आज हम प्रातः आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के रविवारीय सत्संग मे सम्मिलित हुए। प्रातः यज्ञशाला में यज्ञ हुआ। यज्ञ के पश्चात समाज के सभागार में सत्संग आरम्भ हुआ। प्रथम भजन हुए। भजन के पश्चात सामूहिक प्रार्थना एवं उसके बाद ऋषि दयानन्द सरस्वती जी के बाबू देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय जी रचित जीवनचरित से ऋषि जीवन के कुछ अंशों का पाठ किया गया। आज का प्रवचन आचार्य सुनील शास्त्री, निरजंनपुर-लक्सर गुरुकुल का था। आचार्य जी ने अपने सम्बोधन में कहा कि वेदों में चार प्रकार की वाणियों का उल्लेख मिलता है। उन्होंने बताया कि चार वाणियां परा वाणी, पश्यन्ती वाणी, मध्यमा वाणी तथा वैखरी वाणी कहलाती हैं। आचार्य जी ने श्रोताओं को कहा कि स्वाध्याय का अर्थ ईश्वर के निज एवं मुख्य नाम ओ३म् वा प्रणव जप तथा वेदेादि सत्य शास्त्रों के अध्ययन को करना होता है। उन्होंने कहा कि स्वाध्याय का यह अर्थ महर्षि पतंजलि के योगदर्शन के व्यास भाष्य में बताया गया है। आचार्य जी ने कहा कि जो व्यक्ति साधना नहीं करता वह स्वाध्याय भी नहीं कर सकता।
ऋषिभक्त आचार्य सुनील शास्त्री ने कहा कि जो व्यक्ति एक घंटा उपासना में नहीं बैठता वह गुरु ऋषि दयानन्द का शिष्य नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक स्त्री व पुरुष के लिये न्यूनतम एक घंटा उपासना वा साधना करनी आवश्यक है। यदि हम एक घंटा उपासना में लगायेंगे तो इससे हमारे जीवन व व्यवहार में एक महीने में अन्तर दिखाई देगा और इससे हमारी आत्मा की उन्नति होगी। आचार्य जी ने यह भी कहा कि ईश्वर की उपासना में ईश्वर प्रणिधाम सहित ईश्वर की आज्ञा का पालन व समर्पण आवश्यक है। सब मनुष्यों को जीवन में प्रतिदिन प्रातः व सायं एक घण्टा प्रणव जप करना भी आवश्यक है। ऐसा किए बिना वेदों का स्वाध्याय हम नहीं कर सकेंगे और करेंगे तो उसका अपेक्षित व आशातीत लाभ नहीं होगा। इसी का पालन करने से हमें वेदों व सत्यार्थप्रकाश आदि ऋषियों के ग्रन्थों के स्वाध्याय में सुख व आनन्द की अनुभूति भी होगी।
आर्यसमाज के उच्च कोटि के विद्वान एवं वेदों के अनुसार जीवन जीने वाले आचार्य सुनील शास्त्री जी ने कहा कि ज्ञान पुस्तकों के अध्ययन व विद्वानों के उपदेशों को सुनकर मिलता है साथ हि विज्ञान परमात्मा की उपासना व ध्यान साधना करने से ईश्वर की कृपा प्राप्त होने पर मिलता है। आचार्य सुनील शास्त्री जी ने श्रोताओं व सत्संगियों को वेदों के स्वाध्याय तथा ईश्वर की वैदिक विधि से प्रतिदिन प्रातः व सायं सन्ध्या वेला में ऋषियों की पद्धति योगदर्शन के नियमों के अनुसार उपासना करने की प्रेरणा भी सत्संग भवन उपस्थित सभी लोगों को की। आचार्य जी ने कहा कि सभी ऋषि दयानन्द के अनुयायियों को अपने जीवन में प्रतिदिन 15 मिनट वेदज्ञान से अनभिज्ञ लोगों में वेदों की शिक्षाओं का प्रचार करने की प्रेरणा के साथ न्यूनतम प्रतिमाह पांच सत्यार्थप्रकाश लोगों को भेंट करने का भी अनुरोध किया। आचार्य जी ने बताया कि उनके लक्सर के निकट निरंजनपुर गांव स्थित गुरुकुल में अप्रैल माह के प्रथम रविवार व उससे पूर्व के शुक्रवार एवं शनिवार को को विशेष आयोजन धार्मिक व सांस्कृतिक आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन में उन्होंने सभी आर्यसमाज के सदस्यों व जनसामान्य को आमंत्रित किया। आर्यसमाज के प्रधान श्री सुधीर गुलाटी जी ने कहा कि वह अपने मित्रों के साथ इस आयोजन में सम्मिलित होने का प्रयास करेंगे।
आर्यसमाज के प्रधान श्री सुधीर गुलाटी जी ने श्री सुनील शास्त्री जी का आज के सुन्दर व ज्ञानवर्धक प्रवचन के लिये धन्यवाद किया। आर्यसमाज के विद्वान पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी ने शान्तिपाठ कराया। आज के सत्संग में आर्यसमाज के मंत्री श्री नारायण दत्त पांचाल, श्री कुलभूषण कठपालिया, श्री ज्ञानचन्द गुप्ता, श्री अशोक नांरग, माता जगवती चौधरी, माता सुदेश भाटिया जी, माता श्रीमती स्नेहलता खट्टर, माता शीला गुप्ता व अनेक महिलाओं सहित श्री पवन कुमार, श्री बसन्त कुमार, श्री देवकी नन्दन शर्मा, श्री धीरेन्द्र मोहन सचदेव, श्री सतीश आर्य जी, श्री मदन मोहन जी आदि बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे। ओ३म् शम्।