राजस्थान के 77 वें स्थापना दिवस पर भजन लाल सरकार ने नए संकल्प लेने की प्रतिबद्धता दर्शायी
गोपेन्द्र नाथ भट्ट
एक समय था जब राजस्थान को लेकर देश-विदेश में केवल एक ही चर्चा होती थी कि राजस्थान रेगिस्तानी प्रदेश है और यह सपेरों, कालबेलियों, घुमक्कड़ जातियों, आदिवासियों एवं पिछड़ी जातियों और ऊंटों का ही प्रदेश है जहाँ पानी उपलब्ध नहीं है,बिजली नहीं है,सड़के नहीं है और आधारभूत सुविधाओं का नितान्त अभाव है। साथ ही राजस्थान में हर दूसरा वर्ष सूखा और अकाल से ग्रसित रहता है। राजस्थान की स्थापना के 77 वर्षों बाद राजस्थान को लेकर यह धारणा अब बदल रही है। राजपुताना की 22 छोटी-बड़ी रियासतों के विभिन्न चरणों में विलय से वर्ष 1949 की 30 मार्च को बना राजस्थान आज भारत के सबसे बड़े भौगोलिक प्रदेश की दृष्टि से ही नहीं विकास के लिहाज से भी सबसे बड़ा प्रदेश बनने की ओर अग्रसर हो रहा है।
आज राजस्थान वह प्रदेश नहीं है जो लोगों की मान्यताओं के अनुसार सात दशकों पहले था ।हालांकि तब भी लोग सिक्के का एक पहलू ही देख रहे थे जबकि उत्तर-पश्चिम राजस्थान के थार मरूस्थल के एक बड़े हिस्से को छोड़ कर पूर्वी और दक्षिणी राजस्थान रेगिस्तानी क्षेत्र नहीं बल्कि प्रदेश से गुजरने वाली और राज्य की एक मात्र बारह महीने चलने वाली चम्बल नदी और दक्षिणी राजस्थान के उदयपुर राजसमंद,सलूम्बर डूंगरपुर और बांसवाड़ा की मनोहारी झीलों और सघन वनों से आच्छादित इलाका था,फिर भी इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता था कि राजस्थान के गठन के प्रारंभिक वर्षों में प्रदेश के रेगिस्तानी,पहाड़ी,आदिवासी तथा पिछड़े क्षेत्रों सहित प्रदेश के लगभग सभी अंचलों में पानी की भारी कमी और वर्षा निर्भर खेती पर मानसून के दगा दे जाने के बाद न केवल पीने के पानी का गंभीर संकट पैदा हो जाता था वरन हर दूसरा वर्ष सूखा और अकाल की भेंट चढ़ जाता था।
इन विषम परिस्थितियों को देखते हुए योजनाकारों ने केन्द्र और राज्य सरकारों के सहयोग से राजस्थान के विकास की नई इबारत लिखना शुरू किया और उत्तर पश्चिम राजस्थान में विश्व की सबसे बड़ी राजस्थान कैनाल परियोजना (वर्तमान नाम इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना) का शुभारंभ हुआ और कालांतर में हिमालय का पानी का राजस्थान के रेगिस्तान की प्यास बुझाने के लिए अवतरण हुआ और आज राज्य के श्रीगंगानगर से बाड़मेर के गडरा रोड तक का पूरा रेगिस्तानी इलाका हरियालो राजस्थान की झलक दर्शा रहा है। पंजाब की सीमाओं से लगे प्रदेश के दो जिले श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ को आज देश में अन्न का कटोरा और भंडार माना जाता है। राजस्थान कैनाल परियोजना के आने से पहले स्थानीय रियासतों विशेष कर बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने गंग नहर बनाने का ऐतिहासिक काम किया। कमोवेश ऐसे ही प्रयास प्रदेश की हर रियासतों में नियोजित ढंग से जैसे उदयपुर की झीलें, उदयसागर,जयसमंद, राजसमंद, एडवर्ड समन्दर, बीसलपुर, जवाई बांध बनाने जैसे काम भी किए गए। इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना आने के बाद न केवल पश्चिम राजस्थान में सिंचाई की समस्या का हल निकला वरन जोधपुर सहित कई नगरों की पेयजल समस्या का निराकरण हुआ। उधर प्रदेश के अन्य अंचलों में चम्बल, माही, सोम , जाखम आदि कई परियोजनाएं बनी। उदयपुर की झीलों में बारह महीने पानी लाने के लिए देवास परियोजना को सिरे पर चढ़ाया गया है। पश्चिम राजस्थान में इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना की सफलता और गुजरात में सरदार सरोवर परियोजना पूरी होने के बाद वहां के कडाना डेम को नर्मदा का जल मिलने के बाद माही बजाज सागर के अधिशेष पानी को 1971 के राजस्थान,मध्य प्रदेश और गुजरात राज्यों के मध्य हुए अन्तर्राज्यीय जल समझौते की पालना में राजस्थान के जालौर और बाड़मेर जिलों तक हाई लेवल केनाल तक पहुंचाया गया है।
राजस्थान में भजन लाल शर्मा के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार ने पूर्वी राजस्थान तथा शेखावाटी अंचल की सिंचाई और पेयजल योजनाओं को अपनी प्राथमिकता में रख कर अपने कदम आगे बढ़ाए है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना जिसे ईआरसीपी के नाम से जाना जाता था उसे पुनर्गठित कर इसका नाम रामसेतु पी के सी परियोजना रख भारत सरकार और मध्य प्रदेश सरकार के साथ नए सिरे से एमओयू कर इस महत्वाकांक्षी परियोजना का कार्य शुरू कराया है। दरअसल में ईआरसीपी को भाजपा की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्रित्व काल में तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी ने स्वीकृत किया था लेकिन बाद में प्रदेश में कांग्रेस सरकार आने से उसमें अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाई, हालांकि कांग्रेस शासन में अशोक गहलोत ने भी अपने मुख्यमंत्रित्व काल में इसके लिए प्रयास किए लेकिन भारत सरकार और मध्य प्रदेश सरकार के साथ सहमति नहीं बन पाई।
यह प्रसन्नता का विषय है कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने प्रदेश की टोपोग्राफी को समझने का प्रयास किया है और यह पाया है कि प्रदेश के मेवाड़ और मारवाड़ की सीमाओं का एक जोन ऐसा है जहां आधी बरसाती नदियों का पानी अरब सागर और आधी नदियों का वर्षा जल हिन्द महासागर में व्यर्थ बह कर चला जाता है। यह तथ्य समझने के बाद उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की नदियों को जोड़ने की कल्पना को साकार करने के प्रयास किया है। वे पार्वती और कृष्णा जैसी नदियों को ईआरसीपी परियोजना से जोड़ रामसेतु परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए गंभीर प्रयास कर रहे है। इसी प्रकार राजस्थान के शेखावाटी अंचल के झुंझुनू,सीकर एवं चूरू आदि जिलों तक यमुना जल को पहुंचाने के लिए कृत संकल्प दिख रहे है तथा इसके लिए भारत सरकार और हरियाणा सरकार के साथ एमओयू भी साइन किए है। राजस्थान में आज भी सतही और भूमिगत जल की उपलब्धता मात्र 1 प्रतिशत ही है। प्रदेश के कई ब्लॉक डार्क जोन घोषित है। कई इलाकों में पानी की गुणवत्ता भी गंभीर चिंता का विषय है । ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आशीर्वाद से मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा द्वारा राजस्थान में पेयजल और सिंचाई के पानी की इन महत्वपूर्ण परियोजनाओ को धरातल पर लाने के प्रयास सराहनीय है।
इस तरह आज का राजस्थान मात्र रेगिस्तानी प्रदेश नहीं बल्कि हरियालो राजस्थान की दिशा में आगे बढ़ रहा है। राजस्थान की पश्चिमी सीमाएं पाकिस्तान के साथ जुड़ी हुई है। यह भारत के पश्चिमी क्षेत्र का सबसे बड़ा बॉर्डर है। प्रदेश में सीमा से लगी शानदार सड़कों के साथ ही आज प्रदेश में दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस हाईवे सहित अन्य कई अच्छे राष्ट्रीय और राज मार्ग है। राज्य में पर्यटन, मेडिकल टूरिज्म, शिक्षा, चिकित्सा, औद्योगिक विकास,पत्थर उद्योग, कृषि, सहकारिता, दुग्ध उत्पादन आदि अनेक ऐसे क्षेत्र है जिनमें राजस्थान नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रदेश के सड़क,रेलऔर हवाई सेवाओं का नेटवर्क भी निरन्तर विकसीत हो रहा है। पश्चिमी राजस्थान के पचपदरा में निर्मित तेल रिफाइनरी और पेट्रो कॉम्प्लेक्स राजस्थान की काया पलटने वाला है । वहीं आदिवासी क्षेत्र बांसवाड़ा में माही बैकवाटर क्षेत्र के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों परमाणु बिजली घर का शिलान्यास होना भी राजस्थान के विकास में चार चाँद लगायेगा इसमें कोई संदेह नहीं है।आज राजस्थान सोलर ऊर्जा का विश्व का सबसे बड़ा हब बन कर उभर रहा है। प्रदेश में भजन लाल सरकार के कार्यकाल के पहले वर्ष में हो आयोजित राइजिंग राजस्थान समिट में प्रवासी राजस्थानियों और देश विदेश के औद्योगिक घरानों ने लाखों करोड़ के निवेश प्रस्ताव दिए है जिसमें 8 लाख करोड़ के प्रस्ताव जमीन पर उतरे है।
राजस्थान का स्थापना दिवस पिछले वर्ष तक प्रति वर्ष 30 मार्च को मनाया जाता था लेकिन प्रदेश की भजन लाल सरकार ने इसे हिन्दू नव वर्ष चैत्र प्रतिपदा की तिथि से मनाना आरम्भ किया है। इसके पीछे यह कारण बताया जा रहा है कि 30 मार्च 1949 के दिन जब तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल राजस्थान का उदघाट्न करने जयपुर आए थे उस दिन हिन्दू नव वर्ष चैत्र प्रतिपदा का पुण्य दिवस था।
अपने समृद्ध इतिहास, ऐतिहासिक विरासतों,कला और संस्कृति तथा बेजोड़ हस्तशिल्प एवं विविधता भरे पर्यटन के कारण राजस्थान शुरू से ही विश्व विख्यात रहा है। राजस्थान के विशाल दुर्गों,भव्य महलों,छोटे बड़े किलों,विहंगम हवेलियों, वन-अभ्यारण्यों,धार्मिक और ऐतिहासिक एवं मनोहारी पर्यटन स्थलों, राजस्थान के लोक संगीत,परंपरागत खान पान और जीवटता से भरे लोग, उद्योगपति मारवाड़ी उद्योगपतियों ने देश विदेश में राजस्थान की प्रतिष्ठा को बढ़ाया है। राजस्थानियों के चटक रंग के पहनावों तथा राजस्थान के रंग बिरंगे तीज त्यौहारों एवं पधारो म्हारे देस की आतिथ्य भावना के कारण देश विदेश के पर्यटकों के लिए राजस्थान पहली पसंद है । अब राजस्थान समुदी तट और बर्फीली वादियों का अहसास भी कराने लगा है। इस प्रकार विकसित राजस्थान और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के @2047 तक विकसित भारत की कल्पना को पूरी करने के लिए राजस्थान अब तैयार दिख रहा है।