यह समय पाठकों से बेईमानी का नहीं है, वर्तमान समय का पाठक बड़ा सावचेत है। गीत अपने समय की आंतरिक हलचल और लयात्मकता का अनुवाद है। जितेन्द्र निर्मोही इस समय के बड़े गीतकार हैं।वो अपने गीतों को अहसासों की खेती के साथ प्रस्तुत करते हैं। मैं भी उन गीतों का प्रशंसक हूं जो ईमानदारी से लिखे जाएं,यह विचार गाजियाबाद के जाने-माने व्यंग्यकार और समालोचक सुभाष चंदर ने कोटा में विश्व कविता दिवस पर आयोजित जितेन्द्र निर्मोही की कृति " मेरे गीत और नवगीत" का लोकार्पण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए।
सार्वजनिक मंडल पुस्तकालय कोटा के सभागार में शनिवार को आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए नई दिली से आए
रामकिशोर उपाध्याय ने कहा लेखक बच्चन की परिवर्तित श्रृंखला के बड़े गीतकार हैं वह इस संकलन में गीत की रचना प्रक्रिया भी बताते हैं " कैसे कोई गीत बना" उन्होंने कहा कि ये अपने गीतों में देशज शब्दों का प्रयोग भी करते हैं " पनिया वाली शाम सुहानी आई है, धनिया रानी लौट आओ ना घर को" गीत इस बात की मिसाल है। समारोह एक तरह गीत की कार्यशाला हो गया है कोटा महानगर में गीत पर बात होना देशभर में संदेश जाना है।
बीज वक्तव्य में समालोचक और कथाकार विजय जोशी ने कहा कि गीत का निकष नौ वी या दसवीं शताब्दी से होकर यहां तक की यात्रा है। सामवेद और गीता भी उपनिषद परंपरा में महत्वपूर्ण गीत लिखने की प्रक्रिया को बताते हैं। गीत शब्दों की लयात्मकता के साथ गाया जाता है तो अपना प्रभाव छोड़ता है यही गीत की ताकत है। भक्ति काल देश की विशिष्ट गीत परंपरा का उदाहरण है। गीत मनुष्य के भीतर की आग है जो समय आने पर सामने आती है। विशिष्ट अतिथि डॉ. कपिल गौतम ने कहा मैंने बड़ी गंभीरता से कृति " मेरे गीत और नवगीत" पढ़ी है। जितेन्द्र निर्मोही लोक शास्त्र में डूबकर अपने गीतों का अवगाहन करते हैं।उनके गीतों में वृद्ध है " बहुत तपे पेड़ आंगन के" तो बेटी की बात भी करते हैं जितेन्द्र निर्मोही बहुआयामी गीतकार हैं। मुख्य वक्ता डॉ. विवेक मिश्र ने कृति पर बोलते हुए कहा कि यह कृति लेखकीय अनुष्ठान का प्रतिफल है । सबसे बड़ी बात उनके गीतों की यह है कि वो हिंदी गीतों में उर्दू अदब की गंगा जमनी तहजीब भी बहाते हैं और देशज हाड़ौती शब्दों को मोतियों की तरह गूंथ देते हैं। गीत साहित्य की कठीन तपस्या का नाम है और उसका प्रतिफल है यह कृति " मेरे गीत और नवगीत" जिसका देश में व्यापक स्वागत होगा।
स्वागत उद्बोधन में पुस्तकालय अधीक्षक डॉ. दीपक श्रीवास्तव ने कहा कि विश्व कविता दिवस पर कोटा से विश्व भर में संदेश जाएगा। जब गीत पर कहीं कोई बात नहीं होती अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाले गीतकार जितेन्द्र निर्मोही के गीतों पर वर्तमान गीत परंपरा के साथ साथ बात होना अभिनंदन योग्य है।
गीतकार जितेन्द्र निर्मोही अपने मुक्तक, गीतों के मुखड़े सुनाते हुए अपने अग्रज कवियों बाल कवि बैरागी, चंद्र सेन विराट,नमोनाथ अवस्थी, कुंवर बैचेन, अजहर हाशमी को याद करते हुए उनसे जुड़े संस्मरण सुनाए। उन्होंने कहा मेरे गीत मुझे मौत के सामने मुस्कराते हुए रहने के लिए कहते हैं।
शहर की विभिन्न संस्थाओं द्वारा अतिथियों और जितेंद्र निर्मोही सहित बाहर से आए अतिथियों का भावभीना सम्मान किया गया। वंदना आचार्य द्वारा जितेन्द्र निर्मोही का गीत " सांझ पागल तो नहीं, तुम हो गई हो" और" जिंदगी का गीत भी गाती रहो तुम प्रस्तुत किया। सरस्वती वंदना डॉ. शशि जैन एवं श्यामा शर्मा ने प्रस्तुत की । विदाई गीत की प्रस्तुति इंजीनियरिंग कॉलेज की छात्रा अनंदिता शर्मा ने प्रस्तुत किया। संचालन नहुष व्यास ने किया और हर्ष मित्र शर्मा ने धन्यवाद दिया।
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* यह समय पाठकों से बेईमानी का नहीं --- सुभाष चंदर ..
जितेंद्र निर्मोही की कृति का लोकार्पण
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