गोपेन्द्र नाथ भट्ट राजस्थान को केवल दुर्गों, हवेलियों और लोकदेवताओं की धरती ही नहीं, बल्कि प्रथम आराध्य देव गणपति सहित विभिन्न देवी- देवताओं तथा विभिन्न धर्मो के आराध्यों की आराधना की अत्यंत समृद्ध परंपरा वाली भूमि भी ह।
राजस्थान में प्रथम पूज्य गणेशजी के अनेक प्राचीन मंदिर अपनी अलग-अलग लोकमान्यताओं, स्वरूपों और परंपराओं के कारण प्रसिद्ध हैं। इनमें कुछ मंदिरों में नए कार्य के शुभारंभ, कुछ में विवाह, तो कुछ में मनोकामना और विघ्न-बाधा दूर होने की आस्था जुड़ी है।
राजस्थान की संस्कृति में भगवान गणेश केवल प्रथम पूज्य देवता नहीं, बल्कि शुभारंभ, सफलता और विघ्न-विनाश के लोकदेव के रूप में गहरी आस्था के केंद्र हैं।
जयपुर का मोती डूंगरी गणेश मंदिर, गढ़ गणेश और सवाई माधोपुर का त्रिनेत्र गणेश मंदिर इस आस्था के सबसे प्रमुख प्रतीक हैं।
राजस्थान पर्यटन विभाग भी मोती डूंगरी को जयपुर का अत्यंत महत्वपूर्ण गणेश तीर्थ और किसी भी शुभ कार्य से पहले आशीर्वाद लेने का प्रमुख स्थल बताता है।
रणथंभौर के त्रिनेत्र गणेश की मान्यता तो अद्भुत है। देशभर से लोग विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों के निमंत्रण भगवान गणेश के नाम डाक से भेजते हैं।
मंदिर में प्रतिदिन ऐसी चिट्ठियां पहुंचती हैं। यह परंपरा गणेशजी को परिवार और सामाजिक जीवन के हर शुभ अवसर का प्रथम आमंत्रित अतिथि बना देती है।
राजनीतिक जीवन भी इस आस्था से अछूता नहीं है। राजस्थान के वर्तमान नगर निकाय चुनावों में चुनाव मैदान में उतरे प्रत्याशियों ने भी अपने अभियान और मतदान से पहले गणेशजी के दर्शन कर विजय एवं निर्विघ्न चुनाव की कामना की।
यह दृश्य बताता है कि आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीति और सदियों पुरानी धार्मिक-लोक आस्था के बीच राजस्थान में आज भी एक जीवंत संबंध कायम है।गणेश चतुर्थी के ठीक पहले आने वाली हरतालिका तीज इस सांस्कृतिक परंपरा को एक और आयाम देती है।
सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना से कठोर व्रत रखती हैं। यद्यपि आधुनिक समय में करवा चौथ को अपेक्षाकृत अधिक प्रचार मिला है, लेकिन हरतालिका तीज की परंपरा प्राचीन धार्मिक-सांस्कृतिक स्मृति से जुड़ी हुई है।
राजस्थान पर्यटन तीज को महिलाओं द्वारा पति के कल्याण और चिरायु की कामना से जुड़ा पर्व बताता है।
इस प्रकार राजस्थान में हरतालिका तीज से गणेश चतुर्थी तक का यह क्रम केवल दो पर्वों का संयोग नहीं, बल्कि नारी की तपस्या, परिवार की मंगलकामना और गणेशजी की विघ्नहर्ता शक्ति में लोकविश्वास का सुंदर सांस्कृतिक आख्यान है।
राजस्थान में राजनीति बदल सकती है, चुनाव बदल सकते हैं, समय बदल सकता है लेकिन किसी भी नए सफर से पहले ‘श्री गणेश’ करने की परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है।
राजस्थान के प्रमुख गणेश मंदिर और उनकी मान्यताएँ बहुत प्रसिद्ध हैं । इनमें जयपुर का मोती डूंगरी गणेशजी सबसे प्रसिद्ध गणेश मंदिर माना जाता है।
राजस्थान पर्यटन के अनुसार मंदिर का निर्माण सेठ जय राम पालीवाल ने कराया था और इससे जुड़ी लोककथा में मेवाड़ से लाई गई गणेश प्रतिमा के बैलगाड़ी से मोती डूंगरी के नीचे रुक जाने की बात कही जाती है।
मान्यता: है कि किसी भी नए कार्य, व्यवसाय, विवाह अथवा वाहन आदि के शुभारंभ से पहले गणेशजी के दर्शन करना मंगलकारी माना जाता है। गणेश चतुर्थी पर विशेष श्रद्धा रहती है।
आजकल गणेश चतुर्थी पर यहाँ की मेहंदी को विवाह-सौभाग्य से जोड़ने की लोकप्रिय मान्यता भी विशेष चर्चा में है।
जयपुर का गढ़ गणेशजी अरावली की पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय से जुड़ा माना जाता है। यहाँ गणेशजी का बाल रूप पूजित है और प्रतिमा का स्वरूप अन्य गणेश मंदिरों से अलग माना जाता है। मान्यता: है की गणेश चतुर्थी और बुधवार को दर्शन से विशेष मनोकामना पूर्ति तथा विघ्नों के निवारण की आस्था है।
इसी प्रकार सवाई माधोपुर में रणथंभौर दुर्ग में स्थित त्रिनेत्र गणेशजी,राजस्थान के सर्वाधिक प्रसिद्ध प्राचीन गणेश मंदिरों में से एक है। राजस्थान पर्यटन भी इसे प्रमुख धार्मिक आकर्षण बताता है। यहाँ गणेशजी तीन नेत्रों वाले त्रिनेत्र स्वरूप में विराजमान हैं। एक विशेष परंपरा के अनुसार अनेक परिवार विवाह का पहला निमंत्रण भगवान गणेशजी को भेजते हैं। यही इस मंदिर की सबसे अनूठी लोकपरंपराओं में से एक है।
इसके अलावा बांसवाड़ा के तलवाड़ा में सिद्धिविनायक आमलिया दादा का यह मंदिर दक्षिण राजस्थान में विशेष श्रद्धा का केंद्र है। यहाँ गणेशजी की खड़ी प्रतिमा प्रसिद्ध है।
स्थानीय मान्यता है कि दर्शन मात्र से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
डूंगरपुर का मुला गणेशजी मंदिर भी अद्भुत है झीलों की नगरी उदयपुर का बोहरा गणेशजी मंदिर लगभग 350 वर्ष पुराना माना जाने वाला यह मंदिर उदयपुर की प्रमुख गणेश आराधना स्थली है।
यहाँ गणेशजी की नृत्य मुद्रा वाली प्रतिमा विशेष आकर्षण है।
मान्यता: व्यापार, समृद्धि, सुख-शांति और शुभ कार्यों के लिए यहाँ गणेशजी का आशीर्वाद लिया जाता है। गणेश चतुर्थी और अन्नकूट पर विशेष आयोजन होते हैं।
जोधपुर के प्रसिद्ध गणेश मंदिरों में रतनाड़ा गणेशजी का विशेष स्थान है। स्थानीय श्रद्धा में इन्हें विघ्नहर्ता और मनोकामना पूर्ण करने वाले गणपति के रूप में पूजा जाता है।
कोटा के खड़े गणेशजी का यह मंदिर अपने नाम के अनुरूप गणेशजी की खड़ी प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है। श्रद्धालुओं में यह विश्वास प्रचलित है कि यहाँ दर्शन और पूजा से कार्यों में आने वाली बाधाएँ दूर होती हैं।
अजमेर जिले में खोडा गणेशजी एक प्रसिद्ध आस्था स्थल है। मंदिर के नाम पर क्षेत्र और मार्ग की पहचान भी बनी हुई है।
यहाँ गणेशजी को विघ्नहर्ता और मनोकामना पूर्ण करने वाले देव के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है।
जयपुर के नाहर ब्रह्मपुरी क्षेत्र का यह प्राचीन गणेश मंदिर जयपुर की गणेश परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जयपुर में मोती डूंगरी और गढ़ गणेश के साथ नाहर के गणेशजी का भी विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।
जयपुर के पुराना शहर बड़ी चौपड़ क्षेत्र से जुड़ा ध्वजाधीश गणेशजी मंदिर जयपुर की ऐतिहासिक गणेश आराधना परंपरा का हिस्सा है। स्थानीय मान्यता में मंदिर की ध्वजा और गणेशजी की उपासना का विशेष महत्व बताया जाता है।
राजस्थान के इन मंदिरों को देखें तो राजस्थान में गणेशजी की भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं है। यहाँ गणेशजी को शुभारंभ के देवता,विघ्न-विनाशक,विवाह के प्रथम निमंत्रित अतिथि,व्यापार और समृद्धि के दाता,मनोकामना पूर्ण करने वाले और संकट में सहारा देने वाले देवता के रूप में लोकजीवन में गहरी जगह मिली हुई है।
विशेष रूप से रणथंभौर के त्रिनेत्र गणेशजी को विवाह का पहला निमंत्रण भेजने की परंपरा और जयपुर के मोती डूंगरी गणेशजी की मेहंदी और उदयपुर के बोहरा गणेश मंदिर में सातिया बनाने से शीघ्र विवाह की लोकमान्यता राजस्थान की गणेश भक्ति को देश के अन्य क्षेत्रों से विशिष्ट पहचान देती है। जयपुर के मोती डूंगरी गणेशजी की मेहंदी लेंने देश भर के 18 लाख से अधिक केुवारें जयपुर में इकट्ठा हो गए।