ष 2020 में देश में आई नई शिक्षा नीति में प्रारंभिक शिक्षा के स्कूली बच्चों को अपनी मातृ भाषा में शिक्षा देने की नीति घोषित होने के बाद राजस्थान में राजस्थानी भाषा को राज्य भाषा बना कर लागू करने की मांग भी सामने आई। राजस्थानी भाषा को उसका मान सम्मान और हक हकूक दिलाने के लिए गत पांच दशक से प्रतिबद्ध मूर्धन्य पत्रकार पदम मेहता लोकसभा और विधानसभा के हर सत्र में माननीय सांसदों और विधायकों को प्रत्यक को अलग - अलग पत्र लिख कर, रुबरु संपर्क कर इन मार्गों को पूरी कराने की गुहार लगाते है। उनका मानना है कि जब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं मातृ भाषा में पढ़ाई के पक्षधर है तब राजस्थान में राजधानी को प्रदेश की राजभाषा बनाने के मार्ग में क्या बाधा है? वर्तमान में केन्द्र और राज्य में डबल इंजन की सरकार है और जब देश के कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला भी राजस्थान के है । केन्द्रीय संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत और सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी जोधपुर के है तब राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने के मार्ग में क्या दिक्कत है,यह समझ से परे है जबकि 11 वर्ष पूर्व जब देश की राजधानी नई दिल्ली के जंतर मंतर पर राजस्थानी भाषा को मान्यता देने को लेकर एक बड़ा प्रदर्शन हुआ था जिसमें राजस्थान से बड़ी संख्या में भाषा प्रेमी नई दिल्ली पहुंचे थे,तब इन नेताओं के साथ ही गजेन्द्र सिंह शेखावत, सांसद पी पी चौधरी, चन्द्र प्रकाश जोशी सहित कई सांसद भी उसमें शामिल हुए थे तथा अर्जुन राम मेघवाल के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी भेंट की थी। इस प्रतिनिधिमंडल में स्वयं पदम मेहता, राजस्थानी भाषा मान्यता समिति के अध्यक्ष केसरी चंद मालू, अप्रवासी राजस्थानियों की दिल्ली में प्रतिनिधि संस्था राजस्थान संस्था संघ के अध्यक्ष सुरेश खंडेलवाल ,के के नरेडा, राजेन्द्र व्यास, जी एन भट्ट आदि शामिल थे ।

प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के बाद प्रतिनिधि मण्डल के सदस्य तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह और अन्य मंत्रियों किरण रिजिजू आदि से भी मिले थे। बाद में भोती और भोजपुरी भाषा के समर्थक सांसद भी राजस्थानी भाषा के समर्थन में साथ में आ गए। बताते है कि तब तकरीबन इन तीनों भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के प्रस्ताव पर सैद्धांतिक रूप से सहमति बन गई थी । यह तक की केबिनेट मेमो भी तैयार होने वाला था लेकिन बताते है कि राजस्थानी भाषा के मार्ग में राजस्थान के ही एक सीनियर ब्यूरोकेट आड़े आ गए जोकि तब केंद्रीय गृह मंत्रालय में एक बड़े ओहदे पर थे और बहुत प्रभावशाली भी थे। इस प्रकार राजस्थानी के साथ ही भोजपुरी और भोती भाषा को संवैधानिक मान्यता का मामला खटाई पर पड़ गया। साथ ही भाषाई आंदोलन भी शांत पड़ गया।

 

