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अख्तर खान ‘अकेला’: नाम से अकेले, मगर किरदार से एक पूरा कारवां

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19 Mar 26
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अख्तर खान ‘अकेला’: नाम से अकेले, मगर किरदार से एक पूरा कारवां

दूसरों की कामयाबी को अपनी खुशी बनाने वाली शख्सियत

 

-हाड़ौती के मौजिज अफराद की खूबियों को दुनिया के सामने लाने का अनोखा अंदाज़

-खामोश काम करने वालों को पहचान दिलाने का जज़्बा

-शब्दों में मोहब्बत और एहतराम का असर,

किसी इंसान की असली पहचान उसकी कामयाबी नहीं, बल्कि उसकी मेहनत और उसके किरदार में छिपी होती है और इन्हीं खूबियों को पहचानना सबसे बड़ी इंसानियत है। अख्तर खान ‘अकेला’-यह नाम अपने आप में एक मुकम्मल पहचान रखता है। नाम के साथ ‘अकेला’ ज़रूर जुड़ा हुआ है, मगर उनकी शख्सियत, उनका किरदार और उनका असर यह बताता है कि वे कभी अकेले नहीं रहे। उनके साथ चाहने वालों, दोस्तों, शागिर्दों और हमख़याल लोगों का एक बड़ा कारवां हमेशा मौजूद रहता है। यह कारवां सिर्फ तआरुफ़ या रस्मन दोस्ती तक सीमित नहीं, बल्कि एहसास, एतबार और मोहब्बत के मजबूत रिश्तों से जुड़ा हुआ है। अख्तर खान ‘अकेला’ पत्रकारिता की दुनिया में एक काबिल, जिम्मेदार और एहतियात बरतने वाली शख्सियत के तौर पर पहचाने जाते हैं। करीब 40-45 बरस से वे लेखन, विचार और समाजी सरोकारों से जुड़े हुए हैं। चार दशक की यह सफरनामा-ए-क़लम सिर्फ शब्दों का सिलसिला नहीं, बल्कि एक ऐसी तहरीरी जद्दोजहद है जिसमें समाज, इंसाफ, सच्चाई और इंसानियत के मुद्दों को पूरे एहतिमाम से उठाया गया है।

हाड़ौती अंचल के कोटा, बारां, बूंदी और झालावाड़ से लेकर चित्तौड़गढ़, टोंक, जयपुर, सवाई माधोपुर और देश की राजधानी नई दिल्ली तक देश-विदेश के कई अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं और चैनलों में काम करने वाले रिपोर्टर, संपादक और मीडिया प्रबंधक उनके अजीज दोस्तों में शुमार हैं। इन रिश्तों की बुनियाद सिर्फ पेशेवर ताल्लुकात पर नहीं, बल्कि सच्ची दोस्ती, भरोसे और इंसानी हमदर्दी पर टिकी हुई है। कई दशकों से यह दोस्ताना बदस्तूर कायम है और वक्त के साथ और मजबूत हुआ है।

 इंसानियत और हमदर्दी की मिसाल,,

अख्तर खान ‘अकेला’ की शख्सियत का एक बहुत अहम पहलू उनकी दोस्ती और मददगार तबीयत है। पत्रकारिता के पेशे में अक्सर कई लोग तंगहाली, परेशानियों या पेशेवर दबावों का शिकार हो जाते हैं। ऐसे में अख्तर खान ‘अकेला’ ने हमेशा जरूरतमंदाें की खामोशी से मदद की है। वे सिर्फ सलाह देने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरी शिद्दत से उसकी कानूनी रहनुमाई करते हैं। उन्होंने कई ऐसे लाेगाें की मदद की जो आर्थिक मुश्किलों से जूझ रहे थे। कई बार तो हालात इतने संगीन होते थे कि किसी को सहारे की सख्त जरूरत होती थी। उस वक्त अख्तर खान ‘अकेला’ ने बिना किसी शोर-शराबे के उनकी मदद की और उसे कभी अपनी शान या एहसान के तौर पर पेश करना मुनासिब नहीं समझा। उनका यह रवैया बताता है कि मदद करना उनके लिए महज सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक इंसानी फर्ज है। यही वजह है कि बहुत से लाेग उन्हें सिर्फ दोस्त ही नहीं, बल्कि अपना रहनुमा और सहारा मानते हैं। उनका मानना है कि सच लिखने वाले कलमकार को डरना नहीं चाहिए, मगर साथ ही उसे कानून की हदों और जिम्मेदारियों का भी पूरा एहसास होना चाहिए। कई युवा पत्रकारों और रचनाकारों के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शक हैं। उनके अनुभव, उनकी समझ और उनकी सादगी नई पीढ़ी के लिए एक स्कूल की तरह है। कई युवाओं ने उनके साथ बैठकर पत्रकारिता की बारीकियां सीखी हैं। वे उन्हें यह सिखाते हैं कि पत्रकारिता सिर्फ खबर लिखने का काम नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपनी मूल जिम्मेदारी भी है। इसी तरह वकालत के क्षेत्र में भी वे नए वकीलों के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं। फ्रेशर वकीलों को वे कानून की बारीकियां समझाते हैं और उन्हें पेशेवर ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं।

