साहित्य जगत में कोटा के साहित्यकार श्री विजय जोशी कहानी और आलोचना विधा के क्षेत्र में देश में अपनी विशिष्ठ पहचान रखते हैं। पारिवारिक और सामाजिक जीवन के अनेक पहलुओं से जुड़ी संदेश प्रदान इनकी कहानियों और उपन्यास ने इनकी अलग छवि बनाई है।

कथेतर साहित्य में इनकी समीक्षा आलेख आलोचना, डायरी एवं रिपोर्ट-रिपोर्ताज विधाओं पर अब तक समीक्षा के पथ पर, अपने समय की बानगी निकष पर, अनुभूति के पथ पर जीवन की बातें तथा कहानीकार प्रहलाद सिंह राठौड़ : कथ्य एवं शिल्प पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ।

इसी श्रृंखला में हाल ही में नवीनतम छठी पुस्तक रोचक शीर्षक से "अभिव्यक्ति के आंगन में रस रंग और ताल " प्रकाशित हुई है।

एक बार तो पुस्तक के शीर्षक ने चौंकाया, लेखक ने गीतों और नृत्यों की रस रंग और ताल जुगलबंदी पर किताब लिखी है शायद।

परन्तु जब कुछ पृष्ठ पलट कर देखे तो महसूस हुआ यह उन अभिव्यक्तियों की जुगलबंदी है जो लेखक ने 1986 से 2025 तक कला, संस्कृति और साहित्य के चित्रकला प्रदर्शनियों, साहित्यिक कार्यक्रम, गीत संगीत समारोह, पुस्तक लोकार्पण, बाल साहित्य मेले, कहानी प्रतियोगिताएं आदि समारोहों और कार्यक्रमों पर रिपोर्टों में अपनी वैचारिक अभिव्यक्ति को मुखर किया है।

इस लंबी अवधि में लिखी गई अपनी 65 प्रमुख रिपोर्ट और रिपोर्ताज को पुस्तक में शामिल किया गया है।

यह यात्रा 16 मार्च 1986 को लिखी गई रिपोर्ट "अटरू के इतिहास पर संगोष्ठी " से शुरू हो कर 22 सितंबर 2025 को लिखी गई रिपोर्ट " कहानी... प्रतियोगिता...स्वास्थ्य एवं सृजन तक का सफर तय करती है।

पुस्तक इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि पाठक को कार्यक्रमों का रचनात्मक परिवेश को जानने और समझने का एक अच्छा अवसर मिलता है। साथ ही किसी भी कार्यक्रम की रिपोर्ट को लिखने का कौशल भी सीखने का अवसर प्राप्त होता है।

किसी विषय को कैसे उठाना है, प्रस्तुतिकरण, भाषा शैली का उपयोग, दृश्य का सटीक वर्णन, विशिष्ठ व्यक्तियों के उद्बोधन को अपने शब्दों में बांधने की कला , और आकर्षण पैदा करना किसी भी रिपोर्ट और रिपोर्ताज के अहम पहलू हैं।

इसके लिए लिखने वाले का विशद शब्द ज्ञान एवं संबंधित विषय की जानकारी होना भी आवश्यक है।

लेखक इन समस्त विशेषताओं की कसौटी पर खरा उतरता है और बुद्धि कौशल साफ झलकता है। लेखन शैली रिपोर्ट के आखिर तक पाठक को बांधे रखती है और ऐसा दृश्य उसके सामने उपस्थित करती है कि वह अपने आपको रिपोर्ट के साथ समाहित महसूस करता है और साथ - साथ यात्रातीत होने लगता है। यही लेखन की सफलता है।

रिपोर्ट और रिपोर्ताज के कुछ शीर्षक कोटा : बालोत्सव चित्र प्रदर्शनी, माथोड़िया के चित्रों की एकल प्रदर्शनी, डाक टिकटों में पर्यावरण की झलक, बाल वैज्ञानिक प्रतिभाएँ विज्ञान मेले में, आयुर्वेद विज्ञान प्रदर्शनी, कोटपुतली : बसंती काव्य संध्या, 25 वाँ जिला स्तरीय विज्ञान मेला पर्यावरण प्रदूषण एवं यातायात समस्या को उजागर करते मॉडल, काव्य कानन का विमोचन, जिला स्तरीय निर्देशन समारोह एवं प्रदर्शनी : एक दृष्टि, राहुल सांकृत्यायन स्मृति-समारोह, कोटा : सुर सांगीतिक का नृत्य-गीतोत्सव, कोटा : राजस्थानी साहित्य पुरस्कार समारोह, रंगायतन की प्रस्तुति-अंधेर नगरी चौपट राजा, ग्राम्य संस्कृति से साक्षात्कार कराते चित्र, राजस्थान लेखिका सम्मेलन 1996, काव्य-संध्या : एक बानगी "कैसे इन्सानियत को पहचानें, एक चेहरे पे कितने चहरे हैं।" नृत्य-गीतोत्सव समारोह-1996, नयन पथ की निर्झरा का लोकार्पण, अखिल भारतीय बाल साहित्य लेखक सम्मेलन : एक बानगी, हरिवंशपुराण परिशीलन पर संगोष्ठी, पारम्परिक कलाओं का संजोग हस्तशिल्प एवं कला मेला, साहित्य समाज की चेतना का मूल स्वर, बदलते समय की साक्षी हैं राजस्थानी कहानियाँ , लोक से परमार्थ की यात्रा सृजन और संवाद, पुरातत्वविद् रमेश वारिद का लेखन समय का साक्षी है ,साहित्य और पर्यटन : एक विमर्श, संस्कृति, साहित्य और अपने परिवेश से जुड़ाव का अभिनव प्रयोग : बाल साहित्य मेला, बाल कवि सम्मेलन : एक बानगी, सिग्नेचर बुक कलेक्शन प्रदर्शनी आदि।

विविध आयोजनों की ये रिपोर्ट्स पाठक को कला, साहित्य, संस्कृति के साथ - साथ पर्यावरण, विज्ञान, नियोजन, पर्यटन, शिल्प, इतिहास, पुरातत्व, पुस्तकों, स्मृतियों के साथ - साथ जीवन के अनेक पहलुओं से जोड़ कर चेतना जागृति में भी उत्प्रेरक का काम करती हैं।

इस दृष्टि ले लेखन की सार्थकता स्वयं सिद्ध होती है। यह पुस्तक साहित्यकारों के साथ - साथ पत्रकारों के लिए भी किसी पथ प्रदर्शक से कम नहीं हैं।

कुछ नया लिखना सीखने वाले पत्रकार के लिए अत्यंत उपयोगी पुस्तक है। इसी पुस्तकें पत्रकारिता और जन संचार पाठ्यक्रमों में आवश्यक रूप से शामिल की जानी चाहिए।

अपनी बात आंगन के संस्कार में लेखक विजय जोशी लिखते हैं, " अपने रचनात्मक परिवेश से विचारों की समृद्धता और कौशल विकास का एक मार्ग प्रशस्त होता है। इस मार्ग का प्रथम पड़ाव पारिवारिक संस्कार का है। इन संस्कारों की आभा में ही व्यक्ति अपने भीतर के कौशल को अभिव्यक्ति के सोपानों तक ले जाता है और दिशाबोध प्राप्त होने पर वह अपनी सृजनात्मकता से अनुभूत सन्दर्भों को मूर्त रूप देता हुआ उन्हें साकार करता है।

इन्हीं सन्दर्भों को आत्मसात् करते हुए मैंने अपने कला, साहित्य एवं सांस्कृतिक के विविध पक्षों को वैचारिक धरातल पर अभिव्यक्त करने का प्रयास किया।

अभिव्यक्ति के आँगन में रस, रंग और ताल इन्हीं सन्दर्भों की बानगी है जिसमें कला साहित्य एवं संस्कृति के विविध प्रसंग अभिव्यक्ति के सोपान पर एक संवाद स्थापित कर समय विशेष के दृश्य एवं भावों से साक्षात्कार कराते हैं।

इस साक्षात्कार के समय रंग भावों में घुलते हैं, रेखाएँ मन को छूती हैं, रस हृदय में समा जाता है और ताल मन को झंकृत कर देती है।

फिर चाहे चित्र वीथिका हो अथवा साहित्यिक आयोजन का सभागार या फिर संगीत की स्वर लहरियाँ बिखेरता मंच हो अथवा काव्य गोष्ठी का स्थल... शब्दों का रस, चित्र की संवेदना और संगीत की ध्वनि मन को रस, रंग और ताल की जुगलबंदी से भाव विभोर कर देती है तथा समूचा परिवेश अभिव्यक्ति के आँगन में शब्द बद्ध होकर थिरकने लगता है।"

पुस्तक के फ्लैप पर प्रकाशक हिमांशु वर्मा लिखते हैं," रिपोर्ट-रिपोर्ताज विधा की इस पुस्तक में में कला, साहित्य एवं संस्कृति से सन्दर्भित गतिविधियों की सार्थक अभिव्यक्ति हुई है, जो रचनात्मक परिवेश को जानने और समझने का अवसर प्रदान करती है।"

आवरण पृष्ठ का चित्र पुस्तक का प्रमुख आकर्षण है जिसे राजस्थान के चित्रकार एवं कला-समीक्षक चेतन औदिच्य ने भावपूर्ण चित्रांकन कर आवरण को शीर्षक के अनुरूप उभारकर कला और साहित्य के अन्तर्सम्बन्धों को उजागर किया है।