रात और दिन मिलने वाले दो मित्रों की मुलाकात जब एक लंबे समय बाद हो, तो उनकी खुशी की चमक उनके चेहरों से झलकती है। कुछ ऐसा संयोग रहा कि एक ही शहर में रहते हुए हम लंबे समय तक मिल नहीं पाएं।

सोमवार 24 अगस्त को गुलाब के फूलों की एक सुगंधित माला के साथ मैं अपने परम मित्र डॉ. दीपक कुमार श्रीवास्तव से मिलने उनके कार्यालय मंडल पुस्तकालय पहुंच गया।

मिलने की खास वजह भी थी कि उनकी पदोन्नति के साथ उन्हें यहीं पदस्थापित कर दिया गया था। मुबारकबाद देना तो बनता ही था।

पुस्तकालय के बाहर का दृश्य बदला - बदला लगा। सामने सीसी रोड बन चुकी थी। सड़क के अंत में अच्छा सा व्यवस्थित वाहन स्टैंड। जिसमें करीने से पाठकों के वाहन खड़े थे। भवन का मुख्य द्वार, पुस्तकालय का नाम पट्ट और अग्रभाग खूबसूरत बन गया था। परिसर एक दम साफ सुथरा चमक रहा था। देख कर आश्चर्य हुआ क्या यह वही पुस्तकालय का अग्र भाग है जो करीब दो वर्ष पूर्ण बेतरतीब सा हुआ करता था।

भवन में प्रवेश कर श्रीवास्तव जी के चैंबर में प्रवेश किया। वे केडीए के कुछ अधिकारियों के साथ भवन निर्माण पर चर्चा कर रहे थे। मुझे आया देख वे कुर्सी से उठे मिलने की खुशी जाहिर करते हुए गले लगा लिया। मैने उन्हें पुष्पहार पहना कर गर्म जोशी से पदोन्नति की ढेर सारी शुभकामनाएं और बधाई देते हुए भावी सफलताओं के लिए कामना की। उन्होंने अधिकारियों से मेरा परिचय करवाया और मुझे बोले बस पांच मिनट में फ्री होता हूं।

मैं वहीं बैठ गया और उनके चेंबर को निहारने लगा जिसमें लगे दीवार भरे सम्मान पत्र उनकी सफल यात्रा की कहानी सुना रहे थे।

अधिकारियों के जाने के बाद उनसे ठिठोली करते हुए कहा सर भवन के जीर्णोद्धार में आपके लिए एक बड़े चैंबर का भी निर्माण करवाले , अब यह छोटा पड़ गया है, दीवारें भर गई, भविष्य में प्राप्त होने वाले सम्मान पत्रों के लिए जगह नहीं रही।

उन्होंने जोरदार ठहाका लगाया । पुस्तकालय भवन के जीर्णोद्धार और नए आ गए स्टाफ के बारे में उन्होंने जानकारी दी और उनसे मुलाकात भी करवाई।

अब दोनों मित्रों अरसे बाद मिले तो खुल कर खूब बाते हुई। मन की बातें जुबान पर थी। दोनों के चेहरों पर मिलने की खुशी नाच रही थी। भावनाएं उमड़ रही थी। दोनों कुछ न कुछ कहने को आतुर थे। करीब एक घंटे तक बतियाते रहें, साहित्यिक चर्चा भी हुई। कहने लगे आप साहित्य के क्षेत्र में जो काम कर रहे है वह द्वितीय है। राजस्थान का रचनाकार परिचय कोश बड़ा और महत्वपूर्ण काम है। चाय की चुस्कियों का आनंद भी लेते रहे।

बातों का सिलसिला जारी था कि आदरणीय जितेंद्र निर्मोही जी के आने से सोने में सुहागा हो गया। पहले उन्होंने दीपक जी को माला पहना कर पदोन्नति की बधाई दी।

कुछ देर इधर - उधर की चर्चा हुई फिर निर्मोही जी ने पूछ लिया राजस्थान रचनाकार परिचय कोश कब तक आ रहा है ? जवाब दिया बस कुछ दिन और प्रूफ और करेक्शन हो गए हैं , एक बार फाइनल प्रूफ और होगा।

आगामी माह में प्रकाशित हो जाएगा। आगे पूछा दीपक जी को लिया या नहीं ?

सर इनके बिना तो परिचय कोश कैसे लिखा जाता, इन्होंने तो कोटा में साहित्यिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने और साहित्यकारों को बढ़ावा देने में महत्ती भूमिका निभाई है।

इनका कार्यकाल इस दृष्टि से हमेशा याद किया जाएगा। बोले यह अच्छा किया आपने, ये अनूठी शख्शियत के धनी है।

कुछ ही समय में पत्रकार प्रवीण जैन भी आ गए। अब क्या था कई मुद्दों पर लंबी चर्चा चलती रही। एक बार फिर चाय का दौर चला। प्रवीण जैन का रिसर्च स्कॉलर के रूप में शेष रहे सम्मान को हमें करने का अवसर दीपक जी ने प्रदान किया। पहली मंजिल पर बने सभागार में पहुंच कर खुशी से प्रवीण जी को सम्मानित किया और शुभकामनाएं दी।

निर्मोही जी से अक्सर मिला रहता हूं पर अरसे बाद मिले तीन दोस्तों की यह दो घंटे की अविस्मरणीय मुलाकात जीवन का एक स्वर्णिम अध्याय बन गया। फिर जल्द मिलेंगे कह कर उनसे विदा ली।

मैं और निर्मोही जी उनके कक्ष से बाहर आए, वे हमें बाहर तक विदा करने आए। कुछ देर मैं और निर्मोही जी आपस में बातें करते रहे।

वे बोले बिना किसी अग्रिम प्रयोजन के अचानक अच्छी मुलाकात रही। मैंने भी कहा जी इसमें कोई शक नहीं।

अब हम अपने - अपने रास्ते चल पड़े....... डॉ. प्रभात कुमार सिंघल