 लेखन में बेबाकी और जिम्मेदारी,,

अख्तर खान ‘अकेला’ अपने शहर, अपने समाज और अपने आसपास के माहौल पर बहुत गहराई से लिखते हैं। उनके लेखों में स्थानीय परिवेश की खुशबू, समाज की नब्ज और इंसानी जज्बात की सच्चाई साफ दिखाई देती है। उनकी लेखनी का सबसे अहम पहलू यह है कि वे किसी भी विषय पर लिखते समय पूरी ईमानदारी बरतते हैं। जहां किसी शख्स या संस्था को तारीफ का हकदार समझते हैं, वहां खुले दिल से उसकी सराहना करते हैं। लेकिन अगर कहीं कमी-खामी नजर आती है तो वे बिना लाग-लपेट के उस पर तन्कीद भी करते हैं। उनकी आलोचना तल्ख जरूर होती है, मगर उसका मकसद किसी को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि समाज में बेहतरी और सुधार लाना होता है। वे सीधे शब्दों में कड़ा संदेश देने से भी पीछे नहीं हटते।

 अपने शहर-अपनी कौम के सच्चे पैरोकार,,

अख्तर खान ‘अकेला’ अपने शहर-अपनी कौम के सच्चे पैरोकार हैं। वे हमेशा इस बात पर जोर देते हैं कि शहर और समाज की तरक्की शिक्षा, जागरूकता और इंसाफ से ही मुमकिन है। जब भी शहर और समाज के हक, उसकी बुनियादी जरूरतों या उसके अधिकारों का सवाल उठता है, तब वे बड़ी मजबूती के साथ अपना पक्ष रखते हैं। वे चाहते हैं कि शहर और समाज के पढ़े-लिखे और जिम्मेदार लोग आगे आएं और खुलकर अपनी बात रखें। इसके साथ ही वे उन लोगों पर भी तंज कसने से नहीं चूकते जो बड़े-बड़े ओहदों पर पहुंचने के बावजूद समाज की जरूरतों और समस्याओं पर खामोश रहते हैं। उनकी यह तन्कीद दरअसल समाज को जागरूक करने की कोशिश होती है। उनकी भावना हमेशा सकारात्मक रहती है। उनका मकसद किसी से टकराव पैदा करना नहीं, बल्कि राज्य और राष्ट्र स्तर पर समाज की बेहतरी और तरक्की का रास्ता तलाश करना होता है।

      शायराना मिजाज और संवेदनशील दिल,

अख्तर खान ‘अकेला’ की शख्सियत का एक और दिलचस्प पहलू उनका शायराना मिजाज है। वे शायरी के जरिए अपने जज्बात, अपने तजुर्बात और अपने आसपास के माहौल को शब्दों में ढालते हैं। उनकी शायरी में जिंदगी की सच्चाई, समाज की तस्वीर और इंसानी एहसासात की गहराई साफ झलकती है। वे अपने आसपास के माहौल को बेहद खूबसूरती से अल्फाज में पिरो देते हैं। दोस्ती निभाने में ‘अकेला’ का कोई जवाब नहीं। वे सचमुच ‘यारों के यार’ हैं। जो भी व्यक्ति उनसे मदद की उम्मीद लेकर आता है, वे उसे खाली हाथ लौटाना पसंद नहीं करते। उनका मानना है कि इंसानियत का तकाजा यही है कि जरूरतमंद की हर मुमकिन मदद की जाए। यही वजह है कि उनके दोस्त, सहयोगी और जानने वाले उन्हें बेहद इज्जत और मोहब्बत की नजर से देखते हैं।

     तालीम के प्रति गहरी प्रतिबद्धता,

अख्तर खान ‘अकेला’ एक उच्च शिक्षित परिवार से ताल्लुक रखते हैं और शिक्षा के महत्व को भली-भांति समझते हैं। उन्होंने न सिर्फ खुद उच्च शिक्षा हासिल की, बल्कि अपने परिवार और अपने करीबियों को भी शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनकी कोशिशों का ही नतीजा है कि उनके परिवार में कई लोग डॉक्टर, इंजीनियर और अस्पताल प्रबंधक जैसे महत्वपूर्ण पेशों में काम कर रहे हैं। 

    मुकम्मल शख्सियत : भाषाओं पर मजबूत पकड़,

अख्तर खान ‘अकेला’ की भाषाई क्षमता भी काबिले-तारीफ है। वे हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी में समान दक्षता रखते हैं। यह बहुभाषिक दक्षता उनके लेखन को और अधिक प्रभावशाली बनाती है। वे अपने विचारों को अलग-अलग पाठक वर्ग तक आसानी से पहुंचाने में सक्षम हैं। अगर अख्तर खान ‘अकेला’ की शख्सियत को समेटकर देखा जाए तो वे पत्रकार, वकील, शायर, समाजसेवी, मार्गदर्शक और एक सच्चे दोस्त-इन सभी भूमिकाओं का बेहतरीन संगम हैं। उनकी जिंदगी का मकसद सिर्फ अपनी पहचान बनाना नहीं, बल्कि समाज में जागरूकता, इंसाफ और इंसानियत को मजबूत करना है। यही वजह है कि वे अपने नाम के उलट कभी अकेले नहीं रहे-उनके साथ हमेशा लोगों की मोहब्बत और भरोसे का एक लंबा कारवां चलता रहा है।

