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हिंदू नववर्ष का ऐतिहासिक महत्व- डॉ. श्रीनिवास महावर राजस्थान दिवस पर विशेष -

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18 Mar 26
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हिंदू नववर्ष का ऐतिहासिक महत्व- डॉ. श्रीनिवास महावर    राजस्थान दिवस पर विशेष -

जनमत मंच  के तत्वाधान में "हिंदू नववर्ष का ऐतिहासिक महत्व" विषय पर संगोष्ठी  का आयजन किया गया। इस अवसर पर जनमत मंच के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्रीनिवास महावर ने बताया कि

हिंदू नववर्ष भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का एक महत्वपूर्ण पर्व है। भारत में इसे अत्यंत उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह एक नए वर्ष का आरंभ ही नहीं है , बल्कि सृष्टि की उत्पत्ति, धर्म, आस्था और संस्कृति का संगम है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नव संवत्सर का प्रारंभ होता है। इस दिन ही ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी, इसलिए इसे सृष्टि का प्रथम दिन भी कहा जाता है। इस बार  हिंदू नववर्ष (विक्रम संवत 2083) 19 मार्च 2026, गुरुवार को मनाया जाएगा।      

.  19 मार्च 2026 (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा)

* विक्रम संवत: 2083

* साथ ही भारत के अलग-अलग राज्यों में इस दिन को अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा, दक्षिण भारत में उगादी और उत्तर भारत में नवसंवत्सर के रूप में मनाया जाता है।

इसी दिन से चैत्र नवरात्रि भी शुरू होगी। हिंदू नववर्ष भारतीय संस्कृति और परंपरा का एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन नई शुरुआत, सकारात्मकता और उत्साह का प्रतीक माना जाता है। हिंदू कैलेंडर में वर्ष को बारह महीनों में विभाजित किया गया है, जो चंद्र-सौर गणना पर आधारित होते हैं। यह बारह महीने क्रमशः चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष (अगहन), पौष, माघ और फाल्गुन कहलाते हैं। प्रत्येक माह का अपना धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व होता है, तथा इन महीनों में विभिन्न पर्व-त्यौहार मनाए जाते हैं।

हिंदू पंचांग में महीनों की गणना चंद्रमा की गति के अनुसार की जाती है, जिसमें पूर्णिमा या अमावस्या के आधार पर महीनों की शुरुआत होती है। चैत्र माह से हिंदू नववर्ष का आरंभ होता है।

इस अवसर पर मंच के सचिव शिरीष नाथ माथुर ने बताया कि, यूनानियों ने हिंदू पंचांग की नकल करे अंग्रेजी   कैलेंडर का निर्माण किया और फिर इसे दुनिया के विभिन्न हिस्सों में प्रसारित किया। भले ही आज वैश्विक स्तर पर ग्रेगोरियन कैलेंडर का प्रचलन है, लेकिन भारतीय कैलेंडर की महत्ता आज भी अटूट बनी हुई है।

भारत में धार्मिक पर्व-त्यौहार, उपवास, महापुरुषों की जयंती-पुण्यतिथि, विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त की गणना हिंदू पंचांग के अनुसार ही की जाती है। यह केवल एक समय मापने की पद्धति नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, ज्योतिष और धर्म से गहराई से जुड़ा हुआ है, जो सदियों से सनातन परंपराओं को दिशा देता आ रहा है।इस वर्ष हम सभी  स्वच्छ राजस्थान का संकल्प लेकर  इसे उत्सव की तरह अपने परिवार के साथ मनाये |  

 संस्कृति और परंपरा से जुड़ाव

नव संवत्सर केवल एक तिथि नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, गौरव और सनातन परंपराओं का प्रतीक है। यह दिन हमें सिखाता है कि हर वर्ष की शुरुआत नए संकल्पों, नए जोश और नई ऊर्जा के साथ करनी चाहिए। यह पर्व आत्मशुद्धि और नए दृष्टिकोण के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।     

यह दिन भारतीय कालगणना के आधार पर नए युग का आरंभ है, जिसे विक्रम संवत् और शक संवत् जैसे संवत्सरों के रूप में जाना जाता है।

मंच के सह सचिव डॉ. प्रिय प्रियदर्शी ओझा ने बताया कि ,भारत में प्रचलित नव संवत्सर का एक प्रमुख रूप ‘विक्रम संवत्‘ है, जो  विक्रमादित्य की विजय गाथा से जुड़ा हुआ है। 57 ईसा पूर्व में उज्जैन के महान सम्राट विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त कर एक नए युग की शुरुआत की। उनकी इस विजय की स्मृति में विक्रम संवत् का आरंभ किया गया। यह भारतीय परंपरा में गौरव और विजय का प्रतीक है, जो हमें हमारे स्वर्णिम अतीत की याद दिलाता है। गैग्रोरियन कैलेंडर से विक्रम संवत् 57 वर्ष आगे है। इसका कारण यह है कि विक्रम संवत की गणना सम्राट विक्रमादित्य की एक महत्वपूर्ण विजय के आधार पर की गई थी।

वर्तमान ग्रेगोरियन वर्ष 2027 है, तो विक्रम संवत 2083 होगा। (2026 + 57 = 2083)

 शक संवत् और इसका महत्व

विक्रम संवत् के अतिरिक्त एक और संवत्सर भी भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जिसे ‘शक संवत्‘ कहा जाता है। इसकी शुरुआत 78 ईस्वी में हुई, जब सम्राट कनिष्क ने इसे प्रचलित किया। इसे भारत सरकार ने भी आधिकारिक पंचांग के रूप में स्वीकार किया है। यह संवत् हमें भारतीय गणितीय और खगोलशास्त्रीय परंपराओं की वैज्ञानिकता से जोड़ता है।

 इस अवसर पर मंच के सहायक सचिव विनोद कुमार चौधरी ने नव संवत्सर का धार्मिक महत्व बताते हुए कहा कि।

नव संवत्सर का शुभारंभ चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन से होता है, जो माँ दुर्गा की उपासना का विशेष समय है। इस दिन घरों में मंगल कलश स्थापित किया जाता है और माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही, यह ऋतु परिवर्तन का भी सूचक है, जब प्रकृति नवजीवन से भर उठती है, वृक्षों पर नए पत्ते आते हैं और वातावरण में नवीन ऊर्जा का संचार होता है।

मंच के कोषाध्यक्ष विशाल माथुर ने कहा कि नव संवत्सर केवल एक तिथि नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, गौरव और सनातन परंपराओं का प्रतीक है। यह दिन हमें सिखाता है कि हर वर्ष की शुरुआत नए संकल्पों, नए जोश और नई ऊर्जा के साथ करनी चाहिए। यह पर्व आत्मशुद्धि और नए दृष्टिकोण के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

इस दिन स्नान कर तिलक लगाना, नए वस्त्र धारण करना, मंदिरों में पूजा-अर्चना करना, पवित्र जल का छिड़काव करना और परिवार के साथ मिलकर उत्सव मनाना शुभ माना जाता है। साथ ही, घर में आम के पत्तों और तोरण से सजावट करना भी विशेष महत्व रखता।

कार्यक्रम का संचालन एवं धन्यवाद्  करते हुए विनोद चौधरी  ने कहा कि हम सब मिलकर, इस बार नव संवत्सर को हर्षोल्लास और आस्था के साथ मनाएं, अपने पूर्वजों की दी हुई महान धरोहर को अपनाएं और भारतीय संस्कृति की इस अमूल्य परंपरा को आगे बढ़ाएं|


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