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पांच प्रदेशों में विधानसभा चुनाव के वोटों की गिनती आज 

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03 May 26
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भारत के पूर्वी और दक्षिणी पांच राज्यों पश्चिम बंगाल,असम, पुडुचेरी, तमिलनाडु और केरलम में 824 विधानसभा सीटो पर विधानसभा चुनावों की वोटिंग का काम पूरा होने के बाद अब सबकी निगाहें सोमवार 4 मई को होने वाली मतगणना पर टिकी हैं। चुनाव आयोग के अभूतपूर्व सुरक्षा इंतजामों के साथ ईवीएम मशीनों में बंद उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला मतगणना का कार्य पूरा होने के साथ ही सामने आ जायेगा। इन पांचों राज्यों में कुल मिलाकर 8,000 से अधिक उम्मीदवारों ने चुनाव मैदान में अपनी किस्मत आजमाई है। मतगणना का कार्य सम्पन्न होने के साथ ही इन 5 राज्यों पश्चिम बंगाल,असम, पुडुचेरी, तमिलनाडु और केरलम में राजनीतिक तस्वीर साफ होने की संभावना है। सबसे अधिक डुगडुगी पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों को लेकर है। जटिल राजनीतिक समीकरण वाले इन राज्यों में परिणाम को लेकर उत्सुकता और अनिश्चितता दोनों बनी हुई हैं। इस बार के चुनावों से देश में न केवल क्षेत्रीय दलों और वामपंथी राजनीति की दिशा तय होगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। इन राज्यों में 824 विधानसभा सीटों पर मतदान हुआ है, जिसमें पश्चिम बंगाल (294), तमिलनाडु (234), असम (126), केरल (140) और पुडुचेरी (30) विधानसभा की सीटें शामिल हैं। पश्चिम बंगाल में करीब 1,000 से अधिक,तमिलनाडु में 3,500 से ज्यादा केरल में 900 से अधिक असम में 900 से अधिक तथा पुडुचेरी में 300 से ज्यादा उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला ईवीएम मशीनों में बंद हुआ है।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की मतगणना में केवल दलों की जीत-हार ही नहीं, बल्कि कई बड़े और प्रभावशाली नेताओं की राजनीतिक साख भी दांव पर लगी है। इन चुनावों के नतीजे उनके भविष्य, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका को भी प्रभावित करेंगे। मतदान का नया इतिहास रचने वाले पश्चिम बंगाल में सबसे बड़ी नजर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर है। वे चौथी बार राज्य की सत्ता पर काबिज होने की कोशिश में है । वे राज्य की राजनीति का केंद्र हैं और उनकी पार्टी की जीत या हार सीधे उनके नेतृत्व पर असर डालेगी। इसके साथ ही विपक्ष की ओर से सुवेंदु अधिकारी भी प्रमुख चेहरा हैं, जिनकी भूमिका चुनाव में निर्णायक रही है।राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की प्रतिष्ठा भी इस राज्य के प्रदर्शन से जुड़ी मानी जा रही है। तमिलनाडु में मुकाबला मुख्यतः द्रविड़ दलों के बीच है, इसलिए एम. के. स्टालिन की साख दांव पर है। वहीं दूसरी ओर एडप्पडी के. पलानीस्वामी के नेतृत्व की परीक्षा भी होनी है। साथ ही लोकप्रिय अभिनेता थलापति विजय की टीवीके पार्टी की भी अग्नि परीक्षा है। इसके अलावा राष्ट्रीय दलों के विस्तार के लिहाज से यहां का प्रदर्शन महत्वपूर्ण रहेगा। असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का नेतृत्व केंद्र में है। यदि उनकी सरकार दोबारा मजबूत जनादेश लाती है, तो उनकी राजनीतिक स्थिति और मजबूत होगी। साथ ही कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव अहम है। केरल में लगातार दूसरी बार के वामपंथी मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की लोकप्रियता और उनके शासन मॉडल की परीक्षा हो रही है। वहीं कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्ष के लिए वी. डी. सतीशन की रणनीति का आकलन होगा। पुडुचेरी में एन. रंगासामी की साख दांव पर है, जो क्षेत्रीय राजनीति के मजबूत चेहरों में गिने जाते हैं।इसके अलावा कांग्रेस और अन्य दलों के स्थानीय नेताओं के लिए भी यह चुनाव निर्णायक है। इन सभी नेताओं के लिए यह चुनाव: व्यक्तिगत नेतृत्व की परीक्षा,पार्टी के भीतर उनकी स्थिति और राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका तय करेगा। इस तरह 4 मई की मतगणना केवल सीटों का आंकड़ा नहीं, बल्कि देश के कई बड़े राजनीतिक चेहरों के भविष्य का फैसला भी करेगी। कमोबेश तीन राज्यों असम केरल और पुडुचेरी में स्थिति साफ दिखाई दे रही लेकिन यक्ष सवाल पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु का हैं कि इनमें क्या होगा? हालांकि अधिकांश एग्जिट पोल्स पश्चिम बंगाल के इस बार मोदीमय और केसरिया रंग में रंगे जाने की बात कह रहे है। यदि ऐसा होता है तो ममता दीदी को इस बार अपनी सरकार गंवाने के साथ ही मुख्यमंत्री की गद्दी भी छोड़नी पड़ेगी। एग्जिट पोल्स के अनुसार तमिलनाडु में में डीएमके गठबंधन की सरकार बन सकती है। हालांकि उनके मार्ग में मशहूर अभिनेता थलापति विजय की टीवीके पार्टी के सबसे बड़ी पार्टी बनने के अनुमानों के चलते उनके लिए सबसे बड़ा रोड़ा साबित हो सकती है।

