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शिखर से संवाद: इंजीनियरिंग की तार्किकता और पर्वतारोहण का साहस -लेखिका: अमिता शर्मा

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07 Mar 26
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शिखर से संवाद: इंजीनियरिंग की तार्किकता और पर्वतारोहण का साहस -लेखिका: अमिता शर्मा

“इंजीनियरिंग की बारीकियों से पहाड़ों की ऊंचाई तक—कोटा की आकांक्षा शर्मा ने साबित किया कि अगर फेफड़ों में प्राणायाम का दम और मन में फतह का संकल्प हो, तो दुनिया का कोई भी ‘फ्रीजर’ आपके हौसलों को नहीं जमा सकता।”

“एक महिला की असली शक्ति उसके भीतर छिपे उस संकल्प में है, जो असंभव दिखने वाले पहाड़ों को भी उसके हौसलों के आगे छोटा कर देता है।“

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस उन कहानियों को उत्सव की तरह मनाने का दिन है, जो सीमाओं को लांघकर नई इबारत लिखती हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी है कोटा की बेटी आकांक्षा शर्मा कुटुम्बले की। पेशे से स्ट्रक्चरल इंजीनियर आकांक्षा ने न केवल सिविल इंजीनियरिंग के जटिल नक्शों को समझा, बल्कि दुनिया की सबसे चुनौतीपूर्ण चोटियों पर तिरंगा लहराकर यह सिद्ध किया कि ‘संकल्प की ऊंचाई’ के आगे पहाड़ भी छोटे पड़ जाते हैं।

शारीरिक दक्षता और सांसों का संतुलन

पर्वतारोहण के विशेषज्ञों का मानना है कि ऊँचाई पर सफलता केवल इरादों से नहीं, बल्कि शरीर को वैज्ञानिक रूप से तैयार करने से मिलती है। आकांक्षा ने इसके लिए एक कड़ा अनुशासन अपनाया। उन्होंने रोज़ाना 10 किलोमीटर रनिंग, स्टेप वर्कआउट और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के ज़रिए अपना स्टैमिना तैयार किया। सबसे महत्वपूर्ण रहा उनका ‘प्राणायाम’ का अभ्यास। विशेषज्ञों की राय में, अधिक ऊँचाई पर जहाँ ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम हो जाता है, वहाँ फेफड़ों की क्षमता (Lung Capacity) बढ़ाने में प्राणायाम एक अचूक औषधि की तरह काम करता है। यही कारण था कि पर्वतों की विरल हवाओं में भी आकांक्षा अपनी सांसों पर नियंत्रण रख पाईं।

किलिमंजारो: ‘स्टेला पॉइंट’ की परीक्षा और मानसिक विजय

अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी माउंट किलिमंजारो (5,895 मीटर / 19,341 फीट) की चढ़ाई के दौरान ‘समिट नाइट’ सबसे कठिन परीक्षा थी। आकांक्षा बताती हैं कि उस रात का अनुभव रोंगटे खड़े करने वाला था। जब वे ‘स्टेला पॉइंट’ (5,756 मीटर / 18,885 फीट) के करीब पहुँचीं, जो कि शिखर की ढलान का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा माना जाता है, तब उन्होंने कई अन्य पर्वतारोहियों, विशेषकर कुछ महिलाओं को हार मानकर वापस नीचे लौटते देखा। शून्य से 13 डिग्री नीचे का तापमान और साथियों को वापस लौटते देख एक पल के लिए उनका मनोबल भी प्रभावित हुआ। लेकिन आकांक्षा ने धैर्य बनाए रखा और शिखर पर पहुँचकर कश्मीरी कानी साड़ी पहनी और तिरंगा लहराया।

माउंट एल्ब्रूस: “फ्रीजर के अंदर चलने जैसा अहसास”

यूरोप की सबसे ऊंची चोटी माउंट एल्ब्रूस (5,642 मीटर / 18,510 फीट) को ‘ऑफ-सीजन’ में फतह करना आकांक्षा की तकनीकी पकड़ का प्रमाण था। कॉकसस (Caucasus) पर्वत श्रृंखला में स्थित एल्ब्रूस अपने घातक और अप्रत्याशित मौसम के लिए कुख्यात है। आकांक्षा ने वहाँ माइनस 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तक के हाड़ कंपाने वाले तापमान का सामना किया।

उस खौफनाक ठंड को याद करते हुए आकांक्षा कहती हैं, “वहाँ की परिस्थितियों में ऐसा महसूस हो रहा था मानो मैं किसी विशालकाय फ्रीजर के अंदर चल रही हूँ।“ विशेषज्ञों के अनुसार, एल्ब्रूस की सबसे बड़ी चुनौती वहाँ चलने वाली 80 से 100 किमी प्रति घंटा की रफ्तार वाली बर्फीली हवाएं हैं। आकांक्षा ने उन तीखी हवाओं के बीच खुद को स्थिर रखा। 2019 में कश्मीर-लद्दाख से एडवांस माउंटेनियरिंग कोर्स करने के कारण वे ‘क्रैम्पॉन’ और ‘आइस ऐक्स’ जैसे उपकरणों के उपयोग में माहिर थीं, जिससे उन्होंने उन फिसलन भरी बर्फीली ढलानों को फतह किया।

एक नज़र में: आकांक्षा का सफर

नाम: आकांक्षा शर्मा कुटुम्बले (कोटा, राजस्थान)

शिक्षा: एम.टेक (स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग, आईआईटी रुड़की)

महारत: किलिमंजारो (अफ्रीका) और एल्ब्रूस (यूरोप) का सफल आरोहण।

विशेषता: साड़ी पहनकर शिखर फतह कर सांस्कृतिक गौरव बढ़ाया।

लक्ष्य: सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों (Seven Summits) पर विजय।

एक साझा सफलता का संदेश

आकांक्षा अपनी इस यात्रा का श्रेय अपने परिवार, विशेषकर अपनी सास के निरंतर सहयोग को देती हैं। समाज के जानकारों का मानना है कि यह उदाहरण उन रूढ़ियों को तोड़ता है जो अक्सर विवाह के बाद महिलाओं के व्यक्तिगत सपनों पर विराम लगा देती हैं।

आकांक्षा की यह जीत केवल उनकी अपनी नहीं, बल्कि हर उस महिला की है जो अपनी बाधाओं को पार करने का साहस जुटा रही है। क्या हम अपने आस-पास की प्रतिभाओं के लिए वही ‘सपोर्ट सिस्टम’ बन पा रहे हैं जो आकांक्षा को उनके परिवार से मिला?

महिला दिवस की सार्थकता इसी में है कि हर बेटी आकांक्षा की तरह अपने सपनों का शिखर खुद चुने और उसे फतह करे।

“प्रत्येक महिला की सफलता, दूसरी महिला के लिए प्रेरणा होनी चाहिए।“ — सेरेना विलियम्स


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