कोटा। हाड़ौती की राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो किसी पद या परिचय के मोहताज नहीं होते। ऐसा ही एक नाम है मदन गोपाल झंझोट, जिन्होंने चार दशक से अधिक समय तक भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा और संगठन को मजबूत करने में अपना जीवन समर्पित किया है। संघर्ष, समर्पण और संगठन के प्रति निष्ठा की मिसाल बने झंझोट आज वाल्मीकि समाज और भाजपा के बीच एक मजबूत सेतु के रूप में पहचाने जाते हैं। एक समय था जब वाल्मीकि समाज का राजनीतिक झुकाव पूरी तरह कांग्रेस की ओर माना जाता था, लेकिन बदलते
राजनीतिक परिदृश्य में समाज को भाजपा की विचारधारा से जोड़ने में जिन लोगों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही, उनमें मदन गोपाल झंझोट अग्रणी रहे। उन्होंने वर्षों तक समाज के बीच रहकर संगठन की नीतियों को पहुंचाया और विश्वास का ऐसा वातावरण बनाया कि आज बड़ी संख्या में समाज भाजपा के साथ खड़ा दिखाई देता है।
मदन गोपाल झंझोट ने वर्ष 1982 में भाजपा के सक्रिय सदस्य के रूप में राजनीतिक यात्रा शुरू की। उस दौर में भाजपा सत्ता से दूर संघर्षरत पार्टी थी, लेकिन झंझोट ने कठिन परिस्थितियों में भी संगठन का साथ नहीं छोड़ा। वर्ष 1985 में केशोरायपाटन शुगर मिल को पुनः प्रारंभ कराने की मांग को लेकर हुए भाजपा आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें गिरफ्तार कर भरतपुर की सेवर जेल भेजा गया, जहां उन्होंने लगभग 20 दिन तक राजनीतिक बंदी के रूप में समय बिताया।
इसके बाद तत्कालीन भाजपा विधायक मांगीलाल मेघवाल की रिहाई की मांग को लेकर चले आंदोलन में भी उन्होंने अग्रिम पंक्ति में रहकर संघर्ष किया। इस आंदोलन में भी उन्हें गिरफ्तार कर पुनः सेवर जेल भेजा गया, जहां करीब 25 दिन तक जेल में रहकर उन्होंने संगठन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित की।
संगठनात्मक जिम्मेदारियों की बात करें तो झंझोट कोटा शहर भाजपा में कई वर्षों तक जिला उपाध्यक्ष रहे। भाजपा युवा मोर्चा की प्रदेश कार्यकारिणी में सदस्य के रूप में उन्होंने युवाओं के बीच संगठन को मजबूत किया। वहीं भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा में प्रदेश मंत्री के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जनसेवा के क्षेत्र में भी उनकी सक्रियता उल्लेखनीय रही। वर्ष 1994 में वे नगर निगम चुनाव जीतकर पार्षद बने और बाद में वरिष्ठ पार्षद के रूप में भी दायित्व निभाया। सामाजिक और धार्मिक संगठनों में भी उन्होंने विभिन्न पदों पर रहकर समाजहित में कार्य किए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्षों तक संगठन के लिए निस्वार्थ भाव से काम करने वाले ऐसे कर्मठ और जुझारू कार्यकर्ता को अब बड़ा दायित्व मिलने का समय आ गया है। विशेष रूप से सफाई कर्मचारी आयोग जैसे महत्वपूर्ण संस्थान के लिए यदि राजस्थान के वरिष्ठ और अनुभवी वाल्मीकि समाज के नेताओं की बात की जाए तो मदन गोपाल झंझोट का नाम प्रमुखता से सामने आता है।
संघर्ष की आग में तपकर निकले मदन गोपाल झंझोट की राजनीतिक यात्रा इस बात का प्रमाण है कि समर्पण, धैर्य और संगठन के प्रति निष्ठा अंततः अपनी पहचान स्वयं बना लेती है। शायद इसी लिए उनके जीवन पर यह पंक्ति सटीक बैठती है— "एक अकेला चलता रहा और कारवां बनता गया।"
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संघर्ष से शिखर तक: वाल्मीकि समाज की आवाज बने मदन गोपाल झंझोट
के. डी. अब्बासी
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