सबसे पहले बात उन तीन राज्यों की की जाए, जहां एग्जिट पोल्स के रुझान अपेक्षाकृत स्पष्ट संकेत माने जा रहे हैं। इन राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान जिस प्रकार के मुद्दे उभरे और जिस तरह से मतदाताओं की प्रतिक्रिया सामने आई, उससे यह संकेत मिल चुका है कि यहां सत्ता परिवर्तन होगा या फिर मौजूदा सरकार को पुनः जनादेश मिलेगा। यहां चुनाव अपेक्षाकृत सीधे मुकाबले वाले रहे, जहां स्थानीय मुद्दे, नेतृत्व की स्वीकार्यता और संगठन की मजबूती निर्णायक भूमिका में दिखाई दी। एग्जिट पोल्स के रुझानो के अनुसार असम में भाजपा गठबंधन वाली हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार हैट्रिक लगाने जा रही है। इसी प्रकार पुडुचेरी में भी भाजपा गठबंधन बाजी मार रहा है लेकिन दक्षिण भारत के केरल में वामपंथी सरकार का किला ढह रहा है और दस वर्षों के अन्तराल के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेवलपमेंट फ्रंट (यूड एफ) लेफ्ट डेवलपमेंट फ्रंट (एलडीएफ) को हरा कर पुनः सत्ता पर काबिज हो सकता हैं। केरल में इस बार सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इनकम्बेंसी) का असर भी उप दिखाई दिया है।

