पुस्तकों की समीक्षा के संग्रह की कृति का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण कार्य हैं। इस से समीक्षाएं एक स्थान पर संकलित हो कर शोध का विषय बन जाती हैं। यह संकलन पाठकों और साहित्यकारों को भाषा शैली, प्रस्तुतिकरण,विभिन्न विधाओं, और साहित्यकारों के कार्य का मूल्यांकन समझने का अवसर प्रदान करता है। साथ ही लेखकों के साहित्यिक ज्ञान में वृद्धि कर उन्हें एक दिशा भी प्रदान करता है। जब यह संकलन विदुषी साहित्यकार अक्षयलता शर्मा का हो तो पाठक उनकी अंतरात्मा के साथ लिखी गई विस्तृत समीक्षा का लोहा मानने लगता है। समीक्षा लेखन की एक नई दिशा और दृष्टि पाठकों को प्रेरित करती हैं। उनकी अपनी अलग ही लेखन शैली है। सहज, सरल और पाठक के दिल में सीधे उतर जाती है।
जयपुर में निवास करने वाली हाड़ौती की विदुषी साहित्यकार श्रीमती अक्षयलता शर्मा की नई कृति , " आखर के समीक्षा स्वर समीक्षात्मक आलेख संग्रह ) कुछ दिन पूर्व प्राप्त हुई। इस कृति में लेखिका द्वारा की गई 8 पुस्तकों की समीक्षाओं को सम्मिलित किया गया है। समीक्षा कृतियों में क्रमशः अन्तर्दृष्टि के आलोक में राजस्थानी बाल साहित्य कृति, "राजस्थानी बाल साहित्य अर दीठ", मुँह बोलता अनुभव और राजस्थानी कथा-साहित्य का तराजू है, "राजस्थानी कहानियाँ: एक विवेचना", लेखिकाओं की संवेदनाओं का मार्मिक दस्तावेज “नारी चेतना की साहित्यिक उड़ान", उजालों का साहित्यिक उजास है, "राजस्थान के साहित्य साधक", संवेदना की पृष्ठभूमि पर महकता यादों का स्तबक है; संस्मरण कृति, “ नई बात निकलकर आती है", नई पौध के अभिषिंचन के विविध आयामों का उत्प्रेरक दर्पण है, "बाल मन तक...", श्रृंगार का समंदर है, पुस्तक “श्रृंगार एक स्वाभाविक वृत्ति", ग्राम्यस्मृतियों के झरोखों से झांकते जन-जीवन और बचपन का दर्पण है: “माँ का गाँव और बचपन शामिल हैं। ये समीक्षा कृतियाँ हाड़ोती के लेखकों जितेंद्र निर्मोही, डॉ. प्रभात कुमार सिंघल, श्रीमती श्वेता शर्मा और श्रीमती शिखा अग्रवाल भीलवाड़ा की हैं।
पुस्तक के अंतिम आवरण पृष्ठ पर प्रकाशक टिप्पणी महत्वपूर्ण है ," यह पुस्तक केवल कुछ कृतियों की समीक्षा भर नहीं, बल्कि साहित्य के विविध संसार में एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक यात्रा है। इसमें चयनित हिन्दी कृतियों का सारगर्भित विश्लेषण पाठकों को उनके कथ्य, शिल्प, भाषा और वैचारिक पक्ष से परिचित कराता है। प्रत्येक समीक्षा पुस्तक के मूल भाव को समझने और उसके साहित्यिक महत्त्व को पहचानने का प्रयास करती है। अक्षयलता शर्मा ने निष्पक्ष दृष्टि और गहरी पाठकीय संवेदना के साथ कृतियों का मूल्यांकन किया है। यह पुस्तक साहित्य-प्रेमियों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और गंभीर पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी है।"
अपनी बात में लेखिका लिखती हैं, "
साहित्य समाज की जरूरत है। समाज गतिशील वक्त के साथ बदलता रहता है। बदलाव अच्छी व बुरी दिशा में होते हैं। उसे पतन के गर्त से बचाने में सत्साहित्य मददगार होता है। साहित्य सप्रेरणा जगाकर उचित भावनाओं को विकसित करता है जैसे-देशप्रेम, उदारता, दया, परोपकार आदि। लेकिन यह तभी संभव है जब साहित्य में इतना सामर्थ्य हो। साहित्य के मर्मज्ञ साहित्यपुरोधा साहित्य की गुणवत्ता की जाँच परख करते रहें और कलमकारों को वक्त की जरूरत के अनुसार निर्देशित करते रहें तभी संभव है कि साहित्य समाज की जरूरत पूरी कर पाएगा। इसी उद्देश्य से साहित्य की समीक्षा की जाती है। समीक्षा सत्साहित्य के प्रति पाठकों को आकर्षित भी करती है। आज साहित्य पठन की प्रवृत्ति समाप्त होती जा रही है। अच्छी समीक्षाएँ इसे पुनर्जीवित कर सकती हैं।" पुनः
"" नारी चेतना की साहित्यिक उड़ान" की समीक्षा करने पर जो प्रोत्साहन मिला इसके फलस्वरूप आज कथेतर साहित्य की कृति 'आखर समीक्षा के स्वर' सामाजिकों को के लिए प्रस्तुत करते हुए मैं हर्ष का अनुभव कर रही हूँ।" आवरण पृष्ठ साधारण परन्तु आकर्षक है।
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आखर के समीक्षा स्वर लेखन के मूल्यांकन का मौका प्रदान करती कृति
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