इन परिस्थितियों के बावजूद एक व्यक्ति पदम मेहता ने राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने की अपनी मुहिम को रुकने नहीं दिया और इसे जीवन का अन्तिम लक्ष्य बना अनवरत प्रयासों में जुट रहे। उन्होंने तथ्यों के साथ अपनी बातों को केन्द्र और राज्य के नेताओं तथा अधिकारियों को स्मरण पत्र भेजे तथा संसद के हर सत्र में प्रत्यक सांसद को व्यक्तिगत रूप से तथ्यात्मक पत्र लिख कर मायड़ भाषा के समर्थन में दलीय भावनाओं से ऊपर उठ कर सामूहिक प्रयास करने का आग्रह किया और बार बार उन्हें स्मरण कराया कि 2003 में राजस्थान विधानसभा द्वारा सर्वसम्मति से पारित जो संकल्प पत्र भारत सरकार को भेजा गया है उसमें राजस्थान के हर अंचल की भाषा और बोली को राजस्थानी भाष का अभिन्न अंग बनाया गया है इसलिए राज्य के किसी क्षेत्र विशेष के साथ किसी प्रकार का भेदभाव का सवाल ही नहीं उठाता। उन्होंने तथ्यों के साथ बताया कि राजस्थान के 8 करोड़ नागरिकों के साथ ही देश विदेश में बसे करोड़ो प्रवासी राजस्थानियों द्वारा अपने घरों और सामान्य बोलचाल में राजस्थानी भाषा का ही उपयोग किया जाता है। इसके अलावा तीज त्यौहारों और लोक त्यौहारों, लोक गीतों, लोक नाटकों ,राजस्थानी संगीत और राजस्थानी फिल्मों में भी राजस्थानी भाषा का ही प्रयोग रहा। 500 वर्ष पूर्व भक्तिमयी मीरा बाई से लेकर आजादी के आन्दोलन से पूर्व कई कवियों, रचनाकारों तथा वर्तमान सदी के कालजयी कवि कन्हैया लाल सेठिया आदि तक सभी ने अपनी रचनाएँ राजस्थानी में ही रची है। राजस्थानी संगीत की धुनें पूरे विश्व में शान के साथ गूंजती है। इसके साथ ही साक्षरता अभियान यह तक भारतीय चुनाव आयोग का मतदाता जागृति अभियान नुक्कड़ नाटक आदि भी राजस्थानी और राजस्थान की आंचलिक भाषाओं और बोलियों में किए जाते है।

 

 

राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने का यह मामला केवल एक भाषा को मान्यता देने तक सीमित नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान, साहित्यिक परंपरा और करोड़ों लोगों की मातृभाषा के सम्मान से भी जुड़ा हुआ है।भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाएँ शामिल हैं। किसी भाषा को इस सूची में शामिल किए जाने पर उसे आधिकारिक और संवैधानिक मान्यता प्राप्त हो जाती है। इससे उस भाषा को कई प्रकार के अधिकार और सुविधाएँ मिलती हैं, जैसे संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी ) सहित विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भाषा का उपयोग,साहित्य, शिक्षा और शोध को सरकारी प्रोत्साहन,स्कूलों और विश्वविद्यालयों में अध्ययन-अध्यापन का विस्तार,सरकारी संस्थाओं और साहित्य अकादमी में प्रतिनिधित्व,भाषा संरक्षण के लिए विशेष योजनाएँ आदि।राजस्थानी भाषा अभी आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है, इसलिए उसे यह संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है।

 

राजस्थानी एक समृद्ध भाषा मानी जाती है, जिसकी अनेक बोलियाँ हैं जैसे मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, वागड़ी, शेखावाटी, मेवाती आदि। भाषा विशेषज्ञों के अनुसार ये सभी बोलियाँ मिलकर राजस्थानी भाषा परिवार का निर्माण करती हैं।

राजस्थानी भाषा का साहित्य अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। वीर रस, लोकगीत, चारण साहित्य, संत काव्य और लोककथाओं की विशाल परंपरा इसमें मिलती है। पृथ्वीराज रासो से लेकर मीरा बाई और दादूदयाल तक की रचनाओं में राजस्थानी की गहरी छाप दिखाई देती है।

 

राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने की मांग स्वतंत्रता के बाद से ही उठती रही है। वर्ष 1949 में “राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी” जैसे संगठनों ने इस दिशा में अभियान शुरू किया।

सबसे महत्वपूर्ण कदम वर्ष 2003 में उठा, जब राजस्थान विधानसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की अनुशंसा भेजी। उस समय राज्य की सभी राजनीतिक पार्टियों ने इसका समर्थन किया था।इसके बाद विभिन्न साहित्यकारों, सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने लगातार आंदोलन चलाए। कई बार संसद में भी यह मुद्दा उठाया गया।

 

राजस्थानी भाषा को मान्यता देने का मुद्दा लंबे समय से केंद्र सरकार के पास लंबित है। इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण बताए जाते हैं।कुछ भाषा विशेषज्ञों का तर्क है कि राजस्थानी कई बोलियों का समूह है और इसका एक मानकीकृत स्वरूप तय करना चुनौतीपूर्ण है। हालांकि समर्थकों का कहना है कि हिंदी, पंजाबी और अन्य भाषाओं में भी अनेक बोलियाँ हैं, फिर भी उन्हें मान्यता प्राप्त है।देश में भोजपुरी, मगही, हरियाणवी, बुंदेली, गढ़वाली जैसी अनेक भाषाएँ भी आठवीं अनुसूची में शामिल होने की मांग कर रही हैं। केंद्र सरकार पर एक साथ कई भाषाओं को लेकर दबाव है।आठवीं अनुसूची में किसी नई भाषा से को शामिल करने के लिए संसद में संविधान संशोधन आवश्यक होता है। इसके लिए व्यापक राजनीतिक सहमति और प्रशासनिक तैयारी की जरूरत होती है।

भाषाविदों का मानना है कि राजस्थानी भाषा स्वतंत्र भाषाई पहचान रखती है। इसे भारतीय जनगणना में भी अलग भाषा के रूप में दर्ज किया गया है। साहित्य अकादमी ने भी राजस्थानी साहित्य को मान्यता दी हुई है। कई विद्वान यह तर्क देते हैं कि यदि मैथिली, डोगरी, संथाली और बोडो जैसी भाषाओं को संवैधानिक मान्यता मिल सकती है, तो राजस्थानी भी इसकी पात्र है।राजस्थानी भाषा को भारत के बाहर भी अकादमिक स्तर पर अध्ययन और शोध के रूप में महत्व मिला है। भारत में कई विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा एवं साहित्य के लिए स्नातक, स्नातकोत्तर और शोध स्तर तक अध्ययन की व्यवस्था है। राजस्थानी भाषा का प्रभाव भारत की सीमाओं से बाहर भी दिखाई देता है, विशेष रूप से दक्षिण एशिया के उन क्षेत्रों में जहाँ ऐतिहासिक रूप से राजस्थानी समुदायों का आवागमन, व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क रहा है। हालांकि भारत के पड़ोसी देशों में राजस्थानी को भारत जैसी औपचारिक संस्थागत मान्यता बहुत सीमित रूप में प्राप्त है, फिर भी कुछ देशों में इसके अध्ययन, शोध और सांस्कृतिक उपयोग की परंपरा मौजूद है।

 

हाल ही में राजस्थानी भाषा को शिक्षा और संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के बाद यह विषय फिर चर्चा में आया। अदालत ने मातृभाषा आधारित शिक्षा और स्थानीय भाषाओं के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट सीधे किसी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं कर सकता, क्योंकि यह अधिकार संसद और केंद्र सरकार के पास है। लेकिन अदालत की टिप्पणियों ने राजस्थानी भाषा आंदोलन को नया बल दिया है।

 

*संवैधानिक मान्यता मिलने पर संभावित लाभ*

 

यदि राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाता है, तो विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई बढ़ेगी,प्रतियोगी परीक्षाओं में भाषा का उपयोग संभव होगा,साहित्य और शोध को प्रोत्साहन मिलेगा

नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से जुड़ सकेगी।लोककला, लोकगीत और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण मजबूत होगा।राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता का मुद्दा केवल भाषा का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता और पहचान का प्रश्न बन चुका है। राजस्थान विधानसभा का प्रस्ताव, साहित्यकारों का आंदोलन और समाज का व्यापक समर्थन यह दर्शाता है कि इस मांग की जड़ें गहरी हैं।अब निगाहें केंद्र सरकार और संसद पर टिकी हैं कि वे इस दिशा में कब और क्या निर्णय लेते हैं। यदि राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में स्थान मिलता है, तो यह राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जाएगी।

 

दैनिक जलते दीप और राजस्थानी पत्रिका माणक के प्रधान संपादक पदम मेहता और राजस्थानी भाषा के निष्णात विद्वान प्रो.कल्याण सिंह शेखावत साधुवाद के पात्र है जिन्होंने एक बार फिर से राजस्थान की आत्मा मानी जाने वाली राजस्थानी भाषा के मामले को उच्चतम न्यायालय के माधम से भारत और राजस्थान सरकार के ध्यान में लाकर भारत सरकार की नई नीति के अनुरूप मातृ भाषा में शिक्षा के मुद्दे को उठाया। उम्मीद है कि आने वाले समय में राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता और प्रदेश की राजभाषा बनाने के इस अभियान को अंततोगत्वा कामयाबी मिलेगी। 


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