हालांकि इन तीन प्रदेशों के चुनाव परिणामों की तस्वीर तो साफ दिखाई दे रही है लेकिन देश की असली दिलचस्पी देश के पूर्वांचल में भारतीय जनता पार्टी और ममता बनर्जी के नाक का सवाल बने पश्चिम बंगाल और दक्षिणी भारत के तमिलनाडु को लेकर है। पश्चिम बंगाल में चुनाव हमेशा से ही केवल राजनीतिक ही नहीं बल्कि वैचारिक और भावनात्मक संघर्ष का रहता आया है। यहां इस बार सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के बीच सीधा और कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान जहां एक ओर विकास, कल्याणकारी योजनाएं और क्षेत्रीय अस्मिता का मुद्दा जोर पकड़ता रहा, वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था और राजनीतिक हिंसा जैसे मुद्दों को भी विपक्ष ने प्रमुखता से उठाया। अधिकांश एग्जिट पोल्स ने पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने और तमिलनाडु में डीएमके गठबन्धन की सरकार दोहराने की बात कही है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार पश्चिम बंगाल में परिणाम इस बात पर निर्भर करेंगे कि ग्रामीण और शहरी मतदाताओं का झुकाव किस ओर रहता हैं। महिला मतदाताओं और अल्पसंख्यक वर्ग की भूमिका भी यहां बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि सत्तारूढ़ दल ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी अपने पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखने में सफल रहा तो उसकी वापसी संभव है, लेकिन यदि विपक्ष ने प्रभावी तरीके से सेंध लगाई है तो परिणाम चौंकाने वाले भी हो सकते हैं। अधिकांश एग्जिट पोल के अनुमान इस बार भाजपा के पक्ष में बताए जा रहे है , लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल की राजनीति में अंतिम क्षण तक कुछ भी कहना जोखिम भरा होता है। इधर दक्षिण भारत में तमिलनाडु की स्थिति भी कम रोचक नहीं है। यहां की राजनीति लंबे समय से द्रविड़ दलों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। इस बार भी मुख्य मुकाबला इन्हीं दलों डीएमके और एआईडीएमके के बीच माना जा रहा है, हालांकि यहां राष्ट्रीय दलों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की पूरी कोशिश की है। तमिलनाडु में चुनावी मुद्दे अपेक्षाकृत अलग रहे, जहां चुनाव प्रचार के दौरान भाषा, संस्कृति, क्षेत्रीय गौरव और सामाजिक न्याय जैसे विषय प्रमुखता से उभरे है। तमिलनाडु में सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इनकम्बेंसी) कितनी प्रभावी रही, यह परिणामों में साफ होगा। यदि मतदाताओं ने बदलाव का मन बनाया है तो सत्ता परिवर्तन संभव है, लेकिन यदि सरकार की योजनाओं और नेतृत्व पर भरोसा कायम रहा तो डीएमके गठबंधन के पुनः सत्ता में वापसी भी हो सकती है। यहां गठबंधन राजनीति भी निर्णायक भूमिका निभाती है, इसलिए छोटे दलों का प्रदर्शन भी परिणामों को प्रभावित कर सकता है। इन दोनों राज्यों में एक समानता यह भी है कि यहां का मतदाता अपेक्षाकृत अधिक जागरूक और राजनीतिक रूप से सक्रिय माना जाता है। इसलिए अंतिम परिणाम केवल चुनावी प्रचार या एग्जिट पोल पर नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत पर निर्भर करेंगे।

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम आने वाले लोकसभा चुनावों के लिए भी एक संकेत देंगे। यदि किसी एक दल या गठबंधन को व्यापक सफलता मिलती है तो उसका मनोबल बढ़ेगा और वह राष्ट्रीय राजनीति में और अधिक आक्रामक रणनीति अपना सकता है। वहीं, कमजोर प्रदर्शन करने वाले दलों के लिए यह आत्ममंथन का समय होगा। कुल मिलाकर, सोमवार की मतगणना केवल सीटों का आंकड़ा तय नहीं करेगी, बल्कि यह भी बताएगी कि देश के विभिन्न हिस्सों में मतदाताओं की सोच किस दिशा में आगे बढ़ रही है। तीन राज्यों असम,केरल और पुडुचेरी में जहां तस्वीर स्पष्ट होने की उम्मीद है, वहीं पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में परिणाम आखिरी क्षण तक रोमांच बनाए रख सकते हैं। यही विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र माने जाने वाले हमारे देश भारत की खूबसूरती भी है, जहां हर चुनाव एक नई कहानी लिखता है और हर मतदाता उस कहानी का महत्वपूर्ण पात्र होता है।


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