अख्तर खान ‘अकेला’ की शख्सियत का एक बेहद दिलचस्प और काबिले-तारीफ पहलू यह भी है कि वे हाड़ौती अंचल के मौजिज नागरिकों, काबिल अफराद और समाज में खिदमत अंजाम देने वाली शख्सियतों की कद्र करना बखूबी जानते हैं। किसी शख्स की सालगिरह हो, किसी को कोई अहम ओहदा हासिल हुआ हो, या फिर किसी अफसर, शिक्षक, समाजसेवी या पेशेवर शख्सियत को तरक्की और पदोन्नति मिली हो-ऐसे हर मौके पर अख्तर खान ‘अकेला’ बड़े एहतिमाम और दिली लगाव के साथ उस शख्स की खूबियों को उजागर करते हैं। उनकी खासियत यह है कि वे महज़ रस्मी मुबारकबाद देने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जिस शख्स के बारे में लिखते या बोलते हैं, उसकी शख्सियत, उसकी मेहनत, उसके अखलाक और उसकी समाजी खिदमत को इतने खूबसूरत और असरदार अंदाज़ में बयान करते हैं कि सुनने या पढ़ने वाला शख्स भी उस व्यक्ति की काबिलियत का कायल हो जाता है। हाड़ौती के कोटा, बारां, बूंदी और झालावाड़ समेत पूरे इलाके में बहुत से ऐसे काबिल और मेहनती लोग हैं, जो अपने-अपने क्षेत्र में खामोशी से काम करते रहते हैं। अक्सर ऐसा होता है कि उनकी सेवाएं सीमित दायरे में ही रह जाती हैं और व्यापक स्तर पर उन्हें वह पहचान नहीं मिल पाती, जिसके वे असल मायनों में हकदार होते हैं। ऐसे में अख्तर खान ‘अकेला’ अपनी क़लम और अपनी आवाज़ के जरिए उन शख्सियतों को पहचान दिलाने का काम करते हैं।

    हर आम और खास के लिए शब्दाें के बाजीगर ,

जब वे किसी के जन्मदिन, पदोन्नति या किसी अहम जिम्मेदारी मिलने पर उसके बारे में लिखते हैं या सार्वजनिक मंच से उसका जिक्र करते हैं, तो उनके शब्दों में एक सच्ची मोहब्बत, एक खालिस अपनापन और एक ईमानदार एहसास झलकता है। यही वजह है कि जिस शख्स के बारे में वे लिखते हैं या बोलते हैं, उसे यह महसूस होता है कि शायद पहली बार किसी ने उसकी मेहनत, उसकी जद्दोजहद और उसकी खूबियों को इतने गौर से देखा और समझा है। अक्सर लोग यह कहते हुए नजर आते हैं कि “हो सकता है बहुत लोगों ने हमारी मेहनत को देखा हो या नहीं देखा हो, मगर अख्तर भाई ने जरूर उसे महसूस किया है।” यही एहसास उन्हें दूसरों से अलग बनाता है। यह अंदाज़ दरअसल उनकी सकारात्मक सोच और समाज के प्रति उनकी सच्ची नीयत का आईना है। वे यह मानते हैं कि अगर समाज के काबिल और नेकनीयत लोगों की खुलकर सराहना की जाए, तो इससे न सिर्फ उस व्यक्ति का हौसला बढ़ता है, बल्कि दूसरों को भी अच्छा काम करने की प्रेरणा मिलती है।

उनकी लेखनी और उनके शब्दों का असर इतना व्यापक होता है कि जिस शख्स के बारे में वे लिखते हैं, उसकी पहचान सिर्फ स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच जाती है। सोशल मीडिया, अखबारों और विभिन्न मंचों के जरिए उनकी लिखी हुई बातें दूर-दराज़ तक पढ़ी और सुनी जाती हैं, टाॅकिंग पाॅइंट बनती है। यही वजह है कि बहुत से लोग यह मानते हैं कि अख्तर खान ‘अकेला’ सिर्फ एक पत्रकार या लेखक ही नहीं, बल्कि अपने शहर और अपने अपने शहर-अपने समाज के लोगों के सच्चे हमदर्द और खालिस शुभचिंतक भी हैं। वे दूसरों की कामयाबी में दिल से खुश होते हैं और उसे खुले दिल से दुनिया के सामने पेश करते हैं।

दरअसल, किसी की अच्छाइयों को पहचानना और उसे पूरे एहतराम के साथ दुनिया के सामने पेश करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। मगर अख्तर खान ‘अकेला’ इस हुनर में भी माहिर हैं। उनकी यही खूबी उन्हें एक ऐसे इंसान के रूप में स्थापित करती है, जो अपने आसपास के लोगों की कद्र करना और उनकी कामयाबियों को जश्न की तरह मनाना बखूबी जानता है।


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