कोटा। कोटा के पत्रकारों के लिए प्रस्तावित आवासीय योजना ढाई साल बाद भी फाइलों में अटकी हुई है। योजना के तहत करीब 125 पत्रकार निर्धारित राशि जमा कर आवेदन कर चुके हैं, लेकिन लंबा समय गुजरने के बावजूद न भूखंडों की लॉटरी निकली और न ही जमा राशि वापस की गई। ऐसे में पत्रकारों के सब्र का बांध अब टूटने लगा है।
पत्रकारों का कहना है कि योजना को लेकर वे लगातार जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष अपनी मांग रख चुके हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, स्वायत्त शासन मंत्री सहित जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों तक भी मामला पहुंचाया गया, लेकिन ढाई साल बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।
आखिर किस दबाव में अटकी है फाइल? पत्रकारों का सवाल है कि कोटा विकास प्राधिकरण (केडीए) में शहर की विभिन्न योजनाओं और विकास कार्यों से जुड़ी फाइलों पर काम हो रहा है, तो पत्रकार आवासीय योजना की फाइल आखिर किस कारण से अटकी है? इसकी स्पष्ट जानकारी आज तक पत्रकारों को क्यों नहीं दी गई?
पत्रकारों का कहना है कि यदि योजना में कोई कानूनी, तकनीकी या प्रशासनिक अड़चन है तो उसे सार्वजनिक किया जाए। यदि भूखंड देना संभव नहीं है तो इसकी स्पष्ट घोषणा कर आवेदकों की जमा राशि तत्काल ब्याज सहित वापस की जाए।
दूसरे वर्गों को भूखंड तो पत्रकारों को इंतजार क्यों?
पत्रकारों का कहना है कि जब विभिन्न संस्थाओं और वर्गों के लिए आवासीय भूखंड उपलब्ध कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है, तो पत्रकारों की योजना वर्षों से लंबित क्यों है? पत्रकार समाज और प्रशासन के बीच सेतु का काम करते हैं और शहर की समस्याओं को लगातार सामने लाते हैं। ऐसे में अपने ही आवास के लिए जमा राशि वापस पाने के लिए उन्हें वर्षों इंतजार करना पड़े, यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
अब आश्वासन नहीं, चाहिए साफ जवाब कोटा में विकास की बड़ी-बड़ी योजनाओं और उपलब्धियों के बीच पत्रकार आवासीय योजना का ढाई साल तक लंबित रहना कई सवाल खड़े कर रहा है। पत्रकार अब जानना चाहते हैं कि फाइल किस स्तर पर अटकी है, लॉटरी कब निकलेगी और भूखंड कब मिलेंगे?
इस मामले को लेकर शहर के पत्रकार संगठनों में भी अलग-अलग राय सामने आ रही है। कई पत्रकार संगठन अब मानने लगे हैं कि पत्रकारों को आवासीय भूखंड मिलना मुश्किल है, जबकि एक संगठन को अभी भी उम्मीद है कि योजना सिरे चढ़ेगी और पत्रकारों को भूखंड मिलेंगे।
ओम बिरला से भी पत्रकारों को निराशा लंबे समय से चल रही इस कवायद के बावजूद समाधान नहीं निकलने से अब पत्रकारों में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से भी निराशा दिखाई देने लगी है। पत्रकारों का कहना है कि बार-बार आश्वासन के बजाय अब इस मामले में ठोस निर्णय होना चाहिए।
पत्रकारों की मांग साफ है—भूखंड देने हैं तो समयसीमा तय कर तत्काल लॉटरी निकाली जाए और यदि योजना आगे नहीं बढ़ सकती तो 125 पत्रकारों की जमा राशि बिना किसी और देरी के वापस की जाए। अब सवाल सिर्फ भूखंड का नहीं, बल्कि उन पत्रकारों की मेहनत की कमाई और उनके भरोसे का भी है।