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भारत में रंगों और प्रेम की होली और दुनिया में खून की होली 

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02 Mar 26
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इसे विडम्बना ही कहेंगे कि एक ओर जहाँ भारत में रंगों का त्यौहार होली मनाया जा रहा है वहीं दूसरी ओर अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के मध्य चल रहें घमासान युद्ध और परमाणु क्षेत्रों में भी अटैक ने तीसरे विश्व युद्ध जैसे हालात पैदा कर दिए हैं ।

भारत में होली का अर्थ है प्रेम,उल्लास, मेल-मिलाप और रंगों से रिश्तों की नई शुरुआत। बरसाने की लट्ठमार होली हो या वृंदावन की फूलों वाली होली—यह पर्व समाज को जोड़ने का संदेश देता है। वहीं मध्य पूर्व में इजराइल , ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष “रंगों” नहीं, बल्कि ख़ून की होली बनता जा रहा है। जहाँ भारत में रंग अस्थायी होते हैं, वहाँ दूसरी ओर युद्ध के दाग पीढ़ियों तक रहते हैं। एक ओर गुलाल है, दूसरी ओर बारूद…एक ओर प्रेम का प्रतीक है , दूसरी ओर प्रतिशोध की राजनीति। यही विरोधाभास आज दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि मानवता रंग चुनेगी या रक्त? भारत में रहने वाले दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी के लोग भी अब यह समझने लगे है कि भारत में रहते हुए वे कितने सुरक्षित है जबकि अमरीका इजराइल से चिढ़ा ईरान अपने ही मुस्लिम भाइयों के देशों पर अंधाधुन मिसाइले दाग रहा है।

मध्य पूर्व में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमले जारी हैं, जिसे “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” कहा जा रहा है। इन हमलों में ईरान के सैन्य ठिकानों, मिसाइल और कमांड केंद्रों को निशाना बनाया गया है और ईरान के सुप्रीम नेता अयातोल्ला अली खामेनेई की मौत भी पुष्टि के बाद संघर्ष और अधिक तीव्र हो गया है।  
ईरान ने भी प्रतिशोध में मिसाइलों और ड्रोन से अपने हमले तेज कर दिए है और संघर्ष अब सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रह गया है।यह लेबनान, यूएई और कुवैत समेत पूरे क्षेत्र में फैल चुका है, जहाँ कई स्थानों पर विस्फोट और मिसाइल प्रहार हों  रहें हैं। यह युद्ध तीसरे विश्व युद्ध में बदलता नजर आ रहा है ।

वर्तमान परिस्थितियों में तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और होरमुज संकट का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिखने लगा है।  

पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव आज वैश्विक राजनीति का सबसे संवेदनशील विषय बन चुका है। अमेरिका और इजराइल और ईरान के बीच जारी टकराव यदि पूर्ण युद्ध में बदलता है, तो इसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति, सामरिक संतुलन और कूटनीतिक संबंधों पर व्यापक असर डालेगा। भारत जैसे उभरते और ऊर्जा-आश्रित राष्ट्र के लिए यह स्थिति कई स्तरों पर चुनौतीपूर्ण सिद्ध हो सकती है।

भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 80 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें पश्चिम एशिया की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। यदि ईरान और इजराइल के बीच सीधा युद्ध होता है और अमेरिका इसमें सक्रिय रूप से शामिल होता है, तो होरमुज़ जलडमरूमध्य जैसे सामरिक समुद्री मार्गों पर संकट उत्पन्न हो सकता है। यह मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। आपूर्ति बाधित होने पर कच्चे तेल की कीमतों में तीव्र उछाल संभव है। इससे भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे, महंगाई दर में वृद्धि होगी और राजकोषीय घाटे पर दबाव पड़ेगा।ऊर्जा महंगी होने से परिवहन, उद्योग और कृषि क्षेत्र प्रभावित होंगे, जिससे आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा। भारत को वैकल्पिक स्रोतों जैसे रूस, अमेरिका या अफ्रीकी देशों से आयात बढ़ाने की रणनीति अपनानी पड़ सकती है, परंतु यह तात्कालिक समाधान नहीं होगा।

तीसरे विश्व युद्ध की आशंका से वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ती है। विदेशी निवेशक जोखिम से बचने के लिए पूंजी निकाल सकते हैं, जिससे भारतीय शेयर बाजार में गिरावट और रुपये में कमजोरी आ सकती है। आयात महंगा होने से चालू खाता घाटा बढ़ेगा और विकास दर प्रभावित हो सकती है।आईटी, फार्मा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र, जिनका पश्चिम एशिया से बड़ा व्यापारिक संबंध है, अस्थिरता का सामना कर सकते हैं। साथ ही, यदि वैश्विक मंदी जैसी स्थिति बनती है, तो भारत की निर्यात वृद्धि पर भी असर पड़ेगा।

खाड़ी देशों में लगभग 80 लाख से अधिक भारतीय काम करते हैं। जिसमें राजस्थान के विशेष कर दक्षिणी राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर सलूम्बर और प्रतापगढ़ के भी लाखों  लोग रोजगार के लिए खाड़ी देशों और अन्यत्र गए हुए है। यह प्रवासी समुदाय हर वर्ष अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा भारत भेजता है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। यदि संघर्ष व्यापक होता है, तो भारतीयों की सुरक्षा और संभावित निकासी एक बड़ी चुनौती होगी।भारत को पूर्व में भी रूस यूक्रेन तथा ऐसी ही अन्य चुनौतियों और संकट के समय बड़े पैमाने पर राहत और निकासी अभियान चलाने पड़े हैं। इस बार भी सरकार को कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर समन्वित प्रयास करने पड़ सकते हैं। प्रवासी भारतीयों की वापसी से रेमिटेंस पर असर पड़ेगा, जो कई राज्यों की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण स्रोत है।

इसके अलावा भारत की विशेष स्थिति यह भी है कि उसके तीनों पक्षों से महत्वपूर्ण संबंध हैं। अमेरिका के साथ रक्षा और रणनीतिक साझेदारी मजबूत है, इजराइल भारत का प्रमुख रक्षा सहयोगी है, और ईरान के साथ ऐतिहासिक एवं आर्थिक संबंध हैं, विशेषकर चाबहार बंदरगाह परियोजना के माध्यम से।
ऐसी परिस्थिति में भारत को अत्यंत संतुलित और सावधानीपूर्ण कूटनीति अपनानी होगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर बल दिया है। संभवतः भारत खुले समर्थन के बजाय अपनी विदेश नीति के अनुरूप  सभी पक्षों से शांति और संवाद की अपील करेगा, ताकि किसी भी पक्ष के साथ संबंधों में दरार न आए। फिर भी यदि संघर्ष लंबा चलता है, तो हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री सुरक्षा पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। नौसेना की सक्रियता बढ़ानी पड़ सकती है, ताकि व्यापारिक जहाजों और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।इसके अतिरिक्त, वैश्विक अस्थिरता के माहौल में आतंकी गतिविधियों की आशंका भी बढ़ जाती है। भारत को पाकिस्तान जैसे दुश्मन देशों से अपनी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत रखनी होगी। रक्षा बजट पर भी दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि सुरक्षा तैयारियों को उन्नत करना अनिवार्य होगा।

हर संकट अपने साथ अवसर भी लाता है। भारत ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण, नवीकरणीय ऊर्जा निवेश और सामरिक तेल भंडार बढ़ाने की दिशा में तेज कदम उठा सकता है। साथ ही, यदि भारत शांति स्थापना में सक्रिय भूमिका निभाता है, तो उसकी वैश्विक छवि एक जिम्मेदार और संतुलित शक्ति के रूप में और मजबूत हो सकती है।

अमेरिका–इजराइल–ईरान संघर्ष यदि व्यापक युद्ध का रूप लेता है, तो भारत प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में शामिल न होते हुए भी उसके आर्थिक, ऊर्जा, कूटनीतिक और सुरक्षा प्रभावों से अछूता नहीं रहेगा। अतः आवश्यक है कि भारत दूरदर्शिता, संतुलित कूटनीति और मजबूत आर्थिक प्रबंधन के साथ इस संभावित संकट का सामना करे। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में विवेकपूर्ण नीति और राष्ट्रीय हितों की रक्षा ही भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।


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