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श्वेता शर्मा की कृति ' माँ का गांव और बचपन ' का समारोह पूर्वक लोकार्पण

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19 Mar 26
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श्वेता शर्मा की कृति ' माँ का गांव और बचपन ' का समारोह पूर्वक लोकार्पण

कोटा । नवोदित लेखिका श्वेता शर्मा की प्रथम संस्मरण कृति माँ का गांव और बचपन का मंगलवार को मदर टेरेसा विद्यालय के सभागार में समारोहपूर्वक लोकार्पण हुआ। मुख्य अतिथि डॉ.रोशन भारती, अध्यक्ष योगेन्द्र शर्मा, विशिष्ट अतिथि डॉ. विवेक मिश्र एवं श्रीमती सुमन लता शर्मा ने लेखिका के प्रयास को सराहा तथा कथेतर विधा में आगे अधिक कार्य करने हेतु प्रोत्साहित किया। मार्गदर्शक अतिथि जितेन्द्र निर्मोही ने साहित्य और परम्परा को उभार कर विशेष सन्दर्भों को उल्लेखित करते हुए सृजन कर्म और दिशानिर्देश से रचनात्मक वातावरण तैयार करने की बात कही। 

    मुख्य वक्ता कथाकार एवं समीक्षक विजय जोशी ने हाड़ौती अंचल की संस्मरण लेखन परम्परा को विवेचित करते हुए कहा कि  

संस्मरण जीवन के उन पलों का स्मरण होता है जो मन के भीतर समय - समय पर करवट लेते हैं और तत्कालीन और वर्तमान को जोड़कर एक सेतु निर्मित करते हैं। लेखिका श्वेता शर्मा की संस्मरण कृति माँ का गाँव और बचपन इन्हीं सन्दर्भों की एक बानगी है। लेखिका ने अपनी माँ श्यामा शर्मा से सुनी हुई बचपन की बातों को उनकी ही जुबानी में कलम बद्ध किया है। यह निबद्धता इस बात की साक्षी है कि बातपोशी से जीवन की स्मृतियों में उभरी तथा बदलते परिवेश से उपजी सांस्कृतिक विरासत का  जीवन्त चित्रण, वाचिक परम्परा का महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाता है। जोशी ने कहा कि लेखिका श्वेता शर्मा की यह कृति माँ के बचपन की स्मृतियों का ऐसा ही दस्तावेज है जिसमें लोक की संवेदना अपने सहज रूप में व्यवहारिक रूप से विद्यमान है। जहाँ संवाद की परम्परा से संस्कारों का संरक्षण होता है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता रहता है। विजय जोशी ने कृति की विशेषता एवं कुछ संस्मरणों को उल्लेखित करते हुए आगे कहा कि लेखिका ने अधिकांश संस्मरण आलेखों में विषयगत भावों को विश्लेषित और विवेचित करते हुए अपनी माँ के गाँव के वर्णन से लेकर उनके बचपन की यादों को उन्ही की जुबानी से आलेखित कर आंचलिकता को उभारा है। ये सभी संस्मरण परिवेश के चित्रण, स्थानीय बोली की मिठास और अनुभूत संवेदना को यथा रूप में सरलता से उभारते हैं। 

      विशिष्ट अतिथि डॉ.प्रभात कुमार सिंघल ने कहा कि कृति में गांव की सोंधी माटी की गंध है जो  कभी न भूलने वाली यादों की मानिंद छाई हैं। यह कृति केवल लेखिका की गांव से जुड़ी स्मृतियां ही नहीं हैं वरन पाठक को भी उसके गांव की याद दिला जाती हैं।  कथात्मक शैली में लिखे संस्मरण की भाषा सहज,सरल और प्रवाहपूर्ण हैं। गांव की बोली के शब्दों को ज्यों का त्यों लिया है। लेखन में कहीं कोई कृत्रिमता, बोझिलता और जटिलता नहीं है। 

    लेखिका श्वेता शर्मा ने अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बताते हुए परिवार से प्राप्त रचनात्मक संस्कारों को लेखन का आधार बताया। अतिथियों ने माँ सरस्वती का पूजन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। अनंदिता शर्मा ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। श्यामा शर्मा ने सभी का स्वागत किया।  हर्ष मित्र शर्मा ने सभी का आभार व्यक्त किया। संचालन नहुष व्यास ने किया। समारोह में बड़ी संख्या में साहित्यकार मौजूद रहे। 

लेखिका का स्वागत :

समारोह के साथ ही लेखिका श्वेता शर्मा का विभिन्न संस्थाओं की ओर से रीता गुप्ता, डॉ. वैदेही गौतम, डॉ. प्रभात कुमार सिंघल,महेश शर्मा, स्नेहलता शर्मा, रेणु सिंह राधे, हेमराज सिंह, डॉ. सुशीला जोशी, डॉ. युगल सिंह, विष्णु शर्मा हरिहर, भगवती प्रसाद गौतम, संदीप द्विवेदी, गरिमा , विजय जोशी, विजय प्रकाश माहेश्वरी, विजय शर्मा एवं परिवार जनों ने मालार्पण कर, शॉल ओढ़ा कर एवं प्रतीक चिन्ह भेंट कर स्वागत किया


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