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अमेरिका–इजरायल का ईरान पर हमला और भारत पर संभावित असर

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02 Mar 26
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गोपेन्द्र नाथ भट्ट

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के सैन्य व परमाणु ठिकानों पर संभावित या सीमित हमलों की खबरों ने वैश्विक राजनीति को एक बार फिर अस्थिर बना दिया है।यह हमला “टार्गेटेड स्ट्राइक” माना जा रहा है। ईरान- इजरायल और अमेरिका के बीच चल रहे घमासान में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद खबरें आ रही हैं कि उनकी जगह पर फिलहाल अयातुल्ला अराफी इस पद को संभालने जा रहे हैं।

 

अमेरिका–इजरायल और ईरान के बीच यह टकराव अब सीमित सैन्य कार्रवाई से बढ़कर वैश्विक संकट का रूप लेता दिख रहा है। ईरान के सर्वोच्च नेता की मौत ने पूरे मुस्लिम जगत में तीखी प्रतिक्रिया पैदा की है। पाकिस्तान में अमेरिकी दूतावास पर हमला और इराक में प्रदर्शन इस बात के संकेत हैं कि यह संघर्ष केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है।

 

दुनिया के कई देशों ने युद्ध रोकने की अपील की।

यूरोपीय देशों ने बातचीत की मांग की

रूस और चीन ने चिंता जताई है और संयुक्त राष्ट्र ने भी शांति की अपील की है। कई देशों को डर है कि यह संघर्ष तीसरे बड़े विश्व युद्ध में बदल सकता है।

सबसे बड़ा खतरा – तेल और समुद्री रास्ते बन्द होना हैं। फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग हैं।

यदि युद्ध बढ़ता है तो तेल महंगा होगा,व्यापार प्रभावित होगा तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी। विशेष करभारत जैसे देशों पर इसका सीधा असर पड़ेगा।

 

28 फरवरी 2026 से शुरू हुए संयुक्त हमलों में कई बड़े शहर निशाना बने है। अमेरिका–इजरायल ने ईरान की राजधानी तेहरान के सैन्य ठिकानों और सरकारी परिसर निशाना बनाए है। उसके अलावा इस्फहान शहर के परमाणु और मिसाइल ठिकाने 

क़ोम शहर के सैन्य और धार्मिक क्षेत्र ,कराज के सैन्य ठिकाने ,केरमानशाह शहर के मिसाइल बेस 

अन्य शहरों तबरीज़, इलाम,बसरा/बुशेहर (दक्षिणी बंकेदरगाह) ,उर्मिया ,ज़ंजान,शिराज़,मिनाब – यहां स्कूल पर हमला हुआ जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए । ईरान के परमाणु ठिकाने नतांज़ परमाणु केंद्र, 

फोर्दो परमाणु संयंत्र आदि पर ताबड़तोड़ हमले किए है। अमेरिका–इजरायल हमलों के बाद ईरान ने मिसाइल और ड्रोन जवाबी हमले किए है। ईरान ने इजरायल में तेल अवीव सहित कई शहरों पर मिसाइल हमले किए। साथ ही ईरान ने अमेरिकी सैन्य सैन्य और एयरपोर्ट क्षेत्र कतर स्थित अमेरिकी ठिकाने 

जॉर्डन मेंअमेरिकी सैन्य ठिकाने और इराक मेंअमेरिकी बेस तथा खाड़ी देशों में दुबई में ड्रोन हमले और अबू धाबी में एयरपोर्ट पर हमला किया है।

इन हमलों में अब तक अनुमानित मौतें ईरान में 200 से ज्यादा लोग मारे गए है। मिनाब स्कूल हमले में लगभग 148 मौतें बताई गईं। इजरायल में भी कई नागरिक हताहत हुए है। ईरान के सर्वोच्च नेता 

अयातुल्ला अली खामेनेई साथ ही कई सैन्य अधिकारी भी हमले में मारे गए है।

 

इजरायल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता रहा है, जबकि अमेरिका भी ईरान की परमाणु गतिविधियों और क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करने की नीति पर चलता रहा है। यदि अमेरिका और इजरायल की संयुक्त कार्रवाई तेज होती है तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों पर भी व्यापक प्रभाव पड़ेगा।

सबसे पहला और सीधा प्रभाव तेल की कीमतों पर पड़ने की संभावना है। ईरान विश्व के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में शामिल है और फारस की खाड़ी से गुजरने वाला समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। यदि संघर्ष बढ़ता है और होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव पैदा होता है तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात से पूरा करता है, इसलिए तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई और परिवहन लागत पर पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि से आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।दूसरा बड़ा असर भारत के व्यापार और समुद्री परिवहन पर पड़ेगा। भारत का पश्चिम एशिया के देशों के साथ बड़ा व्यापारिक संबंध है। यदि क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति बनती है तो समुद्री मार्गों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है, जिससे माल ढुलाई महंगी और धीमी हो जाएगी। इसके परिणामस्वरूप भारतीय निर्यात और आयात दोनों प्रभावित हो सकते हैं। विशेष रूप से पेट्रोकेमिकल, उर्वरक और गैस क्षेत्र पर असर पड़ सकता है।तीसरा महत्वपूर्ण पहलू भारत में काम करने वाले और खाड़ी देशों में बसे भारतीयों से जुड़ा है। खाड़ी क्षेत्र में लगभग 80 लाख से अधिक भारतीय काम करते हैं। यदि संघर्ष बढ़ता है तो उनकी सुरक्षा और रोजगार पर खतरा उत्पन्न हो सकता है। पहले भी इराक और कुवैत संकट के दौरान भारत को बड़े पैमाने पर अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालना पड़ा था। ऐसी स्थिति दोबारा बनने पर भारत सरकार के सामने बड़ी कूटनीतिक और मानवीय चुनौती खड़ी हो सकती है।कूटनीतिक दृष्टि से भी भारत के लिए स्थिति संतुलन साधने वाली होगी। भारत के इजरायल और अमेरिका दोनों के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध हैं, वहीं ईरान भारत के लिए ऊर्जा और क्षेत्रीय संपर्क के लिहाज से महत्वपूर्ण देश रहा है। चाबहार बंदरगाह परियोजना भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुंच का महत्वपूर्ण मार्ग है। ऐसे में भारत किसी भी पक्ष का खुला समर्थन करने के बजाय संतुलित और शांति समर्थक नीति अपनाने की कोशिश करेगा।

रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में भी इस संघर्ष का अप्रत्यक्ष असर भारत पर पड़ सकता है। यदि मध्य पूर्व में तनाव बढ़ता है तो वैश्विक आतंकवादी गतिविधियों में वृद्धि की आशंका रहती है। इससे भारत की आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ेगी।

हालांकि इस संकट के बीच भारत के लिए कुछ अवसर भी उभर सकते हैं। यदि तेल आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश बढ़ती है तो भारत रूस, अमेरिका और अन्य देशों से दीर्घकालिक ऊर्जा समझौते मजबूत कर सकता है। साथ ही भारत की कूटनीतिक भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि भारत सभी पक्षों से संवाद बनाए रखने वाले देशों में शामिल है।कुल मिलाकर अमेरिका–इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव भारत के लिए आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चुनौती साबित हो सकता है। ऐसे समय में भारत को संतुलित विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए सावधानीपूर्वक कदम उठाने होंगे। यदि संघर्ष सीमित रहता है तो प्रभाव भी सीमित रहेगा, लेकिन व्यापक युद्ध की स्थिति भारत सहित पूरी दुनिया के लिए गंभीर परिणाम लेकर आ सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इजरायल यात्रा भारत की विदेश नीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय मानी जा रही है। यह पहली बार था जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इजराइल की आधिकारिक यात्रा की और दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को नई ऊँचाई दी। इस यात्रा से लौटने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने राजस्थान के अजमेर में आयोजित एक जनसभा में इजरायल का विशेष उल्लेख करते हुए भारत–इजरायल मित्रता को विकास और तकनीकी सहयोग का आदर्श उदाहरण बताया।अजमेर में दिए गए अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इजरायल जैसे छोटे देश ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद तकनीक, कृषि और जल प्रबंधन के क्षेत्र में दुनिया को नई दिशा दी है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत इजरायल से आधुनिक कृषि तकनीक, ड्रिप सिंचाई और जल संरक्षण के क्षेत्र में सीख ले रहा है। मोदी ने इजरायल की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत अब दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहा है और नई तकनीकों को अपनाकर विकास की गति तेज कर रहा है।

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में राजस्थान की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि पानी की कमी वाले प्रदेशों के लिए इजरायल का मॉडल विशेष रूप से उपयोगी है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार इजरायल ने रेगिस्तानी क्षेत्र को खेती योग्य बनाया, उसी तरह राजस्थान भी आधुनिक तकनीक से कृषि उत्पादन बढ़ा सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि भविष्य में राजस्थान में जल प्रबंधन और कृषि सुधार के क्षेत्र में इजरायल के सहयोग से कई योजनाएं लागू की जा सकती हैं।मोदी ने अपने भाषण में यह भी कहा कि भारत और इजरायल के बीच केवल रक्षा सहयोग ही नहीं बल्कि कृषि, विज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में भी गहरा संबंध विकसित हो रहा है। उन्होंने बताया कि इजरायल की तकनीक से किसानों की आय बढ़ाने और पानी की बचत करने में मदद मिल रही है। यह संदेश राजस्थान जैसे कृषि प्रधान राज्य के लिए विशेष महत्व का माना गया।

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में भारत की बदलती वैश्विक छवि का भी उल्लेख किया और कहा कि आज भारत की आवाज दुनिया में प्रभावशाली हो रही है। इजरायल यात्रा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भारत अब आत्मविश्वास के साथ अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ा रहा है और नए मित्र देशों के साथ सहयोग बढ़ा रहा है।अजमेर की सभा में इजरायल का उल्लेख केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं था, बल्कि इसे विकास के मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया। प्रधानमंत्री ने यह संदेश देने की कोशिश की कि तकनीक और नवाचार के माध्यम से कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को भी अवसर में बदला जा सकता है।

इस प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा और अजमेर में दिए गए उनके भाषण के बीच एक स्पष्ट संबंध दिखाई देता है। इजरायल का उदाहरण देकर उन्होंने राजस्थान के विकास, जल प्रबंधन और कृषि सुधार की संभावनाओं को रेखांकित किया और यह संदेश दिया कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग से राज्य और देश दोनों का विकास तेज किया जा सकता है।


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