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श्री रामकृष्ण परमहंस की 190 वीं जयंति का भावभीना आयोजन 

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18 Feb 26
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श्री रामकृष्ण परमहंस की 190 वीं जयंति का भावभीना आयोजन 

  उदयपुर : सनातन परम्परा के दिव्य दृष्टा श्रीरामकृष्ण परमहंस का आविर्भाव ऐसे काल में हुआ था जब धर्म के नाम पर नाना प्रकार के भ्रम, भेदाभेद एवं विवादों से समाज ग्रसित था, तत्कालीन उथल-पुथल की शताब्दी में सबसे बड़े मार्ग दर्शक के रूप में उपस्थित होकर उन्होंने जीवात्मा से परमात्मा तक पहुंचने की जानकारी ही नहीं दी अपितु वहां तक पहुंचने के मार्ग को सहज और सरल बना कर दिखाया। आज व्यवसाय वृत्ति के दौर में मानव सुख की लिप्सा में भटकते हुए आत्मा का स्पंदन खो बैठा है,ऐसे में युग दृष्टा रामकृष्ण परमहंस द्वारा दिखाया गया मार्ग हमें सर्व कल्याणकारी भविष्य से आश्वस्त करता है। उक्त विचार आज रामकृष्ण परमहंस की जयंती के अवसर पर शान्तिपीठ संस्थान के विस्तार कार्य क्रम एवं निम्बार्क शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के साझे में महाविद्यालय के सभागार में 'आध्यात्मिक चेतना के प्रेरक श्रीरामकृष्ण परमहंस' विषयक सत्संग - संगोष्ठी में क‌ईं वक्ताओं ने व्यक्त किए।
प्रमुख वक्ता के रूप में बोलते हुए मो सु विश्वविद्यालय में संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ नीरज शर्मा ने कहा कि भारत भूमि में पूर्ण स्वाधीनता है कि हम अपना रूपांतरण कर सकें और शुद्ध चैतन्य से परमात्मा तक पहुंच सकें। वेदों से प्रारंभ बहुआयामी भारतीय ज्ञान परम्परा हमारे संस्कारों में समाहित है और इसीलिए समय समय पर देवत्व को प्राप्त भारत के भाग्य विधाता का आविर्भाव होता है। उन्होंने कहा कि दर्शन का अभिप्राय तत्व दृष्टि है,सत्य नित्य है और इसमें विकार नहीं है। रामकृष्ण सत्य का दिग्दर्शन है। उन्होंने सोहम(वही मैं हूं) की दार्शनिक विवेचना करते हुए कहा कि यह मनुष्य को उसकी अनंत क्षमताओं से बोध कराता है और यही उपक्रम शिक्षकों द्वारा साधा जाय तो वह छात्रों को भीतर छिपी ईश्वरीय ज्योति को जाग्रत कर सकता है।
शान्तिपीठ के संस्थापक अनन्त गणेश त्रिवेदी ने परमहंस को पिछले तीन हजार वर्षों की आध्यात्मिक साधना का प्रतिफल बताते हुए कहा कि क्षणातीत जीवन जीने वाले योगी भक्त परमहंस देव ने मानव मात्र की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया और हम इसी राज मार्ग से चलकर विश्व शान्ति के लक्ष्य को अर्जित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि तत्कालीन समय में सामाजिक परिवर्तन के क‌ईं आन्दोलन चल रहे थे, चाहे ब्रह्म समाज, आर्य समाज अथवा प्रार्थना समाज हो रामकृष्ण ने इसे समन्वयकारी आध्यात्मिक आधार दिया। असल में वे ‌ईश्वर तक पहुंचने के सारे आयामों के समन्वयकारी होने के साथ ही श्रुति और स्मृति,ज्ञान विज्ञान,परा अपरा के शीर्ष समन्वयक थे।
अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ सुरेन्द्र द्विवेदी ने परमहंस के अनेक जीवन प्रसंगों को साझा करते हुए कहा कि रामकृष्ण सर्व धर्म समभाव का संदेश हैं। उन्होंने कहा कि हमारी ज्ञान परम्परा नित्यता और एकत्व की दिशा को प्रशस्त करती है।
अतिथियों का स्वागत करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ हनुमान सहाय शर्मा ने रामकृष्ण और विवेकानंद का दर्शन सर्वकालिक प्रासंगिक एवं नित नूतन बताया। उन्होंने युवाओं के चरित्र गठन की आवश्यकता पर बल दिया।
बी एन विश्वविद्यालय के छात्र कल्याण अधिष्ठाता डॉ कमल सिंह राठौड़ ने कहा कि रामकृष्ण की दीक्षा का प्रतिफल विवेकानंद ने सारे जगत को भारतीय अध्यात्मिक विरासत से आलोकित किया तथा दिव्य परम्पराओं से अवगत कराया। साथ ही डॉ राठौड़ ने शान्तिपीठ की ओर से सभी का आभार व्यक्त किया। प्रारंभ में प्रशिक्षणार्थी छात्राओं ने सरस्वती वंदना के साथ ही वेद मंत्रों का पाठ किया। संगोष्ठी का संचालन डॉ भारती दशोरा ने किया। इस अवसर पर पूर्व वन संरक्षक ओंकार लाल मेनारिया,कवि श्रेणी दान चारण के साथ ही महाविद्यालय संकाय के सदस्य, प्रबुद्ध नागरिक एवं बड़ी संख्या में प्रशिक्षणार्थी उपस्थित थे। वंदेमातरम् राष्ट्र गान से समापन हुआ